देश के मुख्य न्यायाधीश बीआर गवई
CJI BR Gavai Lecture: नई दिल्ली के इंडिया इंटरनेशनल सेंटर में 12 नवंबर 2025 को 30वां सुनंदा भंडारे स्मृति व्याख्यान आयोजित किया गया. इसकी थीम थी ‘सभी के लिए न्याय: लैंगिक समान और समावेशी भारत का निर्माण’. कार्यक्रम में मुख्य वक्ता भारत के मुख्य न्यायाधीश (CJI) जस्टिस भूषण आर. गवई थे.
जस्टिस सुनंदा भंडारे दिल्ली हाईकोर्ट की वरिष्ठ जज थीं, जिन्होंने महिलाओं के अधिकारों के लिए जीवनभर संघर्ष किया. उनकी स्मृति में 1995 से यह व्याख्यान श्रृंखला चल रही है. सीजेआई गवई ने आसान शब्दों में बताया कि भारत को सच्चा न्याय तभी मिलेगा जब महिलाओं और कमजोर वर्गों को बराबरी का हक मिले. उन्होंने कहा कि संविधान मानव गरिमा पर टिका है, और लैंगिक भेदभाव को मिटाना हमारा कर्तव्य है.
मुख्य न्यायाधीश का संदेश: लैंगिक समानता जरूरी
सीजेआई गवई ने व्याख्यान की शुरुआत संविधान की आत्मा से की. उन्होंने सरल भाषा में समझाया कि भारतीय संविधान सभी को समान अधिकार देता है, लेकिन वास्तविकता में महिलाओं को अभी भी कई चुनौतियां झेलनी पड़ती हैं.
उन्होंने कहा-
“लैंगिक समानता सिर्फ नारा नहीं, बल्कि न्याय की बुनियाद है.”
उन्होंने उदाहरण दिया कि घर, कार्यस्थल और समाज में महिलाओं के खिलाफ होने वाली हिंसा और भेदभाव को रोकना जरूरी है. सीजेआई ने बताया कि अदालतें हाल के वर्षों में कई फैसलों से महिलाओं के हक की रक्षा कर रही हैं, जैसे दहेज हत्या और घरेलू हिंसा के मामलों में. लेकिन उन्होंने जोर दिया कि कानून के साथ-साथ समाज को भी बदलना होगा.
“महिलाओं को शिक्षा, रोजगार और निर्णय लेने में बराबरी का मौका मिले, तभी भारत समावेशी बनेगा.”
यह बातें सुनकर उपस्थित लोग तालियां बजाते नजर आए.
समावेशी भारत: कमजोर वर्गों का उत्थान
व्याख्यान के दूसरे हिस्से में सीजेआई ने समावेशी समाज पर फोकस किया. उन्होंने कहा कि न्याय सभी के लिए होना चाहिए, चाहे कोई किसी भी जाति, धर्म या लिंग का हो. उन्होंने आसान शब्दों में समझाया कि “संविधान की भावना यह है कि कोई भी व्यक्ति भेदभाव का शिकार न बने,”
सीजेआई ने दलित, आदिवासी और अल्पसंख्यक महिलाओं की दशा पर विशेष ध्यान दिया. उन्होंने बताया कि जस्टिस सुंदा बंधारे ने खुद ऐसे मुद्दों पर आवाज उठाई थी. उन्होंने कहा- “हमें स्मृति को अमल में बदलना है. शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाएं.”
उन्होंने युवाओं से अपील की कि वे सोशल मीडिया और सामुदायिक स्तर पर जागरूकता फैलाएं. सीजेआई ने एक दिलचस्प उदाहरण दिया – “जैसे एक परिवार में सभी सदस्यों का सम्मान जरूरी है, वैसे ही राष्ट्र में सभी का.” यह सुनकर श्रोता प्रभावित हुए.
महिलाओं के सशक्तिकरण: व्यावहारिक कदम
सीजेआई गवई ने महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए ठोस सुझाव दिए. उन्होंने कहा कि “सरकार, अदालतें और समाज मिलकर काम करें. पॉक्सो कानून और घरेलू हिंसा अधिनियम को मजबूत बनाएं, लेकिन जमीनी स्तर पर लागू करें.” सरल शब्दों में उन्होंने समझाया कि लड़कियों की शिक्षा पर निवेश से पूरा समाज मजबूत होता है.
“एक शिक्षित महिला पूरे परिवार को बदल देती है.”
उन्होंने कार्यस्थलों पर लैंगिक छुट्टी और सुरक्षित माहौल की बात की.
सीजेआई ने जस्टिस सुनंदा भंडारे की विरासत को याद करते हुए कहा कि वे महिलाओं की स्वतंत्रता की प्रतीक थीं. उनके सपनों को साकार करने के लिए हमें एकजुट होना होगा.” व्याख्यान के दौरान एनसीपी नेता प्रफुल पटेल और जस्टिस डीके उपाध्याय जैसे गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे.
जस्टिस सुनंदा भंडारे दिल्ली उच्च न्यायालय की एक न्यायाधीश थीं, जिनका जन्म 1 नवंबर, 1942 को हुआ था और 10 नवंबर, 1994 को उनका निधन हो गया था. उन्होंने 1968 में महाराष्ट्र बार काउंसिल में वकील के रूप में पंजीकरण कराया और 1984 में दिल्ली उच्च न्यायालय की अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त हुईं, जो बाद में स्थायी न्यायाधीश बन गईं.
भारत का संविधान न्याय का दर्पण, हमें इसे चमकाना है
सीजेआई गवई ने व्याख्यान के अंत में आशावादी संदेश दिया- “भारत का संविधान न्याय का दर्पण है. हमें इसे चमकाना है.” उन्होंने सभी से वादा लिया कि लैंगिक समानता के लिए प्रयास करेंगे. यह व्याख्यान न सिर्फ यादगार रहा, बल्कि प्रेरणादायक भी. जस्टिस सुनंदा भंडारे फाउंडेशन ने इस आयोजन को सफल बनाया. सीजेआई के शब्दों से साफ है कि समावेशी भारत का सपना साकार करने के लिए सबको कदम उठाने होंगे. यह व्याख्यान महिलाओं के अधिकारों पर नई बहस छेड़ सकता है.
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