भारतीय माता-पिता की 44 वर्षीय बेटी को बांग्लादेश भेजे जाने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने असम सरकार को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस जॉयमाल्या बागची की पीठ ने यह नोटिस जारी किया है. असम की 44 वर्षीय विधवा आहेदा खातून ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया है. खातून ने दायर याचिका में कहा है कि उनके माता-पिता, भाई बहन सभी भारतीय नागरिक है, इसके बावजूद उन्हें गैर-भारतीय करार दिया गया.
आएदा खातून का मामला क्यों उलझा?
दरअसल असम की फॉरेन ट्रिब्यूनल ने आएदा खातून को 12 सितंबर 2019 को विदेशी घोषित कर दिया था. ट्रिब्यूनल ने अपने फैसले में कहा था कि वह अपने माता-पिता और दादा-दादी से नागरिकता का संबंध साबित नही कर सकी. जबकि खातून ने 1965, 1970, 1985 और 1997 कि वोटर आईडी कार्ड और स्कूल सर्टिफिकेट, गांव के मुखिया का प्रमाणपत्र, पिता द्वारा जमीन की रजिस्टर्ड गिफ्ट डीड दिया था. इन सभी दस्तवेज़ों में माता-पिता भारतीय बताए गए हैं. जिसके खिलाफ खातून ने 6 साल बाद गुवाहाटी हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था. अगस्त 2025 में हाई कोर्ट ने उनकी याचिका को यह कह कर खारिज कर दिया था कि उन्होंने देरी से याचिका दायर की है. कोर्ट ने मेरिट के आधार पर सुनवाई नही की. इसके बाद प्रशासन ने बांग्लादेश भेज दिया.
सुप्रीम कोर्ट में उठा सवाल
वही आएदा के भाई ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दायर कर कहा कि परिवार द्वारा पेश किया गया दस्तावेज असली है. मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता के वकील ने कई बड़े संवैधानिक सवाल उठाए है. क्या सरकारी और प्रमाणित दस्तवेज़ों को तकनीकी आधार पर खारिज किया जा सकता है? क्या हाई कोर्ट सिर्फ देरी के आधार पर किसी व्यक्ति की नागरिकता और स्वतंत्रता से जुड़ा मामला खारिज कर सकता है? क्या ऐसे मामलों में अदालत को ट्रिब्यूनल के फैसले की मेरिट की जांच नहीं करनी चाहिए?
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-भारत एक्सप्रेस
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