हिमालय की ऊंचाइयां हमेशा से रहस्यों और चमत्कारों की खान रही हैं. लेकिन इस बार पहाड़ों से जो खबर आई है, वह केवल रोमांचक नहीं बल्कि करोड़ों भारतीयों की सेहत के लिए एक संजीवनी साबित हो सकती है. पिथौरागढ़ जिले के धारचूला के दुर्गम इलाकों में वैज्ञानिकों ने एक ऐसी दुर्लभ जड़ी-बूटी खोजी है, जिसे अब तक केवल विदेशी जंगलों की अमानत माना जाता था. हम बात कर रहे हैं ‘चागा मशरूम’ (Chaga Mushroom) की.
भोजपत्र के पेड़ों पर छिपा ‘काला सोना’
धारचूला के बालिंग और सीपू जैसे इलाकों में, जहां ऑक्सीजन भी कम होने लगती है, वहां 3000 मीटर से ज्यादा की ऊंचाई पर यह अद्भुत औषधि मिली है. जड़ी-बूटी शोध संस्थान (मंडल) के पूर्व वरिष्ठ वैज्ञानिक डॉ. विजय भट्ट ने इसकी पहचान की है. दिखने में यह किसी मशरूम जैसा नहीं लगता, बल्कि पेड़ पर चिपका हुआ जला हुआ कोयला या मधुमक्खी का कोई पुराना छत्ता लगता है.
इसकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि यह केवल उन भोजपत्र के पेड़ों पर उगता है जो कम से कम 100 साल पुराने हों. अब तक दुनिया का मानना था कि यह बेशकीमती मशरूम सिर्फ रूस के साइबेरियाई जंगलों या ठंडे यूरोपीय देशों में ही मिलता है, लेकिन हिमालय ने एक बार फिर साबित कर दिया कि उसके पास हर मर्ज की दवा मौजूद है.
हीमोग्लोबिन घटते ही क्यों टूटने लगता है पूरा सिस्टम
चागा मशरूम वैसे तो कैंसर और इम्युनिटी बढ़ाने के लिए मशहूर है, लेकिन भारत के संदर्भ में इसका सबसे बड़ा महत्व ‘एनीमिया’ यानी खून की कमी से लड़ने में हो सकता है. आज हमारे देश में हर दूसरी महिला और करोड़ों बच्चे एनीमिया का शिकार हैं. यह कोई मामूली थकान नहीं है, बल्कि एक ऐसी स्थिति है जहां शरीर के अंगों को जिंदा रहने के लिए जरूरी ऑक्सीजन ही नहीं मिल पाती.
जब हमारे खून में हीमोग्लोबिन कम होता है, तो लाल रक्त कोशिकाएं (RBC) फेफड़ों से ऑक्सीजन उठाकर शरीर के बाकी हिस्सों तक नहीं पहुंचा पातीं. नतीजा यह होता है कि इंसान हमेशा थका हुआ महसूस करता है, हाथ-पैर ठंडे रहने लगते हैं और जरा सा चलने पर सांस फूलने लगती है.
क्यों जानलेवा हो सकती है खून की कमी?
डॉक्टरों की मानें तो हीमोग्लोबिन का स्तर 10 से नीचे जाना खतरे की घंटी है. अगर यह 8 या 9 तक गिर जाए, तो दिल और फेफड़ों पर जबरदस्त दबाव पड़ता है. 8 से नीचे का स्तर तो सीधे जान पर बन आने वाली स्थिति होती है. चागा मशरूम में मौजूद पोषक तत्व और एंटीऑक्सीडेंट्स शरीर में आयरन के अवशोषण को बेहतर बनाने और हीमोग्लोबिन के स्तर को सुधारने में जादुई असर दिखा सकते हैं.
उम्मीद की नई किरण
हिमालय से मिले इस ‘काले सोने’ ने शोधकर्ताओं और आयुर्वेद के जानकारों में नई उम्मीद जगा दी है. अगर इसे सही तरीके से प्रोसेस कर दवा या सप्लीमेंट के तौर पर इस्तेमाल किया जाए, तो यह कुपोषण और एनीमिया से जूझ रहे भारत के लिए एक वरदान बन सकता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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