सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाईकोर्ट की 6 साल की देरी पर सख्त रूख अपनाते हुए 3 आपराधिक पुनर्विचार याचिकाओं को अपने पास स्थानांतरित कर लिया है. यह मामला 30 मई 1994 को हुई एक हत्या से जुड़ा है, जहां निचली अदालत में मुकदमा लंबित रहने के कारण दशकों से न्याय नहीं मिल पाया. जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने यह आदेश दिया.
सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सामान्यतः अनुच्छेद 139A के तहत ऐसी असाधारण शक्ति का प्रयोग अनुच्छेद 32 की याचिकाओं में नहीं किया जाता, लेकिन यहां न्याय में असाधारण देरी से पीड़ित पक्ष के त्वरित न्याय के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) पर सीधा प्रभाव पड़ रहा है. अदालत ने मृतक के कानूनी उत्तराधिकारी द्वारा दायर याचिका पर सुनवाई की, जिसमें अनुच्छेद 14 और 21 के उल्लंघन का आरोप लगाया गया था.
यह है पूरा मामला
1995 में दर्ज एफआईआर में भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या), 307 (हत्या का प्रयास), 147, 148 और 149 के तहत 9 लोगों को आरोपी बनाया गया. 2008 में उत्तर प्रदेश सरकार ने आरोपी छोटेय सिंह के खिलाफ मुकदमा वापस लेने का प्रस्ताव दिया और 2012 में CrPC की धारा 321 के तहत अर्जी दाखिल की. बाद में सरकार ने सभी आरोपियों पर मुकदमा वापस लेने की मांग की. कोर्ट ने छोटेय सिंह पर मुकदमा वापस ले लिया, लेकिन अन्य आरोपियों की मांग खारिज कर दी.
हाईकोर्ट में लंबित याचिकाएं
इन फैसलों के खिलाफ तीन आपराधिक पुनर्विचार याचिकाएं इलाहाबाद हाईकोर्ट में दाखिल हुईं. 5 फरवरी 2020 को सभी पक्षों की दलीलें सुनने के बाद फैसला सुरक्षित रख लिया गया. लेकिन 6 साल बीत जाने के बावजूद फैसला नहीं सुनाया गया. 4 फरवरी 2026 को मामले को फैसला सुनाने के लिए सूचीबद्ध किया गया, पर फिर टाल दिया गया. इस देरी से हाईकोर्ट में लगी रोक के कारण निचली अदालत में सुनवाई रुकी रही.
सुप्रीम कोर्ट का फैसला
सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 139A के तहत याचिकाओं को ट्रांसफर कर लिया और कहा कि अब हस्तक्षेप आवश्यक है ताकि त्वरित न्याय सुनिश्चित हो सके. यह कदम न्यायिक प्रक्रिया में देरी के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट की सख्ती को दर्शाता है.
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