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गगनयान की बड़ी कामयाबी; जब आसमान से समंदर में सुरक्षित उतरा ‘क्रू मॉड्यूल’, ISRO ने रचा एक और इतिहास

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव जुड़ गया है. इस सफलता ने भारत को उन चुनिंदा देशों की कतार में ला दिया जो स्वदेशी तकनीक से अपने नागरिकों को अंतरिक्ष भेजने और वापस लाने की क्षमता रखते हैं.

भारत के अंतरिक्ष कार्यक्रम में एक और महत्वपूर्ण पड़ाव जुड़ गया है. भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन ISRO ने गगनयान मिशन की तैयारियों के तहत दूसरा इंटीग्रेटेड एयर ड्रॉप टेस्ट (IADT-02) सफलतापूर्वक पूरा कर लिया है. इस टेस्ट ने एक बार फिर यह साबित किया कि अंतरिक्ष यात्रियों की सुरक्षित वापसी के लिए तैयार किया जा रहा पैराशूट सिस्टम पूरी तरह भरोसेमंद दिशा में आगे बढ़ रहा है.

यह परीक्षण गगनयान मिशन की उस सबसे अहम चुनौती पर केंद्रित था, जो अक्सर सबसे मुश्किल अंतरिक्ष से धरती पर सुरक्षित वापसी मानी जाती है.

कैसे हुआ पूरा परीक्षण?

इस टेस्ट में लगभग 5.7 टन वज़न वाला एक सिमुलेटेड क्रू मॉड्यूल इस्तेमाल किया गया, जो असल गगनयान कैप्सूल जैसा ही था. इसे भारतीय वायुसेना के चिनूक हेलीकॉप्टर से करीब 3 किलोमीटर की ऊंचाई तक ले जाया गया. इसके बाद इसे श्रीहरिकोटा तट के पास समुद्र के ऊपर तय किए गए ड्रॉप ज़ोन में छोड़ा गया. जैसे ही मॉड्यूल नीचे गिरना शुरू हुआ, एक के बाद एक पैराशूट सिस्टम सक्रिय होते गए. सबसे पहले छोटे स्टेबलाइजेशन पैराशूट खुले, जिन्होंने मॉड्यूल को संतुलित किया. इसके बाद ड्रोग और पायलट पैराशूट ने गति को नियंत्रित किया. आखिर में बड़े मुख्य पैराशूट ने पूरी रफ्तार को कम करके मॉड्यूल को सुरक्षित तरीके से समुद्र में उतार दिया.

लैंडिंग के बाद भारतीय नौसेना Indian Navy की मदद से मॉड्यूल को सफलतापूर्वक रिकवर भी कर लिया गया. इस पूरे ऑपरेशन में भारतीय वायुसेना Indian Air Force और DRDO DRDO की भी अहम भूमिका रही.

यह टेस्ट इतना जरूरी क्यों है?

अंतरिक्ष में जाना जितना रोमांचक है, उतना ही चुनौतीपूर्ण धरती पर सुरक्षित वापसी करना होता है. गगनयान मिशन के तहत भारत अपने तीन अंतरिक्ष यात्रियों को लगभग 400 किलोमीटर की ऊंचाई पर तीन दिन के मिशन पर भेजने की योजना बना रहा है. री-एंट्री के दौरान स्पेसक्राफ्ट की गति बेहद तेज होती है और उसी समय सिस्टम की असली परीक्षा होती है. ऐसे में पैराशूट सिस्टम की विश्वसनीयता ही तय करती है कि मिशन सफल होगा या नहीं.

पहला टेस्ट (IADT-01) पहले ही यह दिखा चुका था कि सिस्टम काम करता है, लेकिन दूसरा टेस्ट और भी महत्वपूर्ण था क्योंकि इसने यह साबित किया कि यह सिस्टम बार-बार, हर परिस्थिति में भी भरोसेमंद तरीके से काम कर सकता है.

साझा प्रयासों की बड़ी मिसाल

यह सफलता सिर्फ एक संस्था की नहीं, बल्कि कई संगठनों के तालमेल का नतीजा है. वैज्ञानिकों, इंजीनियरों, सेना और तकनीकी टीमों ने मिलकर इस मिशन को सफल बनाया. यह सहयोग दिखाता है कि भारत का स्पेस प्रोग्राम अब पहले से कहीं ज्यादा मजबूत और समन्वित हो चुका है.

यह टेस्ट गगनयान के पहले बिना चालक वाले मिशन G1 की तैयारी में एक बड़ा कदम माना जा रहा है. आने वाले समय में और भी अनक्रूड टेस्ट फ्लाइट्स होंगी, ताकि हर तकनीकी पहलू को पूरी तरह परखा जा सके.

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-भारत एक्सप्रेस



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