सुप्रीम कोर्ट ने मंदिर में पुजारियों के वेतन से संबंधित दायर याचिका पर सुनवाई से इनकार कर दिया है. जिसके बाद याचिकाकर्ता ने दायर जनहित याचिका को वापस ले लिया है. कोर्ट ने कहा कि अनुच्छेद 32 के तहत इस याचिका पर सुनवाई नही की जा सकती है.
यह याचिका सुप्रीम कोर्ट के वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय की ओर से दायर की गई थी दायर याचिका को राज्य की ओर से नियंत्रित मंदिरों में पुजारियों, सेवादारों और स्टाफ के वेतन व अन्य सुविधाओं की.समीक्षा के लिए न्यायिक आयोग का गठन या विशेषज्ञ समिति गठित करने की मांग की गई थी.
न्यूनतम वेतन और गरिमापूर्ण जीवन की मांग पर जोर
जस्टिस विक्रमनाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा कि इस याचिका पर अनुच्छेद 32 के तहत सुनवाई नही की जा सकती और जो लोग इससे प्रभावित हैं, वे संबंधित अदालत का रुख कर सकते है. कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा कि जो लोग पीड़ित हैं, वे अपनी लड़ाई खुद लड़ेंगे. मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता अश्विनी उपाध्याय ने 2006 के इलाहाबाद हाईकोर्ट के फैसले का हवाला देते हुए कहा कि हाई कोर्ट ने कहा था कि वक्फ की तरह ही पुजारियों और सेवादारों के लिए भी न्यूनतम सम्मानपूर्वक वेतन सुनिश्चित किया जाना चाहिए ताकि वे गरिमापूर्ण जीवन जी सकें. उन्होंने इसको लेकर मद्रास हाईकोर्ट द्वारा दिए गए फैसले का भी जिक्र किया.
सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर विचार करने से किया इनकार
हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने याचिका पर विचार करने से इनकार करते हुए अश्विनी कुमार उपाध्याय को इसे वापस लेने की अनुमति दे दी और कानून के तहत उपलब्ध अन्य उपाय अपनाने की छूट भी प्रदान की. याचिकाकर्ता के अनुसार जब सरकार किसी मंदिर का प्रशासनिक और आर्थिक नियंत्रण अपने हाथों में लेती है, तो वहां काम करने वालों के साथ एक नियोक्ता कर्मचारी का संबंध बनता है.
इसके बावजूद पुजारियों को जीवन स्तर के अनुकूल सम्मानजनक वेतन न देना उनके आजीविका के मौलिक अधिकार (अनुच्छेद 21) का सीधा उल्लंघन है.
दायर याचिका में यह भी मांग की गई थी कि पुजारियों और मंदिर के कर्मचारियों को वेतन संहिता 2019 की धारा 2 (k) के तहत कर्मचारी माना जाए. अगर ऐसा होता है तो उन्हें नियुन्तम वेतन, सामाजिक सुरक्षा और अन्य सरकारी लाभ मिल सकता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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