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यूपी के अपर मुख्य सचिव संजय प्रसाद को सुप्रीम कोर्ट से बड़ी राहत, हाई कोर्ट के आदेश पर रोक

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है जिसमें यूपी के अपर मुख्य सचिव (गृह) संजय प्रसाद के आचरण पर तल्ख टिप्पणी करते हुए आदेश की प्रति डीओपीटी (DoPT) को भेजने का निर्देश दिया गया था.

Supreme Court

सुप्रीम कोर्ट ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के उस आदेश पर रोक लगा दी है, जिसमें कहा गया था कि यूपी के एडिशनल चीफ सेक्रेटरी (होम) संजय प्रसाद का व्यवहार प्रथम दृष्टया कोर्ट के अधिकार को कमजोर करने की जानबूझकर और सोची समझी कोशिश जैसा लगता है. जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस अतुल एस. चंदूरकर की पीठ ने यह निर्देश दिया है. हाई कोर्ट के आदेश में कहा गया था कि भविष्य की नियुक्तियों के लिए उनकी उपयुक्तता का आकलन करते समय कैबिनेट की नियुक्ति समिति के विचारार्थ फैसले की कॉपी डीओपीटी (DoPT) को भेजी जाए.

अदालत के आदेशों की परवाह नहीं करते अधिकारी: इलाहाबाद हाई कोर्ट

हाल ही में इलाहाबाद हाई कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि ऐसा प्रतीत होता है कि संजय प्रसाद को अदालत के आदेशों की कोई विशेष परवाह नहीं है. अदालत ने उन्हें कारण बताओ नोटिस जारी करते हुए पूछा था कि राज्य सरकार को उनके खिलाफ विधि सम्मत कार्रवाई करने का निर्देश क्यों न दिया जाए. हाई कोर्ट ने कहा कि गृह विभाग के अपर मुख्य सचिव का आचरण स्पष्ट रूप से दर्शाता है कि उन्हें इस अदालत द्वारा पारित आदेशों की भी कोई परवाह नहीं है. हाई कोर्ट ने इस संबंध में राज्य के मुख्य सचिव से भी स्पष्टीकरण मांगा है और दोनों अधिकारियों को व्यक्तिगत हलफनामा दाखिल करने का निर्देश दिया है.

आरोपियों की गिरफ्तारी को कोर्ट ने ठहराया था गलत

इलाहाबाद हाई कोर्ट ने पाया था कि संजय प्रसाद द्वारा जमा किए गए व्यक्तिगत हलफनामे में कई खामियां थीं, जिससे स्पष्ट है कि उन्होंने कोर्ट के पुराने निर्देशों को गंभीरता से नहीं लिया. अदालत ने चार आरोपियों की गिरफ्तारी को गलत ठहराया था. कोर्ट ने मुख्य सचिव को इस मुद्दे पर सरकार का रुख साफ करने को कहा था. अदालत ने कहा कि प्रथम दृष्टया ऐसा प्रतीत होता है कि उन्होंने अदालत के आदेशों और पुलिस सुधारों को लागू करने में जानबूझकर बाधा डाली, जिससे न्यायिक निर्देशों की प्रभावशीलता कमजोर हुई.

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हैबियस कॉर्पस याचिका से जुड़ा है मामला

यह मामला एक महिला की हैबियस कॉर्पस (बंदी प्रत्यक्षीकरण) याचिका से जुड़ा था, जिसने अपनी नाबालिग बेटी की बरामदगी के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था. पुलिस द्वारा प्रभावी कार्रवाई न किए जाने पर हाई कोर्ट ने जांच की गुणवत्ता पर सवाल उठाए और यह भी देखा कि राज्य में जांच व्यवस्था के लिए दिए गए पूर्व निर्देशों का पालन हो रहा है या नहीं.



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