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‘शरणार्थी नहीं, देश और धर्म के लिए लड़ने वाले योद्धा…’ 1947 के विभाजन को याद कर RSS सरसंघचालक मोहन भागवत ने क्या कहा?

नागपुर में आरएसएस प्रमुख मोहन भागवत ने कहा कि 1947 में विभाजन के बाद पाकिस्तान से भारत आए लोग शरणार्थी नहीं, बल्कि मातृभूमि और धर्म के लिए लड़ने वाले योद्धा थे. उन्होंने मुश्किल हालात में भी देश और संस्कृति को चुना.

Mohan Bhagwat

राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक मोहन भागवत ने बुधवार को नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम में हिस्सा लिया. कार्यक्रम में मोहन भागवत 1947 के भारत-पाकिस्तान विभाजन के दर्द और उससे जुड़े संघर्ष को लेकर बड़ा बयान दिया. उन्होंने कहा कि बंटवारे के वक्त पाकिस्तान से सब कुछ छोड़कर भारत आए लोगों को ‘शरणार्थी’ (Refugee) कहना बिल्कुल गलत है. वे असल में अपनी मातृभूमि और धर्म की रक्षा के लिए लड़ने वाले संघर्ष के ‘योद्धा’ थे.

‘करोड़ों की संपत्ति छोड़ देश को चुना’

सिंधु एजुकेशन सोसाइटी के 75वें स्थापना दिवस के मौके पर मोहन भागवत ने विभाजन के दौर को याद किया. उन्होंने कहा कि पाकिस्तान से आए लोगों ने बहुत कष्ट सहे, कई पीढ़ियों की मेहनत से खड़ा किया गया कारोबार और अपने पूर्वजों की विरासत संपत्ति वहीं छोड़ दी. इसके बावजूद उन्होंने सोच-समझकर भारत आने का फैसला किया ताकि वे बिना किसी डर के अपने धर्म का पालन कर सकें.

संघ प्रमुख ने आगे कहा कि उस लड़ाई में हम सिर्फ किसी एक की गलती से नहीं हारे थे, बल्कि हम सब मिलकर अखंड भारत को एक रखने की जंग हार गए थे. लेकिन उन लोगों ने विपरीत हालात में भी अच्छी नौकरी या संपत्ति के बजाय देश और अपनी संस्कृति को चुनना बेहतर समझा.

मुश्किलों से भागें नहीं बल्कि लड़े

मंच से आम लोगों को प्रेरित करते हुए मोहन भागवत ने कहा कि इंसान को कभी भी मुश्किल परिस्थितियों या भाग्य के आगे घुटने नहीं टेकने चाहिए. जो व्यक्ति गिरकर दोबारा खड़ा होता है और संघर्ष करता है, जीत उसी की होती है. उन्होंने कहा कि जो मुश्किलों को देखकर पहले ही कदम पीछे खींच लेता है, वह तो बिना लड़े ही हार मान चुका होता है.

शिक्षा का मतलब सिर्फ नौकरी पाना नहीं

कार्यक्रम के दौरान उन्होंने देश की शिक्षा व्यवस्था और संस्कारों पर भी खुलकर बात की. उन्होंने जोर देकर कहा कि आज के दौर में रोजगार पाने के लिए पढ़ाई करना जरूरी है, लेकिन इसे ही शिक्षा का अंतिम लक्ष्य नहीं मान लेना चाहिए. बच्चों को सही और गलत का अंतर समझाने के लिए ‘मूल्य आधारित’ शिक्षा बहुत जरूरी है. उन्होंने कहा कि यह संस्कार सिर्फ किताबों को रटने से नहीं आते, बल्कि शिक्षकों के आचरण से बच्चों के भीतर पैदा होते हैं. शिक्षा का असली मकसद समाज के प्रति जागरूक और अच्छे इंसान तैयार करना है.

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-भारत एक्सप्रेस



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