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‘चुप रहना भी अपराध है…’: POCSO का क्राइम छिपाया तो सीधे भेजे जाएंगे जेल, सुप्रीम कोर्ट ने तय की सबकी जवाबदेही

SUPREME COURT VERDICT On POCSO: सुप्रीम कोर्ट का बड़ा फैसला— बच्चों के साथ होने वाले यौन अपराधों (POCSO) की जानकारी मिलने पर रिपोर्ट करना अनिवार्य, छिपाने वालों पर होगी कार्रवाई.

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Vijay Ram Edited by Vijay Ram

देश की सर्वोच्च अदालत (Supreme Court) ने बच्चों के खिलाफ होने वाले यौन अपराधों को रोकने और अपराधियों को सख्त सजा दिलाने की दिशा में एक ऐतिहासिक और बेहद महत्वपूर्ण फैसला सुनाया है. सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट कर दिया है कि यदि किसी भी व्यक्ति को किसी नाबालिग बच्चे के साथ हुए यौन उत्पीड़न या शोषण (Minor Sexual Assault) की जानकारी मिलती है, तो कानूनन उसकी यह अनिवार्य जिम्मेदारी है कि वह इसकी तुरंत रिपोर्ट दर्ज कराए. खबरों के अनुसार, यदि कोई व्यक्ति ऐसे गंभीर मामलों को जानने के बावजूद जानबूझकर छिपाता है या पुलिस को सूचित नहीं करता है, तो उसे पॉक्सो (POCSO) कानून के तहत सख्त कानूनी कार्रवाई और जेल की सजा का सामना करना पड़ेगा.

चुप रहना या मामले को दबाना माना जाएगा बड़ा गुनाह

अदालत ने अपने फैसले में साफ किया कि अक्सर सामाजिक लोक-लाज, पारिवारिक दबाव या डर के चलते बच्चों के खिलाफ होने वाले अपराधों को दबाने की कोशिश की जाती है, जिससे असली अपराधियों के हौसले और बुलंद हो जाते हैं. चीफ जस्टिस की अगुवाई वाली बेंच ने कहा कि बच्चों की सुरक्षा सर्वोपरि है. नए दिशा-निर्देशों के मुताबिक, चाहे वह पीड़ित के डॉक्टर हों, स्कूल के शिक्षक हों, अड़ोस-पड़ोस के लोग हों या फिर खुद परिवार के सदस्य— यदि किसी के भी संज्ञान में ऐसी कोई दर्दनाक घटना आती है, तो उसे कानूनी एजेंसियों को रिपोर्ट करना ही होगा. जानकारी छिपाना अब खुद अपराध की श्रेणी में माना जाएगा.

कानून व्यवस्था और सामाजिक जवाबदेही होगी मजबूत

सुप्रीम कोर्ट के इस कड़े रुख से देश भर में बाल संरक्षण (Child Protection) कानूनों का क्रियान्वयन और अधिक प्रभावी हो जाएगा. कानूनी विशेषज्ञों का मानना है कि इस ऐतिहासिक फैसले से उन लोगों पर सीधे तौर पर नकेल कसी जा सकेगी जो रसूखदारों या अपनों को बचाने के लिए मासूमों की आवाज को दबा देते हैं. अदालत ने सभी राज्य सरकारों और पुलिस प्रशासन को भी आदेश दिया है कि वे पॉक्सो एक्ट के तहत रिपोर्टिंग मैकेनिज्म को और अधिक सुलभ और संवेदनशील बनाएं, ताकि पीड़ित बच्चे और सूचना देने वाले व्यक्ति की पहचान को पूरी तरह गुप्त रखते हुए त्वरित और निष्पक्ष जांच की जा सके. यह फैसला समाज में बच्चों के प्रति एक सुरक्षित और जवाबदेह माहौल तैयार करने में मील का पत्थर साबित होगा.



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