Urdu Conclave 2026

बिना ट्रायल 5 साल जेल? UAPA की धारा 43D(5) पर सुप्रीम कोर्ट में घमासान

UAPA मामलों में जमानत को लेकर सुप्रीम कोर्ट के अलग-अलग फैसलों ने नई बहस छेड़ दी है. लंबी सुनवाई और कम सजा दर से कई लोग सालों तक जेल में रहते हैं.

UAPA यानी गैरकानूनी गतिविधियां रोकथाम अधिनियम के तहत जमानत को लेकर सुप्रीम कोर्ट के हालिया फैसलों ने देशभर में नई बहस छेड़ दी है. एक तरफ राष्ट्रीय सुरक्षा का मुद्दा है वहीं दूसरी ओर ऐसे लोग हैं जो बिना ट्रायल पूरा हुए सालों से जेल में बंद हैं. अदालतों में लंबी सुनवाई और कम सजा दर यह दिखाती है कि कई मामलों में मुकदमे की प्रक्रिया ही सजा बन जाती है.

सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?

जनवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट की एक बेंच ने दिल्ली दंगा साजिश मामले में उमर खालिद और शरजील इमाम को जमानत देने से इनकार कर दिया. अदालत ने कहा कि आरोप गंभीर हैं. लेकिन चार महीने बाद दूसरी बेंच ने जम्मू-कश्मीर के एक मामले में जमानत देते हुए कहा कि जमानत नियम है, जेल अपवाद. इसके बाद दिल्ली पुलिस ने मामला बड़ी बेंच को भेजने की मांग की. 22 मई 2026 को सुप्रीम कोर्ट ने यह अहम सवाल बड़ी बेंच को सौंप दिया कि क्या लंबे समय तक जेल में रहना UAPA की धारा 43D(5) को कमजोर कर सकता है.

असली समस्या क्या है?

UAPA मामलों में सबसे बड़ी दिक्कत है जांच और ट्रायल में देरी. वकील एम.एस. खान के मुताबिक, हजारों पन्नों की केस डायरी, विशेष अदालतों की कमी और सरकारी वकीलों की कमी के कारण सिर्फ आरोप तय होने में ही पांच साल लग जाते हैं. यही वजह है कि कई लोगों के लिए मुकदमे की प्रक्रिया ही सजा बन जाती है. सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों को निर्देश दिया है कि UAPA मामलों के लिए अलग अदालतें बनाई जाएं और रोजाना सुनवाई हो.

क्यों सख्त है धारा 43D(5)?

UAPA कानून 1967 में बना था और 2008 व 2019 में इसे और सख्त किया गया. धारा 43D(5) कहती है कि अगर अदालत को चार्जशीट देखकर आरोप सही लगते हैं तो जमानत देना मुश्किल हो जाता है. पुलिस को चार्जशीट दाखिल करने के लिए 180 दिन तक का समय मिलता है, जिसे बढ़ाया भी जा सकता है.

आंकड़ों की तस्वीर

NCRB के आंकड़े बताते हैं कि 2014 से 2022 के बीच हर साल 1,200 से 1,400 मामले दर्ज हुए. लेकिन सजा दर केवल 1.5% से 6% रही. देशभर की अदालतों में पहले से ही 5 करोड़ से ज्यादा मामले लंबित हैं, जिससे UAPA मामलों का ट्रायल भी अटक जाता है.

लंबे समय तक जेल में रहने की कीमत

बिना दोष साबित हुए वर्षों तक जेल में रहना कानूनी ही नहीं, बल्कि मानवीय संकट भी है. परिवार टूट जाते हैं, नौकरी चली जाती है और मानसिक-शारीरिक स्वास्थ्य पर असर पड़ता है.

स्टेन स्वामी का मामला

84 वर्षीय कार्यकर्ता स्टेन स्वामी को 2020 में गिरफ्तार किया गया था. पार्किंसंस बीमारी से जूझते हुए भी उन्हें जेल में जरूरी सुविधाएं नहीं मिल सकीं. मेडिकल जमानत की मांग करते-करते 2021 में उनका निधन हो गया.

उमर खालिद का मामला

उमर खालिद सितंबर 2020 से जेल में हैं. 2026 तक भी उनके मुकदमे में कोई खास प्रगति नहीं हुई. कई मामलों में लोग बाद में बरी हो जाते हैं, लेकिन तब तक वे अपनी जिंदगी के कई साल जेल में गुजार चुके होते हैं.

सुप्रीम कोर्ट के दो बड़े फैसले

  • जहूर अहमद शाह वटाली (2019): अदालत ने कहा कि जमानत पर फैसला करते समय पुलिस के आरोपों को पहली नजर में सही मानना होगा. इससे जमानत और कठिन हो गई.
  • के.ए. नजीब (2021): अदालत ने कहा कि अगर मुकदमा बहुत लंबा चल रहा है और अनुच्छेद 21 का उल्लंघन हो रहा है, तो जमानत दी जा सकती है.

आगे का रास्ता

विशेषज्ञों का मानना है कि आतंकवाद से लड़ने के लिए UAPA जरूरी है, लेकिन न्याय में देरी भी उचित नहीं. सुधार के लिए सुझाव दिए गए हैं-

  • विशेष अदालतों की संख्या बढ़ाई जाए.
  • रोजाना सुनवाई हो.
  • अंडर ट्रायल रिव्यू कमेटियों को मजबूत किया जाए.
  • तय समय के बाद अनुमानित जमानत का प्रावधान किया जाए.

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सामान्य कानून और UAPA का फर्क

सामान्य आपराधिक कानून में सिद्धांत है कि जब तक दोष साबित न हो, व्यक्ति निर्दोष माना जाएगा. लेकिन UAPA में जमानत के मामले में स्थिति अलग है. अगर अदालत को आरोप सही लगते हैं तो जमानत मिलना बेहद कठिन हो जाता है.

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-भारत एक्सप्रेस



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