Book Controversy: संत रामपाल को हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट से झटका लगा है. कोर्ट ने रामपाल की ओर से दायर उस याचिका को खारिज कर दिया था जिसमें रामपाल की पुस्तकों के वितरण को लेकर दर्ज एफआईआर को रद्द करने की मांग की गई थी. हालांकि अदालत ने यह कहते हुए सोलन की कार्यवाही को रद्द कर दिया कि भारतीय दंड संहिता की धारा 295 A के तहत मुकदमा चलाने के लिए सक्षम प्रधिकारी से आवश्यक अभियोजन स्वीकृति नहीं ली गई थी.
क्या है मामला?
जस्टिस राकेश कैंथला की एकल पीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि बिना वैध स्वीकृति के ट्रायल कोर्ट द्वारा मामले का संज्ञान लेना कानूनन सही नहीं था.अदालत ने राज्य सरकार को उचित अनुमति प्राप्त करने के बाद दोबारा कार्यवाही शुरू करने की स्वतंत्रता भी प्रदान की है. दरअसल जून 2023 में दर्ज हुआ था. आरोप है कि 13 लोग संत रामपाल द्वारा लिखी गई ऐसी पुस्तकें बांट रहे थे, जिनमें हिंदू देवी देवताओं और संतों के खिलाफ आपत्तिजनक व मानहानिकारक टिप्पणियां थी, जिससे धार्मिक भावनाएं आहत हुई. मामले की सुनवाई के दौरान याचिकाकर्ता की ओर से पेश वकील ने दलील देते हुए कहा कि शिकायतकर्ता ने पुस्तकों के अंश संदर्भ से हटाकर पेश किए हैं और अभियोजन की वैधानिक स्वीकृति भी नहीं ली गई.
वही राज्य सरकार ने कहा कि,
अभियोजन स्वीकृति के लिए जिला मजिस्ट्रेट को पत्र भेजा गया था तथा पुस्तकों का वितरण हिंदुओं की धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचाने के उद्देश्य से किया गया था. हाई कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि प्रथम दृष्टया एफआईआर से संज्ञेय अपराध का मामला बनाता है. पुस्तकों की सामग्री उचित है या नहीं, इसका फैसला ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर किया जाएगा. अदालत ने यह भी कहा कि हिंदू देवी देवताओं और संतों के खिलाफ कथित अपमानजनक टिप्पणियां धार्मिक भावनाओं को आहत करने के इरादे से संकेत दे सकती है. इसलिए इस स्तर पर एफआईआर रद्द नहीं किया जा सकता है.
कोर्ट ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का अधिकार पूर्ण नहीं है और यह सार्वजनिक व्यवस्था जैसी संवैधानिक सीमाओं के अधीन है. पुस्तकों के पहले से सार्वजनिक रूप से उपलब्ध होने और व्यापक रूप से प्रसारित होने की दलील भी ट्रायल के दौरान साक्ष्यों के आधार पर ही परखी जाएगी.
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-भारत एक्सप्रेस
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