Bharat Express DD Free Dish

न डैमेज कंट्रोल, न छात्रों से संवाद! जानिए NEET विवाद में धर्मेंद्र प्रधान का विकेट गिरने के 5 सबसे बड़े कारण

Dharmendra Pradhan Resignation Reasons: छात्रों के लगातार विरोध, संसद में हंगामे और विपक्ष के बढ़ते दबाव के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आखिरकार अपने पद से इस्तीफा दे दिया. लंबे समय तक कैबिनेट में मजबूत पकड़ रखने वाले धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा? इसके पीछे पांच वजहें सबसे अहम मानी जा रही हैं.

Dharmendra Pradhan Resignation Reasons

Dharmendra Pradhan Resignation Reasons

Dharmendra Pradhan Resignation Reasons: छात्रों के लगातार विरोध, संसद में हंगामे और विपक्ष के बढ़ते दबाव के बीच केंद्रीय शिक्षा मंत्री धर्मेंद्र प्रधान ने आखिरकार अपने पद से इस्तीफा दे दिया. करीब पांच सप्ताह तक चले आंदोलन के बाद आया यह इस्तीफा सरकार के लिए केवल एक प्रशासनिक फैसला नहीं, बल्कि बड़े राजनीतिक डैमेज कंट्रोल के तौर पर देखा जा रहा है.

धर्मेंद्र प्रधान ने इस्तीफे की जानकारी देते हुए कहा कि जंतर-मंतर पर बने हालात से देश की एकता और अखंडता प्रभावित होने का खतरा पैदा हो गया था. उन्होंने यह भी कहा कि युवाओं का भविष्य खराब न हो और वे कानूनी उलझनों में न फंसें, इसलिए उन्होंने पद छोड़ने का फैसला किया.

प्रधान मोदी सरकार के उन चुनिंदा मंत्रियों में शामिल थे, जिन्हें बेहद ताकतवर माना जाता था. वो 2014 से लगातार केंद्र सरकार में मंत्री रहे. शिक्षा मंत्रालय संभालने से पहले उनके पास पेट्रोलियम और इस्पात जैसे अहम विभागों की जिम्मेदारी भी रही, लेकिन NEET पेपर लीक को लेकर उपजा विवाद जैसे-जैसे बढ़ा वैसे-वैसे सरकार और संगठन के भीतर उनकी स्थिति कमजोर होती चली गई.

आखिर ऐसा क्या हुआ कि लंबे समय तक कैबिनेट में मजबूत पकड़ रखने वाले धर्मेंद्र प्रधान को इस्तीफा देना पड़ा? इसके पीछे पांच वजहें सबसे अहम मानी जा रही हैं.

1. इस्तीफे से कम पर तैयार नहीं थे छात्र और विपक्ष

जंतर-मंतर पर आंदोलन का नेतृत्व कर रही कॉकरोच जनता पार्टी यानी CJP ने धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे को अपनी सबसे प्रमुख मांग बना लिया था. संगठन के प्रतिनिधियों सौरव दास और आशुतोष रांका ने केंद्रीय मंत्रियों जेपी नड्डा और जितेंद्र सिंह से हुई बातचीत में साफ कर दिया था कि शिक्षा मंत्री के इस्तीफे के बिना आंदोलन समाप्त नहीं होगा.

विपक्ष ने भी इस मुद्दे पर सरकार को किसी तरह की राहत नहीं दी. नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी ने प्रदर्शनकारी छात्रों के साथ प्रेस कॉन्फ्रेंस कर कहा था कि धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर कोई समझौता नहीं किया जाएगा.

सरकार के सामने स्थिति ऐसी बन गई थी कि प्रधान को पद पर बनाए रखने का मतलब आंदोलन को और लंबा खींचना होता.

2. संसद से सड़क तक बढ़ता गया विरोध

NEET पेपर लीक को लेकर शुरू हुआ विरोध धीरे-धीरे दिल्ली से निकलकर देश के दूसरे राज्यों तक फैलने लगा था. संसद का सत्र शुरू होने के बाद भी सरकार को राहत नहीं मिली. लोकसभा और राज्यसभा में लगातार हंगामे के कारण कामकाज प्रभावित हुआ.

हर दिन विपक्ष धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे और पेपर लीक मामले में जवाबदेही तय करने की मांग उठाता रहा. दूसरी तरफ सड़कों पर छात्रों का गुस्सा बढ़ता चला गया.

दिल्ली के बाद बिहार के पटना और सीवान जैसे शहरों में प्रदर्शन तेज हो गए. उत्तर प्रदेश और महाराष्ट्र में भी छात्रों ने आंदोलन शुरू कर दिया. इनमें से कई राज्यों में भाजपा या उसके सहयोगी दलों की सरकार है. ऐसे में केंद्र के लिए इस नाराजगी को नजरअंदाज करना राजनीतिक रूप से मुश्किल होता जा रहा था.

3. समय रहते डैमेज कंट्रोल नहीं कर पाए

NEET पेपर लीक का मामला सामने आने के शुरुआती दिनों में शिक्षा मंत्रालय ने आंदोलन को उस गंभीरता से नहीं लिया. जिसकी वजह से छात्रों का गुस्सा बढ़ता रहा, लेकिन मंत्रालय की ओर से कोई प्रभावी संवाद स्थापित नहीं किया गया.

हालात बिगड़ने पर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को खुद आगे आकर छात्रों से अपील करनी पड़ी. सरकार ने सख्त कानून और दोषियों के खिलाफ कार्रवाई की बात कही, लेकिन तब तक मामला काफी आगे बढ़ चुका था.

इस पूरे विवाद के दौरान धर्मेंद्र प्रधान बेहद कम दिखाई दिये. वो न तो सीधे आंदोलनकारी छात्रों से बातचीत करने आगे आए और न ही लोगों के बीच यह भरोसा पैदा कर सके कि सरकार उनकी बात गंभीरता से सुन रही है. यही दूरी उनके खिलाफ सबसे बड़ा हथियार बन गई.

4. छात्रों से संवाद न करना पड़ा भारी

धर्मेंद्र प्रधान पर आरोप लगा कि उन्होंने आंदोलन की शुरुआत से ही सख्त और अड़ियल रुख अपनाया. उन्होंने छात्र नेताओं से सीधे बातचीत करने के बजाय मामले को प्रशासनिक स्तर पर संभालने की कोशिश की.

इसके उलट सरकार के ही दूसरे मंत्रियों ने कई आंदोलनों के दौरान प्रदर्शनकारियों से बातचीत कर विवाद सुलझाने की कोशिश की है. फरवरी 2025 में किसानों के प्रदर्शन के दौरान केंद्रीय कृषि मंत्री शिवराज सिंह चौहान अपनी टीम के साथ चंडीगढ़ पहुंचे थे. बातचीत के जरिए स्थिति को नियंत्रित किया गया था.

NEET विवाद में इस तरह की पहल न होना धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ गया. जैसे-जैसे आंदोलन आगे बढ़ा, छात्रों और शिक्षा मंत्रालय के बीच दूरी भी बढ़ती चली गई.

5. पिछली गलतियों से सबक नहीं लेने का आरोप

धर्मेंद्र प्रधान के खिलाफ सबसे गंभीर आरोप यह रहा कि 2024 के NEET विवाद के बाद भी परीक्षा व्यवस्था में जरूरी बदलाव पूरी तरह लागू नहीं किए गए.

उस समय सरकार ने पेपर लीक की बात स्वीकार करते हुए इसरो के पूर्व प्रमुख के. राधाकृष्णन की अध्यक्षता में एक कमेटी बनाई थी. कमेटी को परीक्षा प्रक्रिया को सुरक्षित और पारदर्शी बनाने के सुझाव देने थे.

कमेटी ने अपनी सिफारिशें सरकार को सौंप दीं, लेकिन आरोप है कि इन पर पूरी तरह अमल नहीं किया गया. इसके बाद दोबारा पेपर लीक का मामला सामने आया तो सवाल सीधे शिक्षा मंत्रालय और नेशनल टेस्टिंग एजेंसी की जवाबदेही पर उठे. NTA की इस लापरवाही का ठीकरा भी आखिरकार शिक्षा मंत्री के सिर फूटा.

सरकार के लिए फैसला जरूरी क्यों हो गया?

धर्मेंद्र प्रधान का इस्तीफा केवल छात्रों की एक मांग पूरी होना नहीं है. यह संकेत भी है कि आंदोलन ने सरकार पर बड़ा राजनीतिक और सामाजिक दबाव बना दिया था. एक तरफ संसद ठप थी, दूसरी तरफ छात्र आंदोलन नए राज्यों में फैल रहा था. विपक्ष इस मुद्दे को सरकार की जवाबदेही और युवाओं के भविष्य से जोड़कर लगातार हमलावर था.

ये भी पढ़ें- ‘कॉकरोंच एक बार घुस जाता है तो निकलता नहीं’, धर्मेंद्र प्रधान के इस्तीफे पर बोले प्रदर्शन के अगुआ, जानिए कौन हैं CJP बनाने वाले अभिजीत दीपके?

ऐसे में प्रधान का इस्तीफा सरकार के लिए आंदोलन शांत कराने और स्थिति को नियंत्रण में लाने का सबसे सीधा रास्ता बन गया.

-भारत एक्सप्रेस



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read