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PoK में सुलगती चिंगारी और 1987 का ‘ऑपरेशन ब्रासटैक्स’, क्या इतिहास बदलने का मौका चूक गया था भारत?

PoK में जारी मौजूदा अशांति के बीच 1980 के दशक के ऑपरेशन ब्रासटैक्स और जनरल कृष्णस्वामी सुंदरजी की रणनीतिक सोच पर फिर बहस तेज हो गई है.

पाकिस्तान अधिकृत कश्मीर (PoK) में इन दिनों जिस तरह की बेचैनी और विरोध देखने को मिल रहा है, उसने एक पुराने रणनीतिक सवाल को फिर चर्चा में ला दिया है. जून 2026 से शुरू हुए प्रदर्शनों के बाद इलाके में तनाव बढ़ा हुआ है. कई जगहों पर इंटरनेट सेवाएं प्रभावित हुईं, जरूरी सामान की सप्लाई में दिक्कतें आईं और सुरक्षा बलों की कार्रवाई को लेकर स्थानीय लोगों में नाराजगी भी देखने को मिली. प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांगों में बेहतर राजनीतिक प्रतिनिधित्व, आर्थिक अधिकार और पाकिस्तान की लंबे समय से चली आ रही नीतियों में बदलाव शामिल हैं.

इस मौजूदा स्थिति के बीच भारत की सुरक्षा नीति से जुड़ा एक पुराना अध्याय 1986-87 का ऑपरेशन ब्रासटैक्स फिर याद किया जा रहा है. सवाल यह है कि क्या उस समय, जब पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम अभी पूरी तरह सामने नहीं आया था, भारत के पास ऐसा रणनीतिक अवसर था जिससे PoK को लेकर क्षेत्रीय समीकरण बदले जा सकते थे?

ऑपरेशन ब्रासटैक्स: सबसे बड़ा सैन्य अभ्यास या रणनीतिक संदेश?

नवंबर 1986 से मार्च 1987 के बीच राजस्थान के रेगिस्तान में भारतीय सेना ने ऑपरेशन ब्रासटैक्स आयोजित किया था. यह स्वतंत्र भारत के इतिहास का सबसे बड़ा सैन्य अभ्यास माना जाता है. इसमें करीब पांच लाख सैनिकों की भागीदारी, बड़ी संख्या में टैंक, बख्तरबंद वाहन और आधुनिक युद्ध तकनीकों का परीक्षण किया गया था.

उस समय सेना प्रमुख जनरल कृष्णस्वामी सुंदरजी थे, जिन्हें भारतीय सेना को आधुनिक सोच और नई युद्ध रणनीतियों के लिए तैयार करने वाला अधिकारी माना जाता है. उनका जोर तेज गति से कार्रवाई करने वाली सेना, बेहतर खुफिया व्यवस्था और जमीन तथा हवा के बीच तालमेल वाली युद्ध प्रणाली पर था.

हालांकि भारत ने इसे एक सैन्य अभ्यास बताया, लेकिन पाकिस्तान ने इसे अलग नजर से देखा. इस्लामाबाद को आशंका थी कि यह अभ्यास किसी बड़े सैन्य अभियान की तैयारी हो सकता है. इसके जवाब में पाकिस्तान ने अपनी सेना को सीमा के करीब तैनात किया और परमाणु प्रतिष्ठानों को लेकर भी सतर्कता बढ़ा दी. हालात इतने तनावपूर्ण हो गए कि दोनों देशों के बीच युद्ध की आशंका पैदा हो गई. बाद में कूटनीतिक बातचीत और अंतरराष्ट्रीय दबाव के कारण स्थिति सामान्य हुई.

सुंदरजी की रणनीतिक सोच और विवादित दावे

जनरल सुंदरजी को केवल एक सैन्य कमांडर नहीं, बल्कि भविष्य की चुनौतियों को समझने वाला रणनीतिक विचारक माना जाता था. उनके कार्यकाल में सेना के आधुनिकीकरण, मैकेनाइजेशन और तेज कार्रवाई की क्षमता बढ़ाने पर खास ध्यान दिया गया.

लेकिन ब्रासटैक्स को लेकर आज भी अलग-अलग दावे सामने आते हैं. कुछ सैन्य लेखकों और पूर्व अधिकारियों का मानना है कि यह केवल अभ्यास नहीं था, बल्कि पाकिस्तान पर रणनीतिक दबाव बनाने की एक बड़ी योजना का हिस्सा था.

कुछ चर्चाओं में “ऑपरेशन ट्राइडेंट” जैसी योजनाओं का जिक्र मिलता है, जिनमें PoK के कुछ इलाकों पर सैन्य कार्रवाई की संभावनाओं की बात कही गई थी. इन दावों के अनुसार स्कर्दू और गिलगित जैसे क्षेत्रों को लेकर विकल्पों पर विचार किया गया था. हालांकि इन योजनाओं की आधिकारिक पुष्टि कभी नहीं हुई और भारतीय सरकार तथा सेना का रुख यही रहा कि ब्रासटैक्स एक सैन्य प्रशिक्षण अभ्यास था.

उस समय प्रधानमंत्री राजीव गांधी के नेतृत्व वाली सरकार ने भी किसी बड़े टकराव से बचने का रास्ता चुना. यही वह दौर था जब सैन्य क्षमता और राजनीतिक फैसले के बीच संतुलन की अहमियत साफ दिखाई दी.

क्या परमाणु हथियारों से पहले थी कोई रणनीतिक खिड़की?

1986-87 में पाकिस्तान का परमाणु कार्यक्रम तेजी से आगे बढ़ रहा था, लेकिन उसकी परमाणु क्षमता अभी सार्वजनिक रूप से घोषित स्थिति तक नहीं पहुंची थी. भारत 1974 में अपना पहला परमाणु परीक्षण कर चुका था. कुछ रणनीतिक विशेषज्ञों का मानना है कि उस समय भारत के पास पारंपरिक सैन्य ताकत के मामले में एक बढ़त थी, जिसका इस्तेमाल भविष्य के मुकाबले अलग तरीके से किया जा सकता था.

इसके बाद पाकिस्तान ने अपनी परमाणु क्षमता को और मजबूत किया. 1998 के दोनों देशों के परमाणु परीक्षणों के बाद किसी भी बड़े सैन्य संघर्ष का जोखिम पहले से कहीं ज्यादा बढ़ गया, क्योंकि अब हर कदम के साथ परमाणु प्रतिक्रिया की आशंका जुड़ गई.

आज के दौर में ब्रासटैक्स से क्या सीख मिलती है?

जनरल सुंदरजी की विरासत को एक ही नजरिए से नहीं देखा जा सकता. वे भारतीय सेना को आधुनिक बनाने वाले प्रमुख चेहरों में शामिल रहे, लेकिन उनके कार्यकाल के कुछ अभियान और फैसले विवादों से भी जुड़े रहे.

ब्रासटैक्स ने एक महत्वपूर्ण बात साबित कि की सिर्फ सैन्य ताकत होना काफी नहीं होता है. किसी भी बड़े फैसले के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति, रणनीतिक सोच और संभावित परिणामों का सही आकलन जरूरी होता है.

आज PoK में चल रही हलचल पाकिस्तान की राजनीतिक और आर्थिक चुनौतियों को सामने ला रही है. भारत इसे पाकिस्तान की लंबे समय से चली आ रही नीतियों का परिणाम बताता है. हालांकि मौजूदा समय में हालात 1987 से काफी अलग हैं. परमाणु निरोध, वैश्विक दबाव और बदलती क्षेत्रीय राजनीति ने किसी भी सैन्य विकल्प को कहीं अधिक जटिल बना दिया है.

इतिहास में “अगर ऐसा होता तो क्या होता” जैसे सवाल हमेशा बने रहते हैं. क्या ब्रासटैक्स के दौरान भारत के पास PoK को लेकर कोई बड़ा कदम उठाने का मौका था, या फिर उस समय संयम बरतना ही बेहतर फैसला था इस पर बहस जारी रहेगी.

लेकिन इतना तय है कि ऑपरेशन ब्रासटैक्स और जनरल सुंदरजी की सोच आज भी भारत की सुरक्षा चर्चाओं में एक अहम उदाहरण बने हुए हैं. पड़ोस में बदलते हालात के बीच पुराने अनुभवों से सीख लेना ही भविष्य की रणनीति को मजबूत बना सकता है.

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-भारत एक्सप्रेस



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