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CEC Appointment Controversy: ‘कैबिनेट मंत्री PM के खिलाफ कैसे जाएगा?’ सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी पर फैसला सुरक्षित

सुप्रीम कोर्ट ने मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से जुड़े मामले में दायर याचिकाओं को संविधान पीठ के पास भेजने या नहीं भेजने के मुद्दे पर फैसला सुरक्षित रख लिया है.

supreme court

CEC Appointment Controversy: सुप्रीम कोर्ट ने देश के मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति प्रक्रिया से संबंधित मामले में दायर याचिकाओं पर सुनवाई के लिए संविधान पीठ को भेजा जाए या नही इसपर फैसला सुरक्षित रख लिया है. मामले की सुनवाई के दौरान केंद्र सरकार ने संविधान पीठ के पास भेजने की मांग की है.

जस्टिस दीपांकर दत्ता की अध्यक्षता वाली पीठ ने सभी पक्षों की जिरह के बाद फैसला सुरक्षित रखा है. कोर्ट ने सभी पक्षों से लिखित दलीले देने को कहा है. सुनवाई के दौरान सरकार ने कहा कि कानून बनाना सरकार का काम है. पिछली सुनवाई के दौरान पूर्व आईएएस अधिकारी एसएन शुक्ला ने कहा था कि विधानमंडल ने बिना सोचे समझे-समझे संशोधन को मंजूरी दे दी. मंत्री की अध्यक्षता वाली खोज समिति एकतरफा है, क्योंकि अन्य सदस्यों को भी मंत्री द्वारा ही मनोनीत किया जाता है. उन्होंने कहा था कि राजनीतिक निष्पक्षता से समझौता किया गया है. चयन समिति भी एक तरफा है.

नियुक्ति प्रक्रिया की निष्पक्षता पर सुप्रीम कोर्ट की सख्त टिप्पणी

विपक्ष ने नेता को शामिल करना मात्र निर्रथक है, क्योंकि उनकी राय को नजरअंदाज किया जा सकता है. यह केवल नाममात्र की समिति है. जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने कहा था कि एक कैबिनेट मंत्री प्रधानमंत्री के खिलाफ जा ही नही सकता है. ऐसे में सभी नियुक्तियों पर फैसला जाहिर तौर पर दो तिहाई के बहुमत से ही होगा. कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि जब देश के सीजेआई सीबीआई निदेशक की नियुक्ति प्रक्रिया में शामिल होते हैं तो मुख्य चुनाव आयुक्त और दो अन्य आयुक्तों की नियुक्ति के लिए भी एक स्वतंत्र प्रक्रिया क्यों नही हो सकती है? क्योंकि यह भी बहुत अधिक महत्वपूर्ण है.

पिछली सुनवाई में कोर्ट ने कहा था कि कोर्ट संसद को कानून बनाने का निर्देश नही दे सकता. उन्होंने कहा क्या 300 से अधिक पन्नों में की गई टिप्पणियां केवल उस व्यवस्था को सही ठहराने के लिए नही थी, जिसे अदालत ने कानून बनाने तक अस्थायी रूप से लागू किया था? क्या आप कह सकते हैं कि बनने वाला कानून भी इन्ही टिप्पणियों का पालन करें.

जया ठाकुर समेत अन्य की याचिका पर सुनवाई

उन्होंने कहा कि जब अदालत ने यह कह दिया कि मुख्य चुनाव आयुक्त और चुनाव आयुक्त का चयन केवल कार्यपालिका द्वारा नही होना चाहिए, तो वह वहीं क्यों रुक गई? अदालत ने मानक तय किए, फिर उन्हें सिर्फ कानून बनने की एक निश्चित अवधि तक ही क्यों सीमित किया? इस फैसले को साधारण रूप से पढ़ने पर स्पष्ट होता है कि यह केवल उस स्थिति से निपटने के लिए था, जहां कोई कानूनी व्यवस्था मौजूद नहीं थी. यह याचिका कांग्रेस नेता डॉक्टर जया ठाकुर सहित अन्य की ओर से दायर की गई है.

दायर याचिका में केंद्र सरकार के 2023 के उस कानून को चुनौती दी है, जिसमें चुनाव आयुक्तों की नियुक्ति करने वाली चयन समिति से भारत के मुख्य न्यायाधीश को बाहर कर दिया गया है. नए कानून के मुताबिक इस चयन समिति में प्रधानमंत्री, एक केंद्रीय कैबिनेट मंत्री और लोकसभा में विपक्ष के नेता शामिल होंगे.

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भारत एक्सप्रेस



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