उत्तर प्रदेश में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ की गो-संरक्षण नीति ने एक नया मोड़ ले लिया है. जो गो-सेवा अब तक सिर्फ आस्था और धर्म तक सीमित मानी जाती थी, वह आज युवाओं और उद्यमियों के लिए करोड़ों रुपये के कारोबार और रोजगार का जरिया बन चुकी है.
गाजियाबाद और वाराणसी जैसे शहरों में तैयार देसी गायों के ए2 बिलौना घी, पंचगव्य औषधियां और ब्यूटी प्रोडक्ट्स अब केवल भारत में ही नहीं, बल्कि अमेरिका, जापान, कनाडा और यूरोप के बाजारों में भी धूम मचा रहे हैं.
सॉफ्टवेयर और पर्यावरण इंजीनियर भी बने सफल उद्यमी
इस मुहीम की सबसे खास बात यह है कि बड़े-बड़े प्रोफेशनल्स अपनी नौकरियां छोड़कर इस क्षेत्र में कदम रख रहे हैं:
असीम रावत (गाजियाबाद): डेढ़ दशक तक विदेशी कंपनियों में बतौर सॉफ्टवेयर इंजीनियर काम करने वाले असीम ने ‘हेता ऑर्गेनिक’ की शुरुआत की. आज उनकी संस्था 150 से ज्यादा गो-आधारित उत्पाद बनाकर करीब 10 करोड़ रुपये का सालाना टर्नओवर कर रही है.
पराग गौड़ (बुलंदशहर): पर्यावरण इंजीनियर पराग लगभग 70 देसी गायों के जरिए दूध, बिलौना घी और च्यवनप्राश बनाकर सवा करोड़ रुपये का सालाना कारोबार कर रहे हैं.
सुरभि शोध संस्थान दे रहा 1000 लोगों को रोजगार
वाराणसी में समाजसेवी सूर्यकांत जालान का ‘सुरभि शोध संस्थान’ ग्रामीण आजीविका का बड़ा केंद्र बन चुका है. लखनऊ, वाराणसी, मिर्जापुर और दिल्ली में फैली इनकी गोशालाओं में 28 हजार से अधिक गोवंश हैं. गोबर और गोमूत्र से बनने वाली जैविक खाद और औषधियों के जरिए संस्थान ने 1000 से ज्यादा लोगों को सीधे रोजगार दिया है.
आत्मनिर्भर बन रही हैं प्रदेश की गोशालाएं
गो-सेवा आयोग के अध्यक्ष श्याम बिहारी गुप्ता के अनुसार, योगी सरकार देसी नस्ल की गायों के संवर्धन, जैविक खेती और ग्रामीण उद्योग को लगातार बढ़ावा दे रही है. इसका नतीजा यह है कि गोशालाएं अब सिर्फ बेसहारा मवेशियों का आश्रय स्थल नहीं रहीं, बल्कि आर्थिक आत्मनिर्भरता और रोजगार का मजबूत मॉडल बन गई हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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