Bharat Express DD Free Dish
Kanya Sumangla Mission Shakti Digital
Kanya Sumangla Mission Shakti Digital

Kawad Yatra 2026: हरिद्वार से ‘हर-हर महादेव’ बोलते हुए गंगाजल ला रहे श्रद्धालु, नजर आई 23 फीट की अद्भुत कांवड़

23 FEET SHIV KAWAD IN MEERUT: इन दिनों हरिद्वार से दक्षिण की ओर आने वाले मार्गों पर आस्था, भक्ति और उत्साह का अलौकिक संगम देखने को मिल रहा है. गाजियाबाद के निवाड़ी से आए शिवभक्तों की 23 फीट लंबी कांवड़ चर्चा का विषय बन गई है.

Vijay Ram Edited by Vijay Ram

Kawad Yatra: पवित्र सावन माह में पश्चिमी उत्तर प्रदेश के धार्मिक और प्रमुख कांवड़ मार्गों पर आस्था, भक्ति और उत्साह का अलौकिक संगम देखने को मिल रहा है. उत्तर प्रदेश के मेरठ जिले में स्थित चौधरी चरण सिंह गंगनहर कांवड़ मार्ग पर रविवार को शिवभक्ति का एक अद्भुत और अनूठा दृश्य नजर आया.

उत्तराखंड के पवित्र तीर्थ स्थल हरिद्वार से गंगाजल लेकर अपने गंतव्य की ओर लौट रहे गाजियाबाद जिले के निवाड़ी क्षेत्र के शिवभक्तों की 23 फीट लंबी कांवड़ श्रद्धालुओं और स्थानीय निवासियों के लिए विशेष आकर्षण का केंद्र बनी रही. इस कांवड़ को देखने के लिए गंगनहर मार्ग पर भारी भीड़ एकत्र हो गई, जिससे वातावरण ‘बोल बम’, ‘जय शिव शंभू’ और ‘हर-हर महादेव’ के जयकारों से गूंज उठा.

23 फीट लंबी कांवड़ बनी कौतुहल और आस्था का केंद्र

गाजियाबाद के निवाड़ी से आए शिवभक्तों का यह जत्था पूरे उत्साह, अनुशासन और समर्पण भाव के साथ कदम से कदम मिलाकर आगे बढ़ रहा था. कांवड़ की भव्य बनावट और उसकी 23 फीट लंबाई राहगीरों और अन्य कांवड़ियों के लिए भी कौतुहल का विषय बनी रही. सैकड़ों लोग इस भव्य और अलौकिक दृश्य को देखकर रुक गए और अपने मोबाइल कैमरों में फोटो व वीडियो कैद करते नजर आए. कांवड़ ला रहे श्रद्धालुओं ने बताया कि वे हर साल भगवान भोलेनाथ का जलाभिषेक करने के लिए हरिद्वार से पैदल पवित्र गंगाजल लेकर आते हैं और इस बार उन्होंने विशेष रूप से यह 23 फीट लंबी कांवड़ तैयार की है.

कांवड़यात्रियों के मार्ग में पुलिस और स्थानीय प्रशासन द्वारा सुरक्षा और यातायात के कड़े इंतजाम किए गए थे, ताकि शिवभक्तों की यात्रा बिना किसी बाधा के सुचारु रूप से जारी रहे. जगह-जगह स्थानीय नागरिकों और सेवा शिविरों द्वारा कांवड़ियों पर पुष्प वर्षा कर उनका भव्य स्वागत किया गया.

कांवड़ यात्रा का इतिहास: कैसे शुरू हुई परंपरा?

कांवड़ यात्रा भारत की सबसे प्राचीन और पवित्र धार्मिक परंपराओं में से एक है. ‘कांवड़’ शब्द संस्कृत के ‘कांवंड़ि’ या ‘कांवर’ से बना है, जिसका अर्थ होता है बांस की लकड़ी के दोनों सिरों पर टोकरी या कलश बांधकर कंधे पर ढोना.

माना जाता है कि वैदिक काल से ही पवित्र नदियों के जल से भगवान शिव का जलाभिषेक करने की परंपरा रही है. प्राचीन काल में जब यातायात के आधुनिक साधन नहीं थे, तब भक्त पैदल चलकर ही गंगा जी या अन्य पवित्र नदियों तक पहुंचते थे और वहां से जल लाकर अपने स्थानीय शिवालयों में भगवान आशुतोष का जलाभिषेक करते थे. समय के साथ यह व्यक्तिगत पूजा एक सामूहिक यात्रा और विशाल आंदोलन का रूप लेती चली गई.

पौराणिक इतिहास में कौन थे पहले कांवड़िया?

पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, कांवड़ यात्रा की शुरुआत को लेकर कई कथाएं प्रचलित हैं:

श्रवण कुमार: त्रेतायुग में अपने अंधी माता-पिता को तीर्थयात्रा कराने वाले श्रवण कुमार को पहला कांवड़िया माना जाता है. जब उनके माता-पिता ने हरिद्वार में गंगा स्नान और दर्शन की इच्छा जताई, तो श्रवण कुमार ने बांस की टोकरी की कांवड़ बनाकर उन्हें अपने कंधों पर बिठाया और यात्रा पूरी की.

परशुरामजी का प्रसंग: एक अन्य कथा के अनुसार, भगवान विष्णु के आवेशावतार महर्षि परशुराम ने सबसे पहले कांवड़ यात्रा की थी. उन्होंने हरिद्वार के पास गढ़मुक्तेश्वर से गंगाजल लाकर पुरा महादेव (बागपत, उत्तर प्रदेश) में स्थित शिवलिंग का जलाभिषेक किया था.

समुद्र मंथन के समय: समुद्र मंथन के समय जब भगवान शिव ने हलाहल (विष) का पान किया, तो उनका शरीर विष की तपन से जलने लगा. तब देवताओं ने उन पर जल अर्पित किया था.

रावण ने भी किया था अभिषेक: माना जाता है कि लंकापति रावण ने भी हरकी पौड़ी (हरिद्वार) से कांवड़ में गंगाजल लाकर पुरा महादेव में जलाभिषेक किया था.

हर साल कितने श्रद्धालु निकालते हैं यात्रा?

भारत में सावन के महीने में निकलने वाली कांवड़ यात्रा दुनिया का सबसे बड़ा वार्षिक धार्मिक पैदल समागम मानी जाती है. 

भारत में हर साल लगभग 3 करोड़ से 4 करोड़ (30 से 40 मिलियन) शिवभक्त कांवड़ यात्रा में भाग लेते हैं. उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, दिल्ली, हरियाणा, राजस्थान और मध्य प्रदेश जैसे राज्यों से लाखों की संख्या में श्रद्धालु हरिद्वार, गोमुख, ऋषिकेश, ब्रजघाट, सुल्तानगंज और बाबा बैद्यनाथ धाम (देवघर) जाते हैं.

अकेले उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड के उत्तर-पूर्वी कॉरिडोर (हरिद्वार-दिल्ली-मेरठ मार्ग) पर सावन के दौरान 2 से 2.5 करोड़ कांवड़ियों की आवाजाही दर्ज की जाती है.

सावन में कांवड़ यात्रा का धार्मिक महत्व

सावन (श्रावण) का महीना भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है. हिंदू धर्मशास्त्रों के अनुसार सावन के दौरान कांवड़ यात्रा करने का विशेष आध्यात्मिक महत्व है:

आत्म-शुद्धि और संकल्प: कठिन गर्मी और बारिश के मौसम में नंगे पांव सैकड़ों किलोमीटर की पैदल यात्रा करना शिवभक्तों के त्याग, सहनशक्ति और अटूट श्रद्धा का प्रतीक है. माना जाता है कि सावन के सोमवार को कांवड़ के पवित्र गंगाजल से महादेव का जलाभिषेक करने से मनवांछित फल की प्राप्ति होती है, सभी कायिक व मानसिक कष्ट दूर होते हैं और मोक्ष का मार्ग प्रशस्त होता है.

सामाजिक समरसता: कांवड़ यात्रा में जाति, वर्ग, ऊंच-नीच और अमीर-गरीब का भेद समाप्त हो जाता है. यात्रा के दौरान सभी श्रद्धालु एक-दूसरे को ‘बम’ या ‘कांवड़िया’ कहकर संबोधित करते हैं, जो सामाजिक एकता और भाईचारे की मिसाल कायम करता है.

यह भी पढ़िए: ओंकारेश्वर से खंडवा के लिए रवाना हुई भव्य कांवड़ यात्रा, नर्मदा से जल लेकर पैदल निकले हजारों शिव भक्त



इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.

Also Read


Kanya Sumangla Mission Shakti Digital