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‘सब कुछ आपकी मर्जी से नहीं चलेगा…’: उज्जैन में बोले डॉ. मोहन भागवत- अहंकार छोड़ नियमों को अपनाएं युवा

Yuva Dharma Sansad Ujjain Mohan Bhagwat: उज्जैन में तीन दिवसीय युवा धर्म संसद का उद्घाटन करते हुए संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने कहा कि धर्म बुढ़ापे या रिटायरमेंट के बाद का विषय नहीं है. सेवाज्ञ संस्थानम् के इस आयोजन में डॉ. भागवत ने संघ की 100 वर्षों की यात्रा और समाज में धर्म तथा राष्ट्र के उत्तरदायित्वों पर अपने विचार रखे.

Yuva Dharma Sansad Ujjain Mohan Bhagwat

Yuva Dharma Sansad Ujjain Mohan Bhagwat- bharat express

Mohan Bhagwat: धर्मनगरी उज्जैन (अवंतिका) में सेवाज्ञ संस्थानम् द्वारा आयोजित तीन दिवसीय ‘युवा धर्म संसद’ का शुभारंभ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत ने किया. इस आयोजन का मुख्य उद्देश्य युवाओं को धर्म, राष्ट्र और समाज से जुड़े मौलिक प्रश्नों पर सार्थक संवाद का मंच प्रदान करना है. उद्घाटन समारोह में सेवाज्ञ संस्थानम् के आचार्य मिथिलेशनंदिनी शरण महाराज, केंद्रीय संस्कृत विश्वविद्यालय के कुलगुरु प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी और संस्थानम् के अध्यक्ष आशीष कुमार आशु विशेष रूप से उपस्थित रहे.

धर्म जीवन की शुरुआत से अंत तक का मार्गदर्शक: डॉ. मोहन भागवत

युवा धर्म संसद को संबोधित करते हुए संघ प्रमुख डॉ. मोहन भागवत ने युवाओं की सहभागिता पर खुशी जताई. उन्होंने समाज में फैली इस धारणा पर प्रहार किया कि धर्म और ग्रंथ केवल सेवानिवृत्ति के बाद के विषय हैं. संघ प्रमुख ने कहा, “जब मैंने ‘युवा धर्म संसद’ के बारे में सुना तो मुझे बेहद खुशी हुई कि आज के युवा धर्म के बारे में गहराई से सोच रहे हैं. आमतौर पर जब भी धर्म की चर्चा होती है, लोग इसे बुढ़ापे की चीज मान लेते हैं. लोग सोचते हैं कि गीता और रामायण रिटायरमेंट के बाद पढ़ने वाली किताबें हैं, लेकिन असल में ऐसा नहीं है. धर्म तो जीवन के आरंभ से लेकर अंत तक मनुष्य के साथ बना रहता है और सृष्टि का हर विधान उसी के अनुसार संचालित होता है.”

उन्होंने अहंकार और भ्रम पर प्रकाश डालते हुए कहा कि जब कोई व्यक्ति अहंकार में आकर यह सोचने लगता है कि सब कुछ उसके नियंत्रण में है और उसकी मर्ज़ी से चलेगा, तो यह उसकी सबसे बड़ी गलतफहमी होती है. दुनिया अपनी व्यवस्था और नियमों से ही चलती है, चाहे मनुष्य इसमें विश्वास करे या न करे.

संघ की 100 वर्षों की यात्रा और सामाजिक उत्तरदायित्व

उज्जैन प्रवास के दौरान सरसंघचालक ने महाकाल परिसर स्थित अरविंद नगर में प्रांत, विभाग, महानगर, नगर और बस्ती के दायित्ववान स्वयंसेवकों को भी संबोधित किया. अपने एक घंटे के संबोधन में उन्होंने आरएसएस की शताब्दी यात्रा और भावी संकल्पों को रेखांकित किया. डॉ. भागवत ने कहा कि एक समय था जब संघ को लेकर लोगों में अलग विचारधारा थी और संगठन को प्रतिबंधों का भी सामना करना पड़ा. लेकिन आज समाज में संघ की स्वीकार्यता व्यापक और सर्वव्यापी हो चुकी है. संघ के 100 वर्ष पूरे होने के साथ ही हमारी सामाजिक भूमिका और जिम्मेदारियां और अधिक बढ़ गई हैं. उन्होंने स्वयंसेवकों से पर्यावरण संरक्षण, जल संरक्षण, सामाजिक समरसता और नागरिक अनुशासन जैसे महत्वपूर्ण विषयों पर निरंतर सक्रिय रहने का आह्वान किया.

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गहन चिंतन और संवाद के विभिन्न सत्र

युवा धर्म संसद के पहले दिन दो महत्वपूर्ण वैचारिक सत्रों का आयोजन किया गया:
धर्म की अस्तित्वपरक अवधारणा एवं चारित्रिक उत्तरदायित्व: दोपहर के इस सत्र में आचार्य महामंडलेश्वर अवधेशानंद गिरि महाराज, प्रसिद्ध गीतकार मनोज मुंतशिर, प्रो. श्रीनिवास वरखेड़ी, स्मृति अनंतलक्ष्मी और जे. नंदकुमार ने धर्म के व्यावहारिक व नैतिक स्वरूप पर अपने विचार रखे.
निरंकुश संवाद-पद्धति तथा सूचना एवं विचार का संघर्ष: शाम के सत्र में आधुनिक मीडिया और वैचारिक चुनौतियों पर मंथन हुआ. इसमें आचार्य पुंडरीक गोस्वामी महाराज, मां सद्विद्यानंद, दैनिक जागरण-नईदुनिया समूह के कार्यकारी संपादक विष्णु प्रकाश त्रिपाठी और आईआईएम इंदौर के निदेशक प्रो. हिमांशु राय ने प्रमुखता से भाग लिया.
यह तीन दिवसीय आयोजन युवाओं को अपनी सांस्कृतिक जड़ों से जोड़ने और राष्ट्र निर्माण में उनकी भूमिका तय करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण पहल साबित हो रहा है.

भारत एक्सप्रेस



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