Kejriwal Contempt Case: दिल्ली हाई कोर्ट ने केजरीवाल और आप नेताओं द्वारा कोर्ट की कार्यवाही के वीडियो सोशल मीडिया पर अपलोड किए जाने के मामले में लिए गए स्वतः संज्ञान पर चार सप्ताह बाद सुनवाई करेगा. मामले की सुनवाई के दौरान कोर्ट को बताया गया कि आप नेताओं को अभी तक हाई कोर्ट से संबंधित कागजात नहीं मिले हैं, तो हाई कोर्ट ने उन्हें रजिस्ट्री से संपर्क करने को कहा है.
हाई कोर्ट ने केजरीवाल और अन्य को दिया 4 हफ्ते का समय
हाई कोर्ट ने केजरीवाल और अन्य लोगों को आपराधिक अवमानना मामले में अपना जवाब दाखिल करने के लिए चार सप्ताह का समय दे दिया है. केजरीवाल सहित अन्य के खिलाफ अवमानना याचिका दायर करने वाले वकील अशोक चैतन्य ने दिल्ली हाई कोर्ट को बताया कि केजरीवाल, सौरव दास, और अन्य लोगों ने कथित तौर पर अवमाननापूर्ण ट्वीट डिलीट नहीं किए हैं. पिछली सुनवाई में वकील अशोक चैतन्य ने कहा था कि ट्वीट डिलीट कर दिए गए थे. चैतन्य ने यह भी बताया कि पिछली सुनवाई में उन्होंने बताया था कि ट्वीट डिलीट कर दिए गए है, लेकिन वह कंटेंट अभी भी उपलब्ध है.
‘डिजिटल रिकॉर्ड हमारे पास सुरक्षित’, बेंच के सामने याचिकाकर्ता का हलफनामे वाला दांव
हाई कोर्ट ने चैतन्य से हलफनामे के जरिए उस कंटेंट को रिकॉर्ड पर लाने को कहा है. पिछली सुनवाई दौरान कोर्ट को बताया था कि अरविंद केजरीवाल, मनीष सिसोदिया, सौरभ भारद्वाज, पत्रकार सौरभ दास और गोपाल राय ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ सोशल मीडिया से पोस्ट को हटा दिया गया है. जिसपर इनलोगों के खिलाफ आपराधिक मुकदमा दायर करने वाले वकील अशोक चैतन्य ने कहा था कि आपत्तिजनक सोशल मीडिया पोस्ट हटा दिए गए हैं. याचिकाकर्ता ने यह जानकारी जस्टिस नवीन चावला और जस्टिस रविंदर डुडेजा की बेंच को दिया था. उन्होंने कोर्ट को बताया था कि भले ही सामग्री हटाई गई प्रतीत हो रही हो, लेकिन उनके पास डिजिटल रिकॉर्ड मैजुद है.
गूगल की दोटूक: ‘यूट्यूब पर बिना URL वीडियो रोकना तकनीकी रूप से नामुमकिन’
कोर्ट ने याचिकाकर्ता की मांग पर इसे रिकॉर्ड पर ले लिया है. अदालत ने हाई कोर्ट के रजिस्ट्री को निर्देश दिया था कि वह सभी संबंधित सामग्री प्रतिवादियों को उपलब्ध कराए. इससे पहले गूगल ने अपना जवाब दाखिल कर कहा था कि उसके लिए यूट्यूब पर कोर्ट की कार्यवाही की अनाधिकृत रिकॉर्डिंग की पहचान करना या उन्हें दोबारा अपलोड होने से रोकना तकनीकी और व्यवहारिक रूप से संभव नहीं है. गूगल ने कोर्ट को स्पष्ट किया था कि वह केवल उन्हीं वीडियो को हटा सकता है, जिनके यूआरएल या वेबलिंक उपलब्ध कराए जाएं. सर्च इंजन गूगल ने दायर हलफनामे में यह भी कहा था कि उसके लिए ये संभव नहीं कि यूट्यूब पर वो कोर्ट की कार्यवाही के अनाधिकृत रेकॉर्डिंग और उसके अपलोड या शेयर करने पर नजर रख सके.
‘बिना वेबलिंक कार्रवाई असंभव’, गूगल ने हलफनामे में दी पूरे देश की अदालतों की मिसाल
गूगल ने यह भी कहा था कि ऐसे रेकॉर्डिंग यूट्यूब से बाहर किए जाते हैं और उसके लिए ये पता करना असंभव है कि वीडियो में कोर्ट की कार्यवाही है या नहीं. सर्च इंजन ने कहा था कि वे ये भी पता नहीं लगा पाएगी कि रेकॉर्डिंग अनाधिकृत है या नहीं. इसको लेकर देश भर की अदालतों का अलग-अलग फैसला है. गूगल ने अपने हलफनामे में कहा था कि वो उन्हीं वीडियो को हटा सकता है जिनके यूआरएल या वेबलिंक बताए जाए. दरअसल जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने अवमानना की कार्रवाई करने का आदेश जारी करते हुए दोनों मामलों से अपने आप को अलग कर लिया था केजरीवाल सहित अन्य ने स्वर्णकांता शर्मा को पत्र लिखकर केस से हटने की मांग की थी. जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा के खिलाफ सोशल मीडिया पर आरोप लगाने के चलते अवमानना की कार्रवाई शुरू करने को कहा था.
‘जज सत्ता के सामने झुक नहीं सकता’, अवमानना पर जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की तल्ख टिप्पणी
जस्टिस स्वर्णकांता शर्मा ने सख्त टिप्पणी करते हुए कहा था कि एक जज सत्ता के सामने झुक नहीं सकता. उन्होंने कहा था कि ‘जब संस्था दांव पर हो, तब अदालत को सुविधा नहीं बल्कि साहस चुनना होता है. यह अदालत सुविधा के बजाय साहस का रास्ता चुनेगी.’ हाईकोर्ट ने कहा था कि अवमानना करने वालों ने गलतफहमी पाल ली है कि उनके बयानों और सामग्री को ‘जनमत’ का रूप देकर बचाया जा सकता है. कोर्ट ने कहा था कि अवमानना कानून सिर्फ किसी व्यक्ति की नहीं, बल्कि पूरी न्यायिक संस्था की रक्षा करता है. हाईकोर्ट ने कहा था कि ‘एक जज सत्ता के सामने झुक नहीं सकता. जब संस्था दांव पर हो, तब अदालत को सुविधा नहीं बल्कि साहस चुनना होता है. यह अदालत सुविधा के बजाय साहस का रास्ता चुनेगी.’
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-भारत एक्सप्रेस
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