कांग्रेस की वरिष्ठ नेता सोनिया गांधी का नाम मतदाता सूची (वोटर लिस्ट) में कथित तौर पर समय से पहले शामिल किए जाने से जुड़े मामले में राऊज एवेन्यु कोर्ट ने एक बड़ा फैसला सुनाया है. विशेष न्यायाधीश (Special Judge) डॉ. विशाल गोगने की अदालत ने मजिस्ट्रेट कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया है, जिसमें सोनिया गांधी के खिलाफ एफआईआर दर्ज करने के निर्देश देने से इनकार कर दिया गया था.
विशेष अदालत ने मजिस्ट्रेट कोर्ट को निर्देश दिया है कि वह इस मामले पर दोबारा विचार करे और पुलिस से रिपोर्ट भी तलब करे. इस मामले में अगली सुनवाई 27 सितंबर को होगी.
विशेष अदालत की टिप्पणी
सेशन कोर्ट ने सुनवाई के दौरान मजिस्ट्रेट कोर्ट के आदेश को ‘विकृत और अनुचित’ (Perverse and Improper) करार दिया. विशेष जज ने कहा कि मजिस्ट्रेट कोर्ट ने याचिका खारिज करते समय यह स्पष्ट नहीं किया कि सोनिया गांधी के खिलाफ एफआईआर क्यों दर्ज नहीं होनी चाहिए.
इससे पहले, मजिस्ट्रेट कोर्ट ने 11 सितंबर को वकील विकास त्रिपाठी द्वारा दायर की गई शिकायत को खारिज कर दिया था, जिसके खिलाफ याचिकाकर्ता ने सेशन कोर्ट में यह रिवीजन पिटीशन (पुनरीक्षण याचिका) दायर की थी.
सोनिया गांधी के वकीलों का पक्ष
याचिकाकर्ता के आरोप: वकील विकास त्रिपाठी की ओर से दायर शिकायत में दावा किया गया था कि सोनिया गांधी का नाम भारतीय नागरिकता मिलने से पहले ही वर्ष 1980 में नई दिल्ली निर्वाचन क्षेत्र की मतदाता सूची में दर्ज करा दिया गया था.
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याचिका में कहा गया था कि वोटर लिस्ट में नाम दर्ज कराने के लिए भारतीय नागरिक होना अनिवार्य है, जबकि आधिकारिक दस्तावेजों के अनुसार सोनिया गांधी अप्रैल 1983 में भारत की नागरिक बनी थीं. याचिका में यह भी तर्क दिया गया कि यह मामला कथित तौर पर फर्जी दस्तावेजों या धोखाधड़ी से जुड़ा हुआ है. बीजेपी ने भी पहले यह आरोप लगाया था कि सोनिया गांधी ने नागरिकता मिलने से पहले ही अपना नाम वोटर लिस्ट में जुड़वा लिया था.
बचाव पक्ष की दलील: सोनिया गांधी की ओर से पेश वरिष्ठ वकील आर.एस. चीमा ने इस याचिका का पुरजोर विरोध किया. सुनवाई के दौरान अदालत ने भी याचिकाकर्ता से सवाल किया था कि यह मामला काफी पुराना है और क्या इस बात का कोई पुख्ता सबूत है कि आवेदन करने से पहले वह नागरिक नहीं थीं? सोनिया गांधी की तरफ से इस पूरी कानूनी कार्रवाई और याचिका का कड़ा विरोध किया गया है.
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