1918 की हाइफा जंग की वीरगाथा
Haifa Day 2026: भारतीय सेना हर वर्ष 23 सितंबर को हाइफा दिवस मनाती है. यह दिन सिर्फ एक स्मृति नहीं, बल्कि उन तीन बहादुर कैवेलरी रेजीमेंटों मैसूर लांसर्स, हैदराबाद लांसर्स और जोधपुर लांसर्स की वीरता का जीवंत सम्मान है, जिन्होंने 1918 में प्रथम विश्व युद्ध के दौरान वर्तमान इजराइल के प्रमुख शहर हाइफा को ओटोमन (तुर्की) कब्जे से मुक्त कराया था.
प्रथम विश्व युद्ध के अंतिम चरण में सिनई और फिलिस्तीन अभियान चल रहा था. ब्रिटिश साम्राज्य की सेनाएं जनरल एडमंड एलेनबी के नेतृत्व में ओटोमन साम्राज्य और उसके सहयोगी जर्मन व ऑस्ट्रियाई बलों के खिलाफ आगे बढ़ रही थीं. हाइफा एक महत्वपूर्ण बंदरगाह था. इसे कब्जे में लिए बिना आगे की आपूर्ति और अभियान कठिन था.
इस काम के लिए 15वीं इंपीरियल सर्विस कैवेलरी ब्रिगेड को चुना गया. इसमें मुख्य रूप से भारतीय रियासतों की सेनाएं शामिल थीं. जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद के लांसर्स. ये सैनिक मुख्य रूप से भाले (लांस) और तलवारों से लैस थे. उनके सामने आधुनिक मशीनगन, तोपें और मजबूत रक्षात्मक मोर्चे थे.
23 सितंबर 1918: अविश्वसनीय चार्ज
23 सितंबर 1918 को ब्रिगेड को हाइफा पर हमला करने का आदेश मिला. जोधपुर लांसर्स को मुख्य मोर्चा सौंपा गया, जबकि मैसूर लांसर्स माउंट कार्मेल की ढलानों पर दुश्मन की तोपों पर हमला करने और शहर को घेरने का काम कर रहे थे. हैदराबाद लांसर्स समर्थन में थे.

आक्रमण का नेतृत्व मेजर ठाकुर दलपत सिंह शेखावत (जोधपुर लांसर्स) कर रहे थे. वे राजपूत परिवार से थे और पहले भी अबू तुलुल में बहादुरी दिखा चुके थे. उन्होंने सिर्फ अपने ट्रंपेटर के साथ एक मजबूत मशीनगन पोजीशन पर चार्ज किया, दुश्मन को तितर-बितर किया और गन कब्जे में ली. इसी दौरान वे गंभीर रूप से घायल हुए और बाद में शहीद हो गए. उनकी वीरता के लिए उन्हें मरणोपरांत मिलिट्री क्रॉस से सम्मानित किया गया. उन्हें “हीरो ऑफ हाइफा” कहा जाता है.
मेजर दलपत सिंह के शहीद होने के बाद कैप्टन अमन सिंह बहादुर ने कमान संभाली और अंतिम चार्ज का नेतृत्व किया. घोड़ों की तेज दौड़, भालों की मार और तलवारों के वार के साथ भारतीय सैनिकों ने दुश्मन के मोर्चों को तोड़ दिया. यह हमला इतना तेज और साहसी था कि इतिहासकारों ने इसे “दुनिया के आखिरी महान कैवेलरी चार्जों” में से एक माना. कुछ स्रोतों में इसे “किलेबंद शहर पर घुड़सवार सेना द्वारा सरपट हमला कर कब्जा” करने का दुर्लभ उदाहरण बताया गया है.
परिणाम और बलिदान
युद्ध में भारतीय पक्ष के लगभग 8 सैनिक शहीद हुए और 34 घायल हुए. दर्जनों घोड़े भी मारे गए या घायल हुए. इसके बदले में उन्होंने सैकड़ों (कुछ स्रोतों में 700 से अधिक, कुछ में 1,350 तक) ओटोमन और जर्मन सैनिकों को कैदी बनाया, 17 फील्ड गन और 11 मशीनगन कब्जे में लीं. हाइफा कुछ ही घंटों में मुक्त हो गया.
यह जीत ओटोमन साम्राज्य के क्षेत्रीय पतन की दिशा में महत्वपूर्ण कदम साबित हुई और सहयोगी सेनाओं को आगे दमिश्क की ओर बढ़ने का रास्ता मिला.
हाइफा दिवस का महत्व
भारतीय सेना आज भी इस दिन को श्रद्धांजलि के रूप में मनाती है. नई दिल्ली में तीन मूर्ति हाइफा चौक पर स्मारक है, जहां तीन घुड़सवार सैनिकों की मूर्तियां जोधपुर, मैसूर और हैदराबाद लांसर्स का प्रतिनिधित्व करती हैं. ये रेजीमेंट आज 61वीं कैवेलरी का हिस्सा हैं.
इजराइल में भी हाइफा के ब्रिटिश मिलिट्री सेमेटरी पर हर वर्ष भारतीय और इजराइली अधिकारी श्रद्धांजलि अर्पित करते हैं. 2018 में शताब्दी वर्ष पर इजराइल पोस्ट ने भारतीय कैवेलरी की याद में डाक टिकट जारी किया, जिसमें जोधपुर लांसर्स से जुड़े प्रतीक शामिल थे. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 2017 में हाइफा में भारतीय सैनिकों के स्मारक पर श्रद्धांजलि अर्पित की थी.
हाल के वर्षों में हाइफा नगर पालिका ने अपने स्कूलों के इतिहास के पाठ्यक्रम में भी सुधार किया है और स्पष्ट रूप से लिखा है कि शहर को ब्रिटिश नहीं, बल्कि भारतीय सैनिकों ने मुक्त कराया था.
हाइफा दिवस हमें याद दिलाता है कि भारतीय सैनिकों की वीरता सिर्फ भारत की सीमाओं तक सीमित नहीं रही. भाले और तलवार लेकर मशीनगन के सामने खड़े होने वाले इन योद्धाओं ने साबित किया कि साहस और अनुशासन किसी भी हथियार से बड़ा होता है.
मेजर दलपत सिंह और उनके साथियों का बलिदान आज भी हमें प्रेरित करता है. 23 सितंबर को जब भारतीय सेना इस दिन को मनाती है, तो वह सिर्फ एक युद्ध की याद नहीं ताजा करती. वह उन अनगिनत भारतीय जवानों को नमन करती है जिन्होंने विदेशी भूमि पर भी मातृभूमि का मान ऊंचा रखा.
-भारत एक्सप्रेस
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