Fundamental Duties: भारतीय संविधान और महात्मा गांधी के विचारों का संबंध अनूठा और विरोधाभासी रहा है. जहां एक तरफ संविधान निर्माताओं ने व्यक्तिगत अधिकारों को प्राथमिकता दी, वहीं गांधीजी का अटूट विश्वास था कि अधिकार केवल कर्तव्यों के निष्ठापूर्वक पालन से ही प्राप्त होते हैं. गांधी जयंती के अवसर पर यह लेख संविधान सभा की बहसों, ग्राम-स्वराज की उपेक्षित संकल्पना और संविधान में गांधीवादी सिद्धांतों के समावेश की एक गहन समीक्षा प्रस्तुत करता है.
संविधान में गांधी कहां हैं?
अक्टूबर-नवंबर 1949 में जब संविधान का मसौदा संविधान सभा में अंतिम बार चर्चा के लिए आया, तब सभा के गांधीवादी एक दुविधा में थे. महात्मा नहीं रहे थे और संविधान में गांधीवादी प्रावधान ढूंढ़ने के लिए आवर्धक लेंस चाहिए थी.
कुछ सदस्यों ने रचनात्मक व्याख्या की. जी. दुर्गाबाई जैसी स्वतंत्रता सेनानी, जो नमक सत्याग्रह में शामिल रहीं, ने कहा कि नागरिकों के कर्तव्य पाठ में निहित हैं और निर्देशक सिद्धांत (जिनमें शराबबंदी और गौ-हत्या रोक जैसे गांधीवादी विचार शामिल हैं) बाध्यकारी माने जाने चाहिए. एम. अनंतशयनम अय्यंगर (बाद में लोकसभा अध्यक्ष) ने स्वीकार किया कि गांधी के विचारों को संविधान में उतारना कठिन है. वे गांव को शासन की बुनियादी इकाई बनाना चाहते थे, लेकिन समझते थे कि भारत इसके लिए तैयार नहीं है. शंकरराव देव का कथन सबसे स्पष्ट था-वे नए संविधान से खुश थे, पर ईमानदारी से स्वीकार किया: ‘हमने अपने गुरु का पूरी तरह अनुसरण नहीं किया.’
अधिकारों से ऊपर कर्तव्य
गांधीवादी राजनीतिक चिंतन का मूल आधार कर्तव्य था. व्यक्ति स्वयं और दूसरों के प्रति सत्य व अहिंसा का कर्तव्य रखता है. राज्य का भी कर्तव्य है कि वह नागरिकों के हित में ईमानदारी से काम करे. लेकिन भारतीय संविधान अधिकारों को कर्तव्यों से ऊपर रखता है.
संविधान निर्माताओं के लिए 1935 के भारत शासन अधिनियम (जिससे संविधान का लगभग एक-तिहाई हिस्सा लिया गया) में सबसे महत्वपूर्ण बदलाव मौलिक अधिकारों का अध्याय था. यह स्वतंत्रता आंदोलन की लगातार मांग थी-पूर्ण स्वराज घोषणा (1929) से लेकर करांची प्रस्ताव (1931) और नेहरू-सप्रू जैसे मसौदों तक. स्वतंत्र भारतीयों को अब ऐसे अधिकार मिलने थे जिन्हें राज्य सम्मान देने को बाध्य हो-अभिव्यक्ति, यात्रा, निवास, व्यापार और सबसे बुनियादी-जीवन व व्यक्तिगत स्वतंत्रता का अधिकार.
यह सार्वभौमिक मानवाधिकार की उस उभरती समझ का परिणाम था जो हर व्यक्ति में अंतर्निहित और बिना शर्त उपलब्ध मानी जाती है. गांधी का कर्तव्य-आधारित दृष्टिकोण इसके विपरीत था. उनके अनुसार कायस्थ को ब्राह्मण के समान व्यवहार पाने का अधिकार तभी मिलता जब वह स्वयं अस्पृश्यता का त्याग करे. यह संविधान द्वारा अपनाए गए मौलिक अधिकार ढाँचे के सीधे विरोध में था.
गांधी स्वयं इसे समझते थे. उनके लिए संविधान एक नीति-दस्तावेज था-‘अनिवार्य रूप से एक अस्थायी उपाय जिसे परिस्थितियों के अनुसार बदला जा सकता है.’ कोई बेटा नीति के कारण माता-पिता के प्रति अपना कर्तव्य पूरा नहीं कर सकता. इसी तरह संविधान में अस्पृश्यता का निषेध मात्र अभ्यास को नहीं रोक सकता. पहले लोगों को बदलना होगा, संविधान बाद में आएगा.
दिल्ली बनाम ग्राम-स्वराज्य
जब कांग्रेस पार्टी और फिर संविधान निर्माताओं ने नई दिल्ली में शक्तिशाली केंद्रीय सरकार वाला मजबूत संवैधानिक राज्य स्थापित किया, तब गांधी अपेक्षाकृत चुप रहे. यह मॉडल उनके संवैधानिक विश्वासों के विरुद्ध था.
आंध (पुणे के पास एक छोटी रियासत) का संविधान गांधीवादी विचारों का एक दुर्लभ उदाहरण था. अमेरिकी इंजीनियर-रहस्यवादी मॉरिस फ्राइडमैन की सहायता से लिखा गया यह संविधान आत्मनिर्भर ग्राम समुदायों को शासन की बुनियादी इकाई मानता था. चुनी हुई ग्राम पंचायत शीर्ष पर थी और शक्ति ऊपर से नीचे नहीं, बल्कि पंचायत से ऊपर की ओर बहती थी. नागरिकों के अधिकार थे, राज्य के कर्तव्य, और औपचारिक अदालती व्यवस्था समाप्त कर दी गई थी. गांधी ने इसे ‘उदात्त उदाहरण’ कहा, लेकिन स्वीकार किया कि लगभग 75,000 लोगों वाली रियासत का प्रयोग पूरे भारत के लिए मॉडल नहीं बन सकता.
इसी यथार्थवाद के कारण श्रीरामपुर में (कांग्रेस विशेषज्ञ समिति के बड़े राज्य वाले प्रस्ताव के एक महीने बाद) गांधी ने न केवल उस प्रस्ताव का समर्थन किया बल्कि सक्रिय रूप से समर्थन माँगा क्योंकि इससे सभी समुदायों को न्याय’ मिलेगा. संविधान के मामले में वे यथार्थवादी थे. उन्होंने समझा कि ग्राम-स्वराज्य पर आधारित क्रांतिकारी संविधान मुस्लिम लीग और अन्य दलों को स्वीकार नहीं होगा. गांधीवादी संविधान अपने समय में आएगा.
सहमति और समझौता
आज गांधी जयंती पर संविधानवादी गांधी को याद करना हमें याद दिलाता है कि उनके दृष्टिकोण को आंशिक रूप से भी प्राप्त करने में हमें अभी कितना आगे जाना है. अधिकारों की सार्वभौमिकता व्यापक रूप से स्वीकृत है, लेकिन मौलिक कर्तव्य अभी भी संविधान का एक उपेक्षित अध्याय हैं. न तो इस विषय पर गंभीर काम हुआ है, न नागरिक या राज्य कर्तव्य की भावना को गंभीरता से लेते हैं.
73वें संविधान संशोधन से पंचायती राज संस्थाओं को बढ़ावा मिला, लेकिन संघ और राज्य सरकारों द्वारा सत्ता का वास्तविक हस्तांतरण न होने से उनकी संभावना अधूरी रह गई.
आज गांधी जयंती पर यदि हम उनकी स्मृति के प्रति सच्चे रहना चाहते हैं, तो हमें एक क्षण अपने दूसरों के प्रति कर्तव्यों पर और आपसी विश्वास बनाने पर सोचना चाहिए. उसी संवैधानिक नींव पर भारत समृद्ध हो सकता है.
-भारत एक्सप्रेस
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