चीन और अमेरिका की तुलना आमतौर पर लोकतंत्र बनाम कम्युनिज्म, पूंजीवाद बनाम समाजवाद या आर्थिक ताकत के आधार पर की जाती है. लेकिन डैन वांग अपनी किताब Breakneck: China’s Quest to Engineer the Future में इस बहस को एक अलग दिशा देते हैं. उनका सवाल है कि आखिर दोनों देशों में काम करने का तरीका इतना अलग क्यों है?
वांग का मानना है कि चीन और अमेरिका जितने अलग दिखाई देते हैं, कई मायनों में उतने ही एक जैसे भी हैं. दोनों समाजों में आर्थिक सफलता को बहुत महत्व दिया जाता है. बड़े कारोबारी और सफल उद्यमी बेहद सम्मान पाते हैं. तकनीक, बड़े प्रोजेक्ट और तेज आर्थिक विकास को लेकर दोनों देशों में खासा उत्साह दिखाई देता है. दोनों जगह यह विश्वास भी मजबूत है कि उनका देश दुनिया में खास स्थान रखता है.
यहीं से वांग की किताब दिलचस्प हो जाती है. उनके मुताबिक असली फर्क इस बात में छिपा है कि दोनों देशों की व्यवस्था में किस तरह की सोच ज्यादा प्रभावशाली है.
चीन में इंजीनियरिंग वाली सोच का दबदबा
वांग चीन को एक तरह का “इंजीनियरिंग स्टेट” बताते हैं. यानी ऐसी व्यवस्था, जहां समस्याओं को एक इंजीनियर की तरह देखा जाता है. उन्हें हिस्सों में बांटो, आंकड़ों के आधार पर समाधान खोजो और फिर बड़े पैमाने पर उसे लागू कर दो.
चीन के विकास की रफ्तार को देखें तो इस सोच की झलक साफ मिलती है. हाई-स्पीड रेल, एक्सप्रेसवे, पुल, बंदरगाह, सोलर पैनल, पवन ऊर्जा और विशाल औद्योगिक संयंत्रों का निर्माण जिस गति से हुआ है, उसने दुनिया का ध्यान खींचा है.
वांग यह भी बताते हैं कि चीन के राजनीतिक नेतृत्व में लंबे समय तक इंजीनियरिंग और तकनीकी पृष्ठभूमि वाले लोगों की मजबूत मौजूदगी रही. चीन के मौजूदा राष्ट्रपति शी जिनपिंग ने भी रासायनिक इंजीनियरिंग की पढ़ाई की है.
इंजीनियरिंग की यह शैली बड़े और जटिल कामों को जल्दी पूरा करने में मदद कर सकती है. लेकिन इसकी एक कीमत भी है.
जब समाज को भी एक इंजीनियरिंग प्रोजेक्ट मान लिया जाए
वांग के मुताबिक समस्या तब शुरू होती है, जब यही सोच सिर्फ पुल, सड़क या फैक्ट्री तक सीमित नहीं रहती और पूरे समाज पर लागू होने लगती है.
चीन की एक-बच्चा नीति इसका बड़ा उदाहरण है. जनसंख्या को नियंत्रित करने के लिए राज्य ने लंबे समय तक बेहद सख्त कदम उठाए. इसी तरह कोरोना महामारी के दौरान लागू की गई जीरो-कोविड नीति में भी सरकार ने संक्रमण को नियंत्रित करने के लिए व्यापक और कठोर प्रतिबंध लगाए.
वांग के तर्क के मुताबिक ऐसी व्यवस्था में व्यक्तिगत पसंद और स्वतंत्रता कई बार सामूहिक लक्ष्य के पीछे चली जाती है. निगरानी और राजनीतिक नियंत्रण को लेकर भी चीन की व्यवस्था पर लंबे समय से सवाल उठते रहे हैं.
इसलिए चीन की तेज रफ्तार को समझते समय सिर्फ यह देखना पर्याप्त नहीं है कि उसने क्या बनाया. यह देखना भी जरूरी है कि उसे बनाने के लिए किस तरह की व्यवस्था अपनाई गई.
अमेरिका की कहानी बिल्कुल दूसरी है
वांग इसके उलट अमेरिका को ऐसी समाज-व्यवस्था के रूप में देखते हैं, जहां कानून और कानूनी प्रक्रियाओं का प्रभाव बहुत ज्यादा है. उनकी किताब में इसे “लॉयरली सोसाइटी” यानी वकीलों वाली व्यवस्था के रूप में पेश किया गया है.
अमेरिका में किसी बड़े प्रोजेक्ट को शुरू करने से पहले नियम, अनुमति, पर्यावरण संबंधी प्रावधान, मुकदमे और दूसरी कानूनी प्रक्रियाएं सामने आ सकती हैं. इससे नागरिक अधिकारों और जवाबदेही की रक्षा होती है, लेकिन कई बार यही प्रक्रियाएं निर्माण की गति को भी धीमा कर देती हैं.
वांग चीन और अमेरिका के बीच बुनियादी ढांचे का अंतर इसी नजरिए से देखते हैं. चीन ने कुछ दशकों में दुनिया का सबसे बड़ा हाई-स्पीड रेल नेटवर्क खड़ा कर दिया, जबकि अमेरिका में कई बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट वर्षों तक चर्चा, मंजूरी और कानूनी प्रक्रियाओं में उलझे रह सकते हैं.
इसी तरह चीन की मैन्युफैक्चरिंग क्षमता और जहाज निर्माण उद्योग का पैमाना अमेरिका से काफी बड़ा है. दूसरी तरफ अमेरिका में औद्योगिक आधार के कमजोर होने को लेकर लंबे समय से बहस चलती रही है.
दोनों मॉडलों की अपनी कीमत है
वांग का तर्क यह नहीं है कि चीन का मॉडल पूरी तरह सही है और अमेरिका का गलत. असल में उनकी किताब की खासियत यही है कि वे दोनों व्यवस्थाओं की ताकत और कमजोरियों को साथ रखकर देखते हैं.
चीन तेजी से निर्माण कर सकता है. वह बड़े पैमाने पर संसाधन जुटाकर कुछ ही वर्षों में ऐसे प्रोजेक्ट पूरे कर सकता है, जिनमें दूसरे देशों को कहीं ज्यादा समय लग सकता है. लेकिन केंद्रीकृत व्यवस्था का दूसरा पहलू यह है कि गलत फैसला होने पर उसका असर भी बहुत बड़े स्तर पर हो सकता है.
अमेरिका में निर्णय लेने की प्रक्रिया धीमी हो सकती है. कई बार नियम और कानूनी चुनौतियां किसी प्रोजेक्ट को आगे बढ़ने से रोकती हैं. लेकिन यही संस्थागत व्यवस्था व्यक्तिगत अधिकारों, पारदर्शिता और जवाबदेही के लिए सुरक्षा भी उपलब्ध कराती है.
यानी एक तरफ गति है, तो दूसरी तरफ प्रक्रिया. एक तरफ बड़े पैमाने पर निर्माण की क्षमता है, तो दूसरी तरफ अधिकारों और संस्थागत नियंत्रण पर जोर.
अमेरिका के लिए भी एक संदेश
वांग की किताब का एक महत्वपूर्ण पहलू यह है कि वे अमेरिका को सिर्फ चीन से सावधान रहने की सलाह नहीं देते. वे यह सवाल भी उठाते हैं कि अमेरिका ने खुद निर्माण और मैन्युफैक्चरिंग की अपनी क्षमता को कितना कमजोर होने दिया है.
उनके नजरिए से अमेरिका को बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर बनाने, औद्योगिक उत्पादन बढ़ाने और इंजीनियरिंग क्षमता को मजबूत करने पर ज्यादा ध्यान देना चाहिए. सिर्फ यह कहना पर्याप्त नहीं कि किसी प्रोजेक्ट में क्या-क्या कानूनी अड़चनें हैं; यह भी जरूरी है कि देश आखिर बनाना क्या चाहता है और उसे बनाने की क्षमता उसके पास कितनी है.
वहीं चीन के संदर्भ में दूसरी तरह की सीख सामने आती है—तेजी और तकनीकी क्षमता के साथ व्यक्तिगत अधिकार, बहुवाद और संस्थागत स्वतंत्रता भी जरूरी हैं.
रिपोर्टिंग, अनुभव और विश्लेषण का मेल
Breakneck को खास बनाती है इसकी शैली भी. डैन वांग ने चीन में करीब छह साल टेक्नोलॉजी एनालिस्ट के तौर पर काम किया और देश के अलग-अलग हिस्सों को करीब से देखा. किताब में शंघाई, चोंगकिंग और शेनझेन जैसे बड़े शहरों के साथ-साथ चीन के ग्रामीण इलाकों के अनुभव भी शामिल हैं.
इसी वजह से किताब सिर्फ आंकड़ों और नीतियों की चर्चा तक सीमित नहीं रहती. इसमें जमीन पर दिखाई देने वाला चीन भी नजर आता है—उसकी फैक्ट्रियां, निर्माण परियोजनाएं, कारोबारी संस्कृति और तेजी से बदलता समाज.
कई चर्चित विचारकों ने किताब की काफी सराहना की है. अर्थशास्त्री और लेखक टाइलर कोवेन ने इसे चीन पर हाल के वर्षों की बेहतरीन किताबों में शामिल किया है.
चीन-अमेरिका की होड़ को देखने का नया नजरिया
आज चीन और अमेरिका के बीच प्रतिस्पर्धा सिर्फ व्यापार या सैन्य ताकत तक सीमित नहीं है. तकनीक, सेमीकंडक्टर, ऊर्जा, इलेक्ट्रिक वाहन, जहाज निर्माण, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और बुनियादी ढांचे जैसे क्षेत्रों में भी दोनों देशों की क्षमता और रणनीति पर पूरी दुनिया की नजर है.
ऐसे समय में Breakneck एक अलग सवाल सामने रखती है कि कौन ज्यादा ताकतवर है, यह पूछने के साथ-साथ यह भी पूछा जाना चाहिए कि कौन क्या बनाने में सक्षम है और किस गति से बना सकता है.
डैन वांग का नजरिया चीन और अमेरिका को किसी आसान खांचे में फिट करने की कोशिश नहीं करता. इसके बजाय वह दिखाता है कि किसी देश की राजनीतिक और आर्थिक व्यवस्था उसकी निर्माण क्षमता, तकनीकी प्रगति और आम लोगों की जिंदगी को किस तरह प्रभावित कर सकती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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