ND Tiwari Birth Anniversary: नारायण दत्त तिवारी भारतीय राजनीति के उन विरल नेताओं में से एक थे, जिनका जन्म और निधन दोनों 18 अक्टूबर को हुआ- 1925 में जन्म और 2018 में निधन. यह दुर्लभ संयोग उनकी लंबी राजनीतिक यात्रा को और भी यादगार बनाता है. वे उत्तर प्रदेश और उत्तराखंड- दोनों राज्यों के मुख्यमंत्री रहे. आधी सदी से अधिक की सक्रिय राजनीति में उन्होंने विकास को प्राथमिकता दी, लेकिन उनके जीवन के उत्तरार्ध में कुछ व्यक्तिगत विवाद भी उनके नाम से जुड़ गए.
स्वतंत्रता संग्राम से मुख्यमंत्री तक
तिवारी का राजनीतिक जीवन स्वतंत्रता आंदोलन से शुरू हुआ. 1942 में केवल 17 वर्ष की आयु में वे ब्रिटिश नीतियों के खिलाफ पोस्टर और पंपलेट छापने के आरोप में गिरफ्तार हुए. नैनीताल जेल में 15 महीने बिताए, जहां उनके पिता पूर्णानंद तिवारी पहले से कैद थे. भारत छोड़ो आंदोलन के दौरान उन्होंने पिता के साथ कुल 19 महीने जेल में गुजारे. इलाहाबाद विश्वविद्यालय से राजनीति शास्त्र में प्रथम श्रेणी के साथ एमए करने के बाद 1947 में वे छात्र संघ के अध्यक्ष चुने गए. पंडित जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें कांग्रेस में शामिल किया और युवा कांग्रेस का अध्यक्ष बनाया.
वे उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री तीन बार (1976-77, 1984-85 और 1988-89) और उत्तराखंड के मुख्यमंत्री (2002-2007) रहे. केंद्र में वे विदेश मंत्री, वित्त मंत्री, वाणिज्य मंत्री और योजना आयोग के उपाध्यक्ष भी रहे. 1991 में राजीव गांधी की हत्या के बाद वे प्रधानमंत्री पद के प्रमुख दावेदारों में से एक थे, परंतु नैनीताल सीट से मात्र लगभग 800 मतों से हारने के कारण यह अवसर चूक गए.
विकास पुरुष के रूप में योगदान
तिवारी को ‘विकास पुरुष’ कहा जाता है. उनके पहले मुख्यमंत्री कार्यकाल में 1976 में नोएडा की स्थापना हुई. उन्होंने ऑटोमोबाइल क्षेत्र में क्रांति लाई. मारुति परियोजना को आगे बढ़ाने के साथ-साथ होंडा, टोयोटा, फोर्ड, हुंडई जैसी कंपनियों को भारत में इकाइयां लगाने के लिए प्रेरित किया. इफको की इकाइयां, चीनी उद्योग का विकास, गोरखपुर औद्योगिक विकास प्राधिकरण (GIDA) और सतहरिया औद्योगिक विकास प्राधिकरण (SIDA) की स्थापना उनके कार्यकाल की उपलब्धियां हैं. उत्तराखंड में उन्होंने केंद्र से औद्योगिक पैकेज प्राप्त किया और उद्योगपतियों को आकर्षित किया. बजाज ऑटो के चेयरमैन राहुल बजाज ने एक बार कहा था कि पंतनगर का संयंत्र तिवारी के अनुरोध पर ही स्थापित हुआ.
जीवन के उत्तरार्ध के विवाद
अपनी लंबी सार्वजनिक सेवा के बावजूद तिवारी के अंतिम वर्षों में दो प्रमुख विवाद चर्चा में रहे.
पहला, 2009 में आंध्र प्रदेश के राज्यपाल रहते हुए एक विवाद. एक तेलुगू न्यूज चैनल ने कथित रूप से राजभवन में तीन महिलाओं के साथ आपत्तिजनक स्थिति में दिखाया गया वीडियो प्रसारित किया. इस घटना के बाद राजनीतिक और सामाजिक दबाव बढ़ा. तिवारी ने स्वास्थ्य कारणों का हवाला देते हुए राज्यपाल पद से इस्तीफा दे दिया. इस प्रकरण ने उनके सार्वजनिक जीवन को गहरी चोट पहुँचाई और वे फिर कभी कोई संवैधानिक पद नहीं संभाल सके.
दूसरा और अधिक लंबा विवाद पितृत्व का था. 2008 में दिल्ली के रोहित शेखर ने दिल्ली उच्च न्यायालय में याचिका दायर कर दावा किया कि नारायण दत्त तिवारी उनके जैविक पिता हैं और उनकी माता उज्ज्वला शर्मा (पूर्व केंद्रीय मंत्री शेर सिंह की पुत्री) हैं. तिवारी ने शुरू में इस दावे से इनकार किया और डीएनए परीक्षण से बचने की कोशिश की. अंततः न्यायालय के आदेश पर 2012 में डीएनए परीक्षण हुआ, जिसने रोहित के दावे की पुष्टि की. 2014 में तिवारी ने सार्वजनिक रूप से रोहित को अपना बेटा स्वीकार किया और उज्ज्वला शर्मा से विवाह भी कर लिया. यह मामला उनके निजी जीवन को सार्वजनिक चर्चा का विषय बना गया. रोहित शेखर का 2019 में निधन हो गया.
इन विवादों के बावजूद, तिवारी के राजनीतिक जीवन में आधिकारिक क्षमता में भ्रष्टाचार के बड़े आरोप नहीं लगे. वे विधानसभा, विधान परिषद, लोकसभा और राज्यसभा- सभी सदनों के सदस्य रहे और 75 से अधिक देशों में भारत का प्रतिनिधित्व किया.
विरासत
नारायण दत्त तिवारी का जीवन उपलब्धियों और विवादों का मिश्रण था. एक ओर वे विकास-उन्मुख राजनीति के प्रतीक बने, नोएडा और औद्योगिक इकाइयों के रूप में उनकी छाप आज भी मौजूद है. दूसरी ओर, उनके अंतिम वर्षों के व्यक्तिगत प्रकरणों ने उनके सार्वजनिक छवि को प्रभावित किया. वे उन नेताओं में शुमार हैं जिन्होंने दो राज्यों का मुख्यमंत्री पद संभाला और जिनकी जन्मतिथि व पुण्यतिथि एक ही दिन है. उनकी विरासत विकास और विवाद- दोनों के साथ याद की जाती है.
-भारत एक्सप्रेस
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