19 अक्टूबर 1910 को जन्मे भारतीय वैज्ञानिक सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर ने तारों की दुनिया को समझने का नजरिया बदल दिया. उनके एक सिद्धांत ने बताया कि किसी तारे का भविष्य उसके द्रव्यमान पर किस तरह निर्भर करता है. शुरुआत में उनके विचारों का विरोध हुआ, लेकिन समय के साथ वही खोज आधुनिक खगोलभौतिकी की बुनियाद बन गई. साल 1983 में उन्हें भौतिकी के नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया.
सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर का जन्म 19 अक्टूबर 1910 को लाहौर में हुआ था, जो उस समय ब्रिटिश भारत का हिस्सा था और अब पाकिस्तान में है. उनके परिवार में पहले से ही विज्ञान की मजबूत पहचान थी. वह नोबेल पुरस्कार विजेता वैज्ञानिक सीवी रमन के भतीजे थे.
साल 1930 में जब सीवी रमन को भौतिकी का नोबेल पुरस्कार मिला, उसी साल चंद्रशेखर ने मद्रास के प्रेसीडेंसी कॉलेज से भौतिकी में ऑनर्स की डिग्री पूरी की. उनके मन में भी विज्ञान के क्षेत्र में कुछ नया करने की इच्छा थी. इसी लक्ष्य के साथ उन्होंने खगोलविज्ञान की दुनिया में कदम रखा.
भारत सरकार की छात्रवृत्ति मिलने के बाद वह आगे की पढ़ाई के लिए ब्रिटेन के कैंब्रिज विश्वविद्यालय रवाना हुए. दिलचस्प बात यह है कि इसी यात्रा के दौरान जहाज पर उन्होंने ऐसी गणनाएं कीं, जिन्होंने आगे चलकर विज्ञान की दुनिया में खास जगह बनाई.
क्या है चंद्रशेखर सीमा?
चंद्रशेखर ने अपने अध्ययन में बताया कि सफेद बौने तारे का अधिकतम द्रव्यमान सूर्य के द्रव्यमान का लगभग 1.4 गुना हो सकता है. इस सीमा को आज ‘चंद्रशेखर सीमा’ के नाम से जाना जाता है.
सफेद बौने तारे दरअसल उन तारों के घने अवशेष होते हैं, जो अपने विकास के अंतिम चरण में पहुंच चुके होते हैं. चंद्रशेखर की गणनाओं के मुताबिक, यदि ऐसे किसी तारे का द्रव्यमान निर्धारित सीमा से ज्यादा हो, तो वह सफेद बौने के रूप में स्थिर नहीं रह सकता. उसकी आगे की स्थिति कई भौतिक परिस्थितियों पर निर्भर करती है. ऐसे भारी तारों के अवशेष न्यूट्रॉन तारे या ब्लैक होल बन सकते हैं.
आज यह सिद्धांत वैज्ञानिकों को यह समझने में मदद करता है कि तारों का जीवन किस तरह आगे बढ़ता है और उनका अंतिम रूप क्या हो सकता है.
जब एक बड़े वैज्ञानिक ने कर दिया था विरोध
किसी नई खोज को सामने रखना एक बात है, लेकिन उसे दुनिया से स्वीकार करवाना हमेशा आसान नहीं होता. चंद्रशेखर को भी इस चुनौती का सामना करना पड़ा.
11 जनवरी 1935 को उन्होंने लंदन की रॉयल एस्ट्रोनॉमिकल सोसाइटी में अपना शोध प्रस्तुत किया. उस समय के मशहूर खगोलशास्त्री सर आर्थर एडिंगटन ने उनके निष्कर्षों पर सवाल उठाए और सार्वजनिक रूप से उनकी आलोचना भी की. एडिंगटन को चंद्रशेखर की गणनाओं से निकले नतीजे स्वीकार नहीं थे.
एक युवा वैज्ञानिक के लिए इस तरह का विरोध निराश करने वाला हो सकता था. लेकिन चंद्रशेखर ने अपने शोध का रास्ता नहीं छोड़ा. उन्होंने अलग-अलग विषयों पर काम जारी रखा और वैज्ञानिक गणनाओं के जरिए तारों की प्रकृति को समझने की कोशिश करते रहे.
उनकी कहानी इस बात की मिसाल है कि वैज्ञानिक प्रगति में केवल नया विचार देना ही नहीं, बल्कि लंबे समय तक उसकी जांच और पड़ताल करते रहना भी जरूरी है.
चार दशक बाद मिला नोबेल पुरस्कार
चंद्रशेखर के काम को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर व्यापक मान्यता मिलने में समय लगा. आखिरकार 1983 में उन्हें और वैज्ञानिक विलियम ए. फाउलर को संयुक्त रूप से भौतिकी का नोबेल पुरस्कार दिया गया. यह सम्मान तारों की संरचना और उनके विकास से जुड़ी महत्वपूर्ण भौतिक प्रक्रियाओं के सैद्धांतिक अध्ययन के लिए था.
हालांकि, चंद्रशेखर की पहचान सिर्फ उनके नाम पर रखी गई सीमा तक सीमित नहीं रही. उन्होंने तारों के वातावरण, आकाशगंगाओं में पदार्थ और गति के वितरण, घूमते हुए द्रवों की स्थिरता और आकाश के नीले रंग जैसे विषयों पर भी महत्वपूर्ण शोध किया.
उनकी लिखी कई वैज्ञानिक पुस्तकें, जिनमें An Introduction to the Study of Stellar Structure, Radiative Transfer और The Mathematical Theory of Black Holes शामिल हैं, आज भी वैज्ञानिक अध्ययन में महत्वपूर्ण मानी जाती हैं.
भारत से अमेरिका तक का सफर
1937 में चंद्रशेखर अमेरिका के शिकागो विश्वविद्यालय चले गए और अपने जीवन का अधिकांश समय वहीं बिताया. उन्होंने 1953 में अमेरिकी नागरिकता ग्रहण की. इसके बावजूद भारतीय विज्ञान जगत में उनका नाम हमेशा सम्मान के साथ लिया जाता रहा.
भारत सरकार ने उनके वैज्ञानिक योगदान के लिए 1968 में उन्हें पद्म विभूषण से सम्मानित किया. उनकी विरासत को आगे बढ़ाने वाली एक और महत्वपूर्ण पहचान नासा की ‘चंद्रा एक्स-रे वेधशाला’ है. इस अंतरिक्ष वेधशाला का नाम उन्हीं के सम्मान में रखा गया है. यह ब्रह्मांड में मौजूद अत्यधिक गर्म क्षेत्रों, तारों के अवशेषों और ब्लैक होल जैसी खगोलीय वस्तुओं का अध्ययन करती है.
21 अगस्त 1995 को शिकागो में 84 वर्ष की उम्र में उनका निधन हो गया. लेकिन विज्ञान के क्षेत्र में उनका योगदान आज भी जीवित है.
जयंती पर याद आते हैं उनके विचार और संघर्ष
सुब्रह्मण्यम चंद्रशेखर की कहानी केवल एक बड़े वैज्ञानिक की उपलब्धियों की कहानी नहीं है. यह उस इंसान के सफर को भी दिखाती है, जिसने अपने शोध पर भरोसा बनाए रखा, भले ही शुरुआत में उसे विरोध का सामना करना पड़ा.
तारों के जन्म, विकास और उनके अंतिम चरण को समझने में उनकी खोज आज भी अहम भूमिका निभाती है. 19 अक्टूबर को उनकी जयंती पर उन्हें याद करना उस वैज्ञानिक सोच को सम्मान देना है, जो सवाल पूछने, तथ्यों को परखने और जवाब मिलने तक लगातार प्रयास करते रहने की प्रेरणा देती है.
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-भारत एक्सप्रेस
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