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नेपाल और श्रीलंका के बाद अब सर्बिया: टिकटॉक से लेकर सड़कों तक, कैसे सत्ता के सिंहासन हिला रही Gen Z?

सर्बिया से लेकर श्रीलंका, बांग्लादेश और नेपाल तक युवाओं के आंदोलनों ने भ्रष्टाचार, बेरोजगारी और सरकारी जवाबदेही जैसे मुद्दों को वैश्विक चर्चा के केंद्र में ला दिया है.

World wide Impact of Gen Z Protest: दुनिया के राजनीतिक मानचित्र पर इन दिनों एक अजीब सी सिहरन दौड़ रही है. दशकों से सत्ता की मलाई खा रहे सूरमा, चाहे वे अलेक्जेंडर वुचिच जैसे मंझे हुए राजनेता हों या पीढ़ियों से काबिज राजनीतिक दल, अचानक एक अदृश्य और अजेय ताकत के सामने पानी मांगते नजर आ रहे हैं. इस ताकत का चेहरा कोई पुराना राजनेता या पारंपरिक विपक्ष नहीं, बल्कि जींस-टीशर्ट पहने, हाथों में स्मार्टफोन और जुबान पर सिस्टम के खिलाफ सीधे सवाल लिए Gen Z (जेनरेशन ज़ी) और देश के युवा हैं.

सर्बिया में 14 साल से अजेय माने जाने वाले राष्ट्रपति अलेक्जेंडर वुचिच के किले का धराशायी होना कोई मामूली घटना नहीं है. यह उस वैश्विक सुनामी का ताजा उदाहरण है, जो इन दिनों दुनिया के अलग-अलग कोनों में सत्ता के सिंहासन हिला रही है. आइए समझते हैं कि कैसे एक छोटे से हादसे से भड़की चिंगारी ने ग्लोबल ‘रेजीम चेंज’ (Regime Change) का एक नया पैटर्न तैयार कर दिया है.

सर्बिया: 14 साल का हिला दिया साम्राज्य(World wide Impact of Gen Z Protest)

सर्बिया में इस बवंडर की शुरुआत 1 नवंबर 2024 को हुई, जब देश के दूसरे सबसे बड़े शहर नोवी साद में रेलवे स्टेशन की कंक्रीट की छतरी गिरने से 16 लोगों की मौत हो गई. इस इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट से खुद राष्ट्रपति वुचिच जुड़े हुए थे. भ्रष्टाचार और सरकारी लापरवाही के इस खूनी खेल ने जनता के सब्र का बांध तोड़ दिया.

शुरुआत विश्वविद्यालयों के छात्रों से हुई, लेकिन देखते ही देखते यह आंदोलन पूरे देश की आवाज बन गया. खास बात यह थी कि इन छात्रों का कोई पारंपरिक राजनीतिक नेता नहीं था. उन्होंने खुद संसद की सभी 250 सीटों के लिए चुनाव में खड़े होने के बजाय डॉक्टरों, कलाकारों और शिक्षाविदों को आगे किया. नतीजा यह हुआ कि जनवरी 2025 तक प्रधानमंत्री को इस्तीफा देना पड़ा और अंततः वुचिच का राजनीतिक वर्चस्व ताश के पत्तों की तरह ढह गया.

श्रीलंका से लेकर नेपाल तक में बना हथियार

युवाओं के विद्रोह का यह पैटर्न अकेले यूरोप तक सीमित नहीं है, बल्कि एशिया के कई देशों में यह व्यवस्था बदलने का अचूक हथियार बन चुका है:

श्रीलंका (Aragalaya Movement): आर्थिक बदहाली और भुखमरी से त्रस्त देश में जब आम जनता और युवा सड़कों पर उतरे, तो दशकों से सत्ता पर काबिज राजपक्षे परिवार को देश छोड़कर भागने पर मजबूर होना पड़ा. सोशल मीडिया पर ऑर्गेनाइज हुए इस युवा आंदोलन ने राष्ट्रपति भवन पर कब्जा कर दिखाया कि अवाम की ताकत क्या होती है.

बांग्लादेश (Student-Led Uprising): हाल ही में बांग्लादेश में शेख हसीना के लंबे और कड़े शासन का अंत भी छात्रों और युवाओं के हिंसक व मुखर आंदोलन के दम पर ही हुआ. सरकारी नौकरियों में कोटे के विरोध से शुरू हुई यह चिंगारी देखते ही देखते प्रधानमंत्री के तख्तापलट पर आकर रुकी.

नेपाल: नेपाल में भी भ्रष्टाचार और लचर प्रशासनिक व्यवस्था के खिलाफ युवा पीढ़ी लगातार पारंपरिक दलों के खिलाफ मुखर हो रही है, जो इस बात का संकेत है कि हिमालयी देश की राजनीति भी किसी बड़े बदलाव की मुहाने पर खड़ी है.

फ्रांस, भारत और इटली में सुलगती चिनगारियां(Impact of Gen Z Protest)

यह पैटर्न सिर्फ विकासशील देशों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि विकसित पश्चिमी देशों में भी युवा पीढ़ी अपनी सरकारों को सीधी चुनौती दे रही है:

फ्रांस: पेंशन सुधारों और महंगाई के खिलाफ फ्रांस की सड़कों पर उतरी युवा पीढ़ी ने जिस तरह से हिंसक प्रदर्शनों और आम हड़तालों का नेतृत्व किया, उसने इमैनुएल मैक्रों सरकार की चूलें हिला दीं. फ्रांस के युवा आज पारंपरिक नीतियों के खिलाफ सीधे टकराव के मूड में हैं.

भारत: भारत में भी हाल के वर्षों में अग्निवीर योजना, NEET-UG परीक्षा विवाद और विभिन्न प्रतियोगी परीक्षाओं में धांधली जैसे मुद्दों पर देश का युवा वर्ग जिस तरह एकजुट होकर डिजिटल प्लेटफॉर्म से लेकर सड़कों पर उतरा है, उसने राजनीतिक दलों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि अब देश के नौजवानों को हल्के में नहीं लिया जा सकता.

Delhi CJP Protest Connaught Place Clash 200 Detained Police Action

इटली: यूरोप में दक्षिणपंथी और अप्रवासन नीतियों के खिलाफ इटली के विश्वविद्यालयों और शहरों में भी Gen Z का असंतोष लगातार मुखर हो रहा है.

क्या है इस ग्लोबल ‘रेजीम चेंज’ का नया पैटर्न?

दुनिया भर में चल रहे इन आंदोलनों में कुछ खास समानताएं देखने को मिल रही हैं, जो इन्हें पुराने दौर के राजनीतिक आंदोलनों से बिल्कुल अलग बनाती हैं:

लीडरलेस मूवमेंट (नेताविहीन नेतृत्व): इन आंदोलनों का कोई एक सर्वेसर्वा या सुप्रीमो नहीं होता. यह विकेंद्रीकृत होते हैं, जिन्हें सोशल मीडिया (इंस्टाग्राम, टिकटॉक, एक्स) के जरिए मैनेज किया जाता है. यही वजह है कि सरकारों के लिए इनके नेताओं को खरीदना या डराना मुमकिन नहीं होता.

भ्रष्टाचार और संस्थाओं की विफलता पर चोट: ये आंदोलन किसी पार्टी विशेष के खिलाफ नहीं, बल्कि सिस्टम के सड़ चुके ढांचे, भ्रष्टाचार और जवाबदेही की कमी के खिलाफ होते हैं.

डिजिटल मोबिलाइजेशन: एक क्लिक पर लाखों युवाओं को इकट्ठा करने की ताकत इन आंदोलनों की सबसे बड़ी यूएसपी (USP) है.

तख्तापलट के बाद की असली चुनौती

इतिहास गवाह है कि गुस्सा और आक्रोश सड़कों पर सरकारें तो गिरा सकता है, लेकिन क्या इसके बाद जनता का जीवन बेहतर होता है? श्रीलंका, बांग्लादेश और अरब देशों (Arab Spring) के अनुभवों(Impact of Gen Z Protest) को देखें तो कई बार सत्ता बदलने के बाद भी देश आर्थिक और राजनीतिक स्थिरता के लिए जूझते नजर आए हैं.

सर्बिया या अन्य देशों में छात्रों के सामने अब असली चुनौती यह साबित करने की है कि वे सिर्फ ‘सरकार गिराना’ नहीं, बल्कि ‘व्यवस्था सुधारना’ भी जानते हैं. यदि संसद के भीतर भ्रष्टाचार पर लगाम नहीं लगी और स्वतंत्र संस्थाएं मजबूत नहीं हुईं, तो यह आक्रोश सिर्फ चेहरों को बदलेगा, सिस्टम को नहीं. बहरहाल, संदेश साफ है कि अब दुनिया का हर तानाशाह और भ्रष्ट राजनेता यह अच्छी तरह समझ चुका है कि अगली क्रांति किसी चुनावी घोषणापत्र से नहीं, बल्कि स्क्रीन पर स्क्रॉल करते हुए किसी युवा के गुस्से से शुरू हो सकती है!

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-भारत एक्सप्रेस



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