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प्रधानमंत्री मोदी ने 25 वर्षों के सार्वजनिक जीवन में इंफ्रास्ट्रक्चर को परियोजनाओं से आगे बढ़ाकर नागरिक-केंद्रित बनाया

नीति आयोग के सदस्य और पूर्व कैबिनेट सचिव राजीव गौबा ने सोमवार को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों पर लिखे एक लेख में कहा है कि इस दौरान भारत में बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) की योजना बनाने और उसे लागू करने के तरीके में बुनियादी बदलाव आया है.

pm modi

देश में सड़कें, रेलवे, बंदरगाह और शहरी परिवहन जैसे बुनियादी ढांचे का विकास अब केवल नई परियोजनाएं बनाने तक सीमित नहीं रह गया है. सरकार का जोर इस बात पर भी है कि इन सुविधाओं का सीधा फायदा आम लोगों को मिले और देश की अर्थव्यवस्था को रफ्तार मिले. नीति आयोग के सदस्य और पूर्व कैबिनेट सचिव राजीव गौबा ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 साल पूरे होने के मौके पर लिखे अपने लेख में यह बात कही है.

प्रधानमंत्री कार्यालय (PMO) ने इस लेख को साझा किया. इसमें बताया गया है कि प्रधानमंत्री मोदी के नेतृत्व में इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर सरकार की सोच में बड़ा बदलाव आया है. अब अलग-अलग परियोजनाओं को स्वतंत्र रूप से देखने के बजाय उन्हें एक-दूसरे से जोड़कर विकास की व्यापक तस्वीर तैयार करने पर ध्यान दिया जा रहा है.

रेलवे से एक्सप्रेसवे तक, कनेक्टिविटी को मिला नया विस्तार

राजीव गौबा के मुताबिक, बीते वर्षों में देश के परिवहन नेटवर्क में कई अहम बदलाव हुए हैं. रेलवे के क्षेत्र में समर्पित माल गलियारों का विकास, रेल लाइनों का विद्युतीकरण, वंदे भारत ट्रेनों की शुरुआत और रेलवे स्टेशनों का आधुनिकीकरण इस बदलाव के प्रमुख उदाहरण हैं.

इसी तरह, राष्ट्रीय राजमार्गों के विस्तार और नए एक्सप्रेसवे बनने से सड़क परिवहन को मजबूती मिली है. बंदरगाहों के विकास और शहरों में मेट्रो नेटवर्क के विस्तार ने भी लोगों और सामान की आवाजाही को बेहतर बनाने में भूमिका निभाई है.

हालांकि, गौबा का मानना है कि इन परियोजनाओं का निर्माण ही सबसे बड़ा बदलाव नहीं है. असली फर्क इस बात से पड़ा है कि सरकार अब बुनियादी ढांचे को किस नजरिए से देखती है.

आम लोगों की जरूरतों को केंद्र में रखने पर जोर

अपने लेख में गौबा ने समझाया कि पहले इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी योजनाएं अक्सर अलग-अलग मंत्रालयों और विभागों के स्तर पर तैयार की जाती थीं. लेकिन आम नागरिक के लिए सड़क, रेलवे, बिजली और बंदरगाह जैसी सुविधाएं एक-दूसरे से जुड़ी होती हैं.

उदाहरण के तौर पर, किसी इलाके में अच्छी सड़क बन जाने के बावजूद अगर वहां रेलवे या माल ढुलाई की उचित सुविधा नहीं है, तो कारोबार और परिवहन को उसका पूरा फायदा नहीं मिल पाता. इसी तरह, एक परियोजना में देरी होने से उससे जुड़ी दूसरी योजनाओं का काम भी प्रभावित हो सकता है.

यही वजह है कि इंफ्रास्ट्रक्चर को अब केवल इमारतों, सड़कों और रेल लाइनों के निर्माण के रूप में नहीं, बल्कि लोगों की जिंदगी आसान बनाने और आर्थिक गतिविधियों को बढ़ावा देने के माध्यम के तौर पर देखने पर जोर दिया जा रहा है.

परियोजनाओं में देरी रोकने के लिए प्रगति मंच की भूमिका

बड़ी परियोजनाओं की योजना बनाना जितना जरूरी है, उन्हें समय पर पूरा करना भी उतना ही अहम है. राजीव गौबा ने अपने लेख में इस चुनौती का खास तौर पर जिक्र किया है.

भूमि अधिग्रहण, जरूरी मंजूरियां, बिजली और दूसरी उपयोगिता सेवाओं से जुड़ी व्यवस्थाओं को स्थानांतरित करना, कानून-व्यवस्था से संबंधित समस्याएं और केंद्र तथा राज्य सरकारों के बीच तालमेल की कमी कई बार परियोजनाओं में देरी की वजह बनती हैं.

इन अड़चनों को दूर करने के लिए शुरू किया गया प्रगति मंच महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है. इसके जरिए विभिन्न विभागों और संबंधित अधिकारियों को एक साथ लाकर परियोजनाओं की स्थिति की समीक्षा की जाती है. इससे लंबित मामलों की पहचान करने और उनके समाधान के लिए जरूरी कदम उठाने में मदद मिलती है.

गौबा के अनुसार, इस व्यवस्था का उद्देश्य केवल बैठकों के जरिए प्रगति की जानकारी लेना नहीं, बल्कि उन समस्याओं को दूर करना भी है जो जमीन पर काम आगे बढ़ने से रोकती हैं.

पीएम गति शक्ति और प्रगति क्यों हैं अहम?

राजीव गौबा ने पीएम गति शक्ति और प्रगति को प्रधानमंत्री मोदी की प्रशासनिक कार्यशैली के दो महत्वपूर्ण उदाहरण बताया है. दोनों का उद्देश्य इंफ्रास्ट्रक्चर से जुड़ी चुनौतियों को अलग-अलग स्तरों पर हल करना है.

पीएम गति शक्ति के जरिए विभिन्न बुनियादी ढांचा परियोजनाओं को एक व्यापक और समन्वित नजरिए से देखने पर जोर दिया जाता है. वहीं, प्रगति मंच का इस्तेमाल परियोजनाओं के क्रियान्वयन में सामने आने वाली खास समस्याओं की समीक्षा और समाधान के लिए किया जाता है.

इस तरह एक तरफ योजनाओं के बीच बेहतर तालमेल बनाने की कोशिश होती है, तो दूसरी तरफ उन अड़चनों को दूर करने पर ध्यान दिया जाता है जिनकी वजह से काम अटक सकता है. गौबा के मुताबिक, यह तरीका दिखाता है कि बड़े विकास लक्ष्यों पर काम करते हुए जमीनी समस्याओं को भी प्राथमिकता दी जा सकती है.

सिर्फ निर्माण नहीं, सोच में बदलाव को बताया बड़ी उपलब्धि

राजीव गौबा ने अपने लेख में निष्कर्ष दिया कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के सार्वजनिक जीवन के 25 वर्षों की उपलब्धियों को केवल बनी हुई सड़कों, रेलवे लाइनों या दूसरी भौतिक सुविधाओं की संख्या से नहीं आंका जाना चाहिए.

उनके अनुसार, इस दौरान इंफ्रास्ट्रक्चर को लेकर सरकारी सोच में आया बदलाव भी उतना ही महत्वपूर्ण है. अब विकास को नागरिकों की जरूरतों, विभिन्न परियोजनाओं के आपसी तालमेल और उनके वास्तविक परिणामों के आधार पर देखने की कोशिश की जा रही है.

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-भारत एक्सप्रेस



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