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जेल की दीवारें भी नहीं रोक पाईं जिनके कदम, जानिए कौन थे योगेंद्र शुक्ल जिन्हें इतिहास ने भुला दिया?

बिहार के महान क्रांतिकारी योगेंद्र शुक्ल, जिन्हें लोग ‘शेरे बिहार’ के नाम से जानते थे, ने देश की आजादी के लिए अपना पूरा जीवन समर्पित कर दिया. भगत सिंह को पिस्तौल चलाने का प्रशिक्षण देने से लेकर हजारीबाग जेल से जयप्रकाश नारायण के साथ फरार होने और नेपाल में बंद क्रांतिकारियों को छुड़ाने तक, उनकी बहादुरी के कई किस्से इतिहास में दर्ज हैं.

भारत की आजादी की कहानी जब भी सुनाई जाती है, तो भगत सिंह, चंद्रशेखर आजाद, सुभाष चंद्र बोस और महात्मा गांधी जैसे बड़े नाम सबसे पहले याद आते हैं. लेकिन इस संघर्ष में कई ऐसे वीर भी थे, जिन्होंने अपना पूरा जीवन देश के नाम कर दिया, मगर उन्हें इतिहास के पन्नों में वह जगह नहीं मिल पाई, जिसके वे हकदार थे. बिहार की धरती ने भी ऐसे ही एक जांबाज क्रांतिकारी को जन्म दिया था. उनका नाम था योगेंद्र शुक्ल, जिन्हें लोग प्यार और सम्मान से ‘शेरे बिहार’ कहकर बुलाते थे.

30 अक्टूबर 1896 को वर्तमान वैशाली जिले के जलालपुर गांव में जन्मे योगेंद्र शुक्ल का जीवन साहस, संघर्ष और देशभक्ति की मिसाल रहा. उनके परिवार में ही एक और बड़ा क्रांतिकारी हुए, उनके भतीजे बैकुंठ शुक्ल. बैकुंठ शुक्ल ने भगत सिंह के मुकदमे में सरकारी गवाह बने जयगोपाल की हत्या की थी और इसके लिए उन्हें फांसी की सजा दी गई थी.

पढ़ाई छोड़कर आजादी की लड़ाई में कूद पड़े

योगेंद्र शुक्ल पढ़ाई में काफी तेज थे. उन्होंने मुजफ्फरपुर के जी.बी.बी. कॉलेज में शिक्षा हासिल की. लेकिन देश की गुलामी उन्हें अंदर तक परेशान करती थी. महात्मा गांधी के असहयोग आंदोलन की अपील के बाद उन्होंने अपनी पढ़ाई बीच में ही छोड़ दी और स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल हो गए.

हालांकि, उनकी सोच केवल अहिंसक आंदोलन तक सीमित नहीं थी. वे गांधीजी के विचारों का सम्मान करते थे, लेकिन उनका मानना था कि अंग्रेजी हुकूमत को उखाड़ फेंकने के लिए सशस्त्र संघर्ष भी जरूरी है. इसी सोच के साथ वे क्रांतिकारी गतिविधियों में सक्रिय हो गए.

योगेंद्र शुक्ल और उनके भतीजे बैकुंठ शुक्ल हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी (HRA) से जुड़े. यह वही संगठन था, जिससे आगे चलकर भगत सिंह और चंद्रशेखर आजाद जैसे क्रांतिकारी भी जुड़े. बताया जाता है कि योगेंद्र शुक्ल ने भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को पिस्तौल चलाने का प्रशिक्षण भी दिया था.

अंग्रेजी पुलिस के लिए बड़ी चुनौती थे योगेंद्र शुक्ल

योगेंद्र शुक्ल की बहादुरी के किस्से उस दौर में काफी मशहूर थे. अंग्रेजी पुलिस उन्हें पकड़ने के लिए लगातार जाल बिछाती रहती थी, लेकिन वे हर बार उसके हाथ से निकल जाते थे.

उनकी फुर्ती और तैरने की क्षमता का एक किस्सा आज भी सुनाया जाता है. बताया जाता है कि एक बार सोनपुर पुल पर अंग्रेजी पुलिस ने उन्हें दोनों तरफ से घेर लिया. बचने का कोई रास्ता नहीं दिखा तो उन्होंने सीधे नारायणी नदी में छलांग लगा दी. इसके बाद वे करीब 27 किलोमीटर तक तैरकर सुरक्षित निकल गए.

वे अक्सर कहा करते थे कि अंग्रेज उन्हें तभी पकड़ सकते हैं, जब वे सो रहे हों. उनके जीवन की घटनाएं इस बात की गवाही भी देती हैं. एक बार रिश्तेदार के घर सोते समय मुखबिरी के कारण उन्हें गिरफ्तार कर लिया गया. दूसरी बार ट्रेन में सफर के दौरान सोते हुए पुलिस ने उन्हें घेर लिया.

हालांकि, ट्रेन वाली गिरफ्तारी इतनी आसान नहीं थी. उनके पास मौजूद दोनों पिस्तौलों में गोलियां खत्म होने तक पुलिस के जवान उनके करीब आने की हिम्मत नहीं जुटा सके. आखिरकार एक भारी पत्थर से उनके सिर पर वार किया गया, जिसके बाद वे घायल होकर गिर पड़े. इस हमले में उनकी एक आंख की रोशनी प्रभावित हुई और उन्हें अंदरूनी चोटें भी आईं.

प्रसिद्ध साहित्यकार रामवृक्ष बेनीपुरी ने अपनी पुस्तक ‘मुझे याद है’ में योगेंद्र शुक्ल के व्यक्तित्व और साहस का जिक्र किया है. उनके मुताबिक, उस समय युवा क्रांतिकारियों के बीच योगेंद्र शुक्ल किसी नायक से कम नहीं थे, जबकि अंग्रेजी सरकार के लिए उनका नाम ही चिंता का कारण बन जाता था.

दिलचस्प बात यह थी कि उनका पहनावा भी काफी अलग था. कभी वे रेशमी कोट, चुन्नटदार धोती, हाथ में छड़ी और कलाई में सोने की घड़ी पहनकर किसी राजकुमार की तरह दिखाई देते थे. दूसरी ओर पुलिस उनके हुलिए के पोस्टर लगाकर उन्हें तलाश रही होती थी.

हजारीबाग जेल से फरार होने में निभाई अहम भूमिका

साल 1942 में महात्मा गांधी के भारत छोड़ो आंदोलन ने पूरे देश में अंग्रेजों के खिलाफ जबरदस्त माहौल बना दिया. इस आंदोलन के दौरान योगेंद्र शुक्ल को भी गिरफ्तार कर हजारीबाग जेल में बंद कर दिया गया.

लेकिन जेल की ऊंची दीवारें भी उनके हौसले को कैद नहीं कर सकीं. दिवाली की रात जयप्रकाश नारायण, सूरज नारायण सिंह, रामनंदन मिश्र और शालिग्राम सिंह सहित कुछ अन्य क्रांतिकारियों के साथ उन्होंने जेल से भागने की योजना बनाई. इस ऐतिहासिक पलायन में योगेंद्र शुक्ल की भूमिका बेहद अहम मानी जाती है.

रामवृक्ष बेनीपुरी ने उन्हें इस पूरी योजना का प्रमुख नेतृत्वकर्ता बताया है. जेल से बाहर निकलने के बाद भी उनका संघर्ष खत्म नहीं हुआ. बताया जाता है कि उन्होंने घायल और कमजोर जयप्रकाश नारायण को करीब 100 किलोमीटर तक अपने कंधे पर उठाकर रास्ता तय किया.

उनकी बहादुरी का एक और अध्याय नेपाल के हनुमाननगर से जुड़ा है. वहां जयप्रकाश नारायण और उनके कुछ साथी कैद कर लिए गए थे. डॉ. राममनोहर लोहिया के संदेश पर योगेंद्र शुक्ल ने सूरज नारायण सिंह और करीब 30 हथियारबंद साथियों के साथ उन्हें छुड़ाने की कार्रवाई में हिस्सा लिया. इस अभियान के बाद जयप्रकाश नारायण और उनके साथी सुरक्षित भारत लौट सके.

आजादी के बाद भी राजनीति और समाज में रहे सक्रिय

देश आजाद होने के बाद योगेंद्र शुक्ल ने सार्वजनिक जीवन में भी अपनी भूमिका निभाई. साल 1937 में जेल से रिहा होने के बाद वे कांग्रेस से जुड़े और मुजफ्फरपुर जिले में पार्टी के उपाध्यक्ष बने. बाद में कांग्रेस सोशलिस्ट पार्टी के प्रमुख नेताओं में भी उनकी गिनती होने लगी.

1958 से 1960 के बीच उन्होंने प्रजा सोशलिस्ट पार्टी की ओर से बिहार विधान परिषद के सदस्य के रूप में भी काम किया.

अंग्रेजों की जेलों में बिताए सालों और लगातार मिली यातनाओं ने उनके शरीर को काफी कमजोर कर दिया था. संघर्ष के दौरान लगी चोटें भी जीवनभर उनके साथ रहीं. आखिरकार 19 नवंबर 1966 को इस महान क्रांतिकारी का निधन हो गया.

इतिहास में फिर से याद किए जाने चाहिए योगेंद्र शुक्ल

जयप्रकाश नारायण को अगस्त क्रांति का प्रमुख चेहरा माना जाता है और हजारीबाग जेल से उनका पलायन भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन की महत्वपूर्ण घटनाओं में शामिल है. लेकिन इस पूरी कहानी में योगेंद्र शुक्ल के योगदान को भी उतनी ही गंभीरता से याद करने की जरूरत है.

चाहे हिंदुस्तान रिपब्लिकन आर्मी में उनकी भूमिका हो, भगत सिंह और बटुकेश्वर दत्त को प्रशिक्षण देने की बात हो, हजारीबाग जेल से साथियों के साथ निकलना हो या फिर नेपाल में बंद क्रांतिकारियों को छुड़ाने का अभियान—हर घटना उनके अदम्य साहस की कहानी कहती है.

योगेंद्र शुक्ल ने अपने जीवन में कई बार मौत को करीब से देखा, अंग्रेजों की यातनाएं सहीं और देश की आजादी के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगा दिया. आज जब हम स्वतंत्रता संग्राम के नायकों को याद करते हैं, तो बिहार के इस वीर सपूत को भी पूरा सम्मान मिलना चाहिए.

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-भारत एक्सप्रेस



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