दिवाली का त्योहार आते ही देशभर के मंदिरों में रौनक बढ़ जाती है. इस खास मौके पर मां लक्ष्मी की पूजा-अर्चना का विशेष महत्व होता है. मान्यता है कि दिवाली की रात मां लक्ष्मी की विधि-विधान से पूजा करने पर घर में सुख, शांति और समृद्धि आती है. यही वजह है कि इस दिन भक्त मां लक्ष्मी के साथ भगवान कुबेर की भी पूजा करते हैं. लेकिन क्या आप जानते हैं कि महाराष्ट्र के कोल्हापुर में मां लक्ष्मी का एक ऐसा प्राचीन मंदिर है, जहां हर साल दिवाली के मौके पर भक्तों की भारी भीड़ देखने को मिलती है?
हम बात कर रहे हैं कोल्हापुर के प्रसिद्ध महालक्ष्मी मंदिर की, जिसे अंबाबाई मंदिर के नाम से भी जाना जाता है. यहां विराजमान मां को धन-संपत्ति और खुशहाली प्रदान करने वाली देवी के रूप में पूजा जाता है. खासकर आर्थिक परेशानियों से जूझ रहे लोग मां के दरबार में अपनी मुराद लेकर पहुंचते हैं.
दिवाली पर सोने के गहनों से सजता है मां का दरबार
दिवाली के दौरान महालक्ष्मी मंदिर की रौनक देखते ही बनती है. इस अवसर पर मां अंबाबाई को बेहद खूबसूरत सोने के आभूषणों से सजाया जाता है. मंदिर की भव्य सजावट और मां का दिव्य स्वरूप भक्तों के आकर्षण का केंद्र रहता है. महाराष्ट्र ही नहीं, बल्कि देश के अलग-अलग हिस्सों से श्रद्धालु यहां दर्शन करने पहुंचते हैं.
स्थानीय मान्यताओं के मुताबिक, मां अंबाबाई अपने भक्तों की आर्थिक परेशानियां दूर करती हैं. कई श्रद्धालुओं का विश्वास है कि सच्चे मन से मांगी गई मुराद मां जरूर पूरी करती हैं. खासकर कर्ज, पैसों की कमी और कारोबार में परेशानी से छुटकारा पाने की उम्मीद लेकर लोग यहां आते हैं.
मंदिर की एक और खास परंपरा दिवाली की रात से जुड़ी है. मान्यता है कि इस रात मंदिर के शिखर पर एक विशेष दीपक जलाया जाता है, जो अगली अमावस्या तक लगातार जलता रहता है. इस परंपरा को देखने और इसके धार्मिक महत्व को समझने के लिए भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु उत्सुक रहते हैं.
करीब 1700 से 1800 साल पुराना बताया जाता है इतिहास
कोल्हापुर का यह मंदिर सिर्फ धार्मिक आस्था का केंद्र नहीं है, बल्कि अपने ऐतिहासिक महत्व के लिए भी जाना जाता है. मान्यता है कि इस मंदिर का निर्माण करीब 1700 से 1800 साल पहले हुआ था. मंदिर की बनावट और दीवारों पर की गई बारीक नक्काशी इसकी खूबसूरती को और बढ़ाती है.
ऐसा माना जाता है कि चालुक्य वंश के राजा कर्णदेव ने इस मंदिर का निर्माण करवाया था. समय के साथ विदेशी आक्रमणों और दूसरे कारणों से मंदिर को कई बार नुकसान पहुंचा, जिसके बाद इसका पुनर्निर्माण और जीर्णोद्धार कराया गया.
साल में तीन दिन सूर्य की किरणें सीधे मां पर पड़ती हैं
इस मंदिर की सबसे दिलचस्प बात यहां होने वाली एक खास खगोलीय घटना है. मान्यता के अनुसार, साल में तीन दिनों तक सूर्य की किरणें मंदिर के गर्भगृह में स्थापित मां महालक्ष्मी की प्रतिमा पर सीधे पड़ती हैं.
इन तीन दिनों में सूर्य की रोशनी का स्थान भी बदलता है. पहले दिन किरणें मां के मस्तक पर पड़ती हैं, दूसरे दिन कमर के हिस्से पर और तीसरे दिन चरणों को प्रकाशित करती हैं. इस अद्भुत दृश्य को देखने के लिए श्रद्धालुओं में खास उत्साह रहता है. इस दौरान मंदिर की कृत्रिम रोशनी बंद कर दी जाती है, ताकि सूर्य की किरणों का यह नजारा साफ दिखाई दे सके.
तिरुपति बालाजी से भी जुड़ी है मंदिर की मान्यता
महालक्ष्मी मंदिर को लेकर एक प्रचलित पौराणिक कथा भी है. मान्यता है कि किसी बात से नाराज होकर मां लक्ष्मी ने भगवान विष्णु के तिरुपति धाम को छोड़ दिया था और कोल्हापुर में आकर निवास करने लगी थीं. इसी धार्मिक परंपरा के चलते हर साल तिरुपति से मां महालक्ष्मी के लिए शॉल भेजी जाती है, जिसे उन्हें अर्पित किया जाता है.
यह परंपरा दोनों प्रसिद्ध धार्मिक स्थलों के बीच आस्था के रिश्ते को दर्शाती है. मंदिर में दर्शन के लिए आने वाले श्रद्धालु इस परंपरा को भी विशेष महत्व देते हैं. मंदिर के कपाट रात करीब 9 बजे बंद कर दिए जाते हैं.
मंदिर के खंभों को लेकर भी है अनोखी मान्यता
महालक्ष्मी मंदिर की एक और खास बात इसके विशाल और कलात्मक खंभे हैं. कहा जाता है कि मंदिर के चारों कोनों में बने खंभों की गिनती करना आसान नहीं है. इन्हें लेकर स्थानीय स्तर पर कई तरह की मान्यताएं प्रचलित हैं. कुछ लोगों का विश्वास है कि इन खंभों को गिनने की कोशिश करने वाले व्यक्ति के साथ कुछ अनहोनी हो सकती है. हालांकि, यह एक लोकमान्यता है, जिसकी कोई प्रमाणित पुष्टि नहीं है.
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