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जिंदा है सरदार पटेल की सोच या बिखर रही है एकता? जानिए आज के भारत की हकीकत

सरदार वल्लभभाई पटेल का जीवन दृढ़ इच्छाशक्ति, राष्ट्रभक्ति और अदम्य साहस की मिसाल है. स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर देश की 562 से अधिक रियासतों को एकजुट कर अखंड भारत के निर्माण तक, उनका योगदान अतुलनीय रहा. भारत के लौह पुरुष और आधुनिक भारत के शिल्पकार के रूप में पहचाने जाने वाले सरदार पटेल के विचार आज भी प्रासंगिक हैं.

“खाने और सोने का नाम जीवन नहीं है, जीवन नाम है सदैव आगे बढ़ते रहने की लगन का.” मुंशी प्रेमचंद की ये पंक्तियां सरदार वल्लभभाई पटेल के जीवन पर बिल्कुल सटीक बैठती हैं. सरदार पटेल एक ऐसा व्यक्तित्व, जिसने अपना पूरा जीवन देश की एकता और आजादी के लिए समर्पित कर दिया. यही वजह है कि आज उन्हें भारत का लौह पुरुष और आधुनिक भारत का शिल्पकार कहा जाता है.

31 अक्टूबर 1875 को गुजरात के नाडियाड में एक किसान परिवार में जन्मे वल्लभभाई पटेल के पिता का नाम झवेरभाई और माता का नाम लाडबाई था. बचपन से ही उनके भीतर दृढ़ इच्छाशक्ति और नेतृत्व की क्षमता दिखाई देती थी. आगे चलकर यही गुण उन्हें भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के प्रमुख नेताओं में शामिल करने वाले थे.

साल 1917 में महात्मा गांधी के विचारों से प्रभावित होकर पटेल स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़े. इसी साल वे अहमदाबाद नगर निगम के सदस्य भी चुने गए. साल 1920 के असहयोग आंदोलन में उन्होंने बढ़-चढ़कर हिस्सा भी लिया और धीरे-धीरे अपनी मेहनत और लगन की बदौलत राष्ट्रीय राजनीति में अपनी पहचान बनाई.

अब आता है साल 1923 का बोरसद सत्याग्रह यानी की खेड़ा आंदोलन और इसके ठीक बाद का साल 1928 का बारडोली सत्याग्रह उनके राजनीतिक जीवन के महत्वपूर्ण पड़ाव बने. खासतौर पर बारडोली सत्याग्रह में किसानों का नेतृत्व करते हुए उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ मजबूत आवाज उठाई. इस आंदोलन की सफलता के बाद उन्हें ‘सरदार’ की उपाधि मिली और तभी से वे सरदार वल्लभभाई पटेल के नाम से पहचाने जाने लगे.

पटेल सिर्फ आंदोलन करने वाले नेता नहीं थे, बल्कि संगठन और जनसेवा में भी उनकी अहम भूमिका थी. साल 1927 में गुजरात में आई भीषण बाढ़ के दौरान उन्होंने राहत और बचाव कार्यों का नेतृत्व किया. वहीं, 1930 के सविनय अवज्ञा आंदोलन में अंग्रेजों ने उन्हें गिरफ्तार भी कर लिया. दांडी मार्च के दौरान भी उन्होंने लोगों को विदेशी वस्तुओं और शराब के बहिष्कार के लिए प्रेरित किया.

कांग्रेस संगठन को मजबूत बनाने और चुनावी रणनीति तैयार करने में भी पटेल की महत्वपूर्ण भूमिका रही. साल 1937 और 1946 के चुनावों में उन्होंने कांग्रेस के प्रचार और संगठन की जिम्मेदारी संभाली. महात्मा गांधी और जवाहरलाल नेहरू के साथ मिलकर उन्होंने स्वतंत्रता आंदोलन को आगे बढ़ाया.

कूटनीति, दृढ़ संकल्प और साहस से सरदार पटेल ने किया भारत का एकीकरण

15 अगस्त 1947 को देश आजाद हुआ, लेकिन आजादी के साथ भारत के सामने एक बड़ी चुनौती थी. देश में 562 से ज्यादा रियासतें थीं, जिन्हें एक साथ जोड़कर एक मजबूत राष्ट्र बनाना था. यह जिम्मेदारी सरदार पटेल ने अपने कंधों पर ली. तत्कालीन गृह मंत्री के रूप में उन्होंने वी.पी. मेनन के साथ मिलकर रियासतों के विलय की प्रक्रिया को आगे बढ़ाया. अपनी कूटनीति, दृढ़ फैसलों और बातचीत के जरिए उन्होंने अधिकांश रियासतों को भारत में शामिल कराया. इन रियासतों में हैदराबाद और जूनागढ़ जैसे मामलों में तो उन्हें सैन्य कार्रवाई की भी जरूरत पड़ी. इस ऐतिहासिक योगदान ने उन्हें भारत के लौह पुरुष के रूप में पहचान दिलाई.

पटेल का मानना था कि देश की एकता ही उसकी सबसे बड़ी ताकत है. उनका स्पष्ट संदेश था कि अगर भारत को मजबूत बनाना है, तो सभी को एकजुट रहना होगा. आजादी के बाद वे देश के पहले उपप्रधानमंत्री और गृह मंत्री बने. प्रशासनिक व्यवस्था को मजबूत करने और देश को एक सूत्र में पिरोने में उनका योगदान बेहद महत्वपूर्ण रहा. सोमनाथ मंदिर के पुनर्निर्माण की पहल में भी उनकी अहम भूमिका रही.

हालांकि, उनका राजनीतिक सफर ज्यादा लंबा नहीं चला और 15 दिसंबर 1950 को मुंबई में हृदयाघात से उनका निधन हो गया. उनके योगदान को सम्मान देते हुए साल 1991 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया. सरदार वल्लभभाई पटेल का जीवन हमें सिखाता है कि मजबूत इच्छाशक्ति, अनुशासन और एकता के दम पर बड़ी से बड़ी चुनौती का सामना किया जा सकता है. आज भारत जिस अखंड स्वरूप में खड़ा है, उसमें सरदार पटेल के योगदान को हमेशा याद किया जाएगा.

लेकिन इन सब बातों के बीच सबसे बड़ा सवाल ये है कि आज के वर्तमान परिवेश में सरदार पटेल के जीवन से हम कितना सीख रहे हैं. उनके विचारों को हम किस तरह लेकर चल रहे हैं. क्या सरदार पटेल के सपनों का भारत यही हैं जो आज का वर्तमान भारत है.

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-भारत एक्सप्रेस



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