इलाहाबाद हाई कोर्ट
प्रयागराज: इलाहाबाद हाई कोर्ट ने महिला एवं बाल कल्याण से जुड़े एक अत्यंत महत्वपूर्ण मामले में बड़ा फैसला सुनाते हुए ‘रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष’ की उस अनिवार्य शर्त को असंवैधानिक घोषित कर दिया है, जिसके तहत मेडिकल इंजरी रिपोर्ट न होने पर आर्थिक सहायता रोकी जाती थी. न्यायमूर्ति सरल श्रीवास्तव और न्यायमूर्ति गरिमा प्रसाद की खंडपीठ ने स्पष्ट कहा कि यौन हिंसा की शिकार पीड़िता को मेडिकल जांच के लिए सहमति न देने का कानून द्वारा संरक्षित अधिकार है. इसकी आड़ में पीड़िता को पुनर्वास और आर्थिक सहायता से वंचित करना पूर्णतः मनमाना और संविधान के अनुच्छेद 14 (समानता के अधिकार) का खुला उल्लंघन है.
‘जब ट्रायल में चोट दिखना जरूरी नहीं, तो कल्याण योजना में शर्त कैसी?’
अदालत ने तल्ख टिप्पणी करते हुए कहा कि जब मुख्य आपराधिक मुकदमे (ट्रायल) में भी केवल मेडिकल इंजरी न दिखने के आधार पर आरोपी बरी नहीं हो सकता, तो कल्याणकारी योजना में इसे अनिवार्य कैसे बनाया जा सकता है. कोर्ट ने कहा कि पॉक्सो (POCSO) एक्ट की धारा 3 के तहत अपराध साबित होने के लिए शरीर पर दिखने वाली चोट होना कतई अनिवार्य नहीं है. इसके अलावा पॉक्सो की धारा 27(1), सीआरपीसी की धारा 164-ए(7) और भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता (BNSS) की धारा 184(7) भी स्पष्ट करती हैं कि बिना सहमति के मेडिकल जांच विधिपूर्ण नहीं है. सुप्रीम कोर्ट भी ‘टू-फिंगर टेस्ट’ को पीड़िता की गरिमा के खिलाफ ठहरा चुका है. ऐसे में सहमति न देने पर कल्याणकारी राहत रोकना अनुचित है.
जौनपुर की 8 साल की बच्ची से जुड़ा है मामला
यह मामला जौनपुर के शाहगंज थाना क्षेत्र का है, जहां 28 जनवरी 2024 को 8 साल की बच्ची के साथ यौन उत्पीड़न हुआ था. पुलिस ने मामले में पॉक्सो एक्ट की धारा 5(m)/6 के तहत चार्जशीट दाखिल की. 8 मार्च 2024 को बच्ची को मेडिकल जांच के लिए ले जाया गया था, लेकिन परिजनों ने विशेष आंतरिक जांच के लिए सहमति नहीं दी, जिससे इंजरी रिपोर्ट नहीं बन सकी. इसके आधार पर डिस्ट्रिक्ट स्टीयरिंग कमेटी ने यूपी रानी लक्ष्मीबाई महिला एवं बाल सम्मान कोष नियमावली 2015 की प्रविष्टि-7 का हवाला देकर बच्ची का क्लेम यह कहकर खारिज कर दिया कि उसमें पेनिट्रेटिव असॉल्ट दर्शाने वाली इंजरी रिपोर्ट संलग्न नहीं है.
10 दिन के भीतर ₹3 लाख मुआवजा देने का आदेश
खंडपीठ ने कमेटी के फैसले को दरकिनार करते हुए कहा कि एक ही अपराध की शिकार दो बच्चियों के बीच केवल मेडिकल रिपोर्ट की उपलब्धता के आधार पर भेदभाव नहीं किया जा सकता. दोनों का मानसिक आघात (ट्रॉमा) और पुनर्वास की जरूरत समान है. नियमावली का उद्देश्य पीड़िता को तत्काल राहत पहुंचाना है, न कि तकनीकी आधारों पर निराश करना. हाई कोर्ट ने राज्य सरकार को सख्त निर्देश दिया कि आदेश के 10 दिनों के भीतर पीड़िता को ₹3,00,000 की आर्थिक सहायता राशि जारी की जाए और यह धनराशि नाबालिग के सुरक्षित बैंक खाते में जमा कराई जाए.
इस तरह की अन्य खबरें पढ़ने के लिए भारत एक्सप्रेस न्यूज़ ऐप डाउनलोड करें.


