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भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा को दुनिया ने किया सलाम, यूनेस्को की सूची में शामिल हुए महाभारत, राजतरंगिणी और अर्थशास्त्र

यूनेस्को ने भारत की तीन ऐतिहासिक धरोहरों महाभारत, राजतरंगिणी और कौटिल्य के अर्थशास्त्र को मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड के एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल किया है.

भारत की हजारों साल पुरानी सांस्कृतिक और साहित्यिक विरासत को अंतरराष्ट्रीय मंच पर एक बड़ी पहचान मिली है. देश के तीन ऐतिहासिक ग्रंथों महाभारत, राजतरंगिणी और अर्थशास्त्र को यूनेस्को के मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल किया गया है. यह फैसला इंडोनेशिया की राजधानी जकार्ता में आयोजित मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कमिटी फॉर एशिया एंड द पैसिफिक (MOWCAP) के 11वें सत्र में लिया गया.

इस उपलब्धि को भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा और सभ्यतागत विरासत के लिए बड़ी उपलब्धि माना जा रहा है. संस्कृति मंत्रालय और इंदिरा गांधी राष्ट्रीय कला केंद्र (IGNCA) ने भी इसे देश के लिए गौरव का क्षण बताया है. इन तीनों ग्रंथों को जगह मिलने के बाद एशिया-प्रशांत क्षेत्रीय रजिस्टर में भारत की कुल प्रविष्टियों की संख्या बढ़कर छह हो गई है.

इससे पहले साल 2024 में भारत की तीन अन्य महत्वपूर्ण रचनाओं रामचरितमानस, पंचतंत्र और सहृदयलोक-लोचन को भी यूनेस्को के इसी क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल किया गया था. अब महाभारत, राजतरंगिणी और अर्थशास्त्र को मिली इस मान्यता ने भारतीय साहित्य, इतिहास और राजनीति से जुड़े ज्ञान को एक बार फिर वैश्विक पहचान दिलाई है.

आखिर क्यों खास हैं ये तीनों प्राचीन ग्रंथ?

भारत के इन तीनों ग्रंथों का महत्व सिर्फ साहित्य तक सीमित नहीं है. इनमें उस दौर के समाज, शासन व्यवस्था, राजनीतिक सोच, मानवीय रिश्तों और जीवन मूल्यों की झलक मिलती है.

राजतरंगिणी: कश्मीर के इतिहास का महत्वपूर्ण दस्तावेज

12वीं शताब्दी में कश्मीरी विद्वान कल्हण ने राजतरंगिणी की रचना की थी. संस्कृत में लिखा गया यह ग्रंथ कश्मीर के राजाओं, उनके शासन, राजनीतिक घटनाओं और उस समय के सामाजिक-सांस्कृतिक जीवन की जानकारी देता है. इसे भारतीय उपमहाद्वीप में इतिहास लेखन की शुरुआती और महत्वपूर्ण पुस्तकों में गिना जाता है.

इसकी खासियत यह है कि कल्हण ने केवल राजाओं की उपलब्धियों का जिक्र नहीं किया, बल्कि उनके शासनकाल की घटनाओं और परिस्थितियों को भी दर्ज किया. राजतरंगिणी की पांडुलिपि श्रीनगर की ओरिएंटल रिसर्च लाइब्रेरी में सुरक्षित रखी गई है.

महाभारत: जीवन, धर्म और कर्तव्य की सीख देने वाला महाकाव्य

महाभारत भारतीय संस्कृति और साहित्य की सबसे महत्वपूर्ण रचनाओं में से एक है. यह केवल कौरवों और पांडवों के बीच हुए युद्ध की कहानी नहीं है, बल्कि धर्म, न्याय, कर्तव्य, सत्ता, रिश्तों और इंसानी स्वभाव जैसे विषयों पर भी गहराई से विचार करता है.

इस महाकाव्य की करीब 400 साल पुरानी एक विशेष पांडुलिपि शारदा लिपि में भूर्ज-पत्र यानी भोजपत्र पर लिखी गई है. यह पांडुलिपि पुणे स्थित भंडारकर ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में संरक्षित है. यूनेस्को की सूची में इसका शामिल होना भारतीय महाकाव्य परंपरा के लिए बड़ी उपलब्धि है.

अर्थशास्त्र: शासन और राजनीति की प्राचीन समझ

कौटिल्य, जिन्हें चाणक्य के नाम से भी जाना जाता है, द्वारा रचित अर्थशास्त्र प्राचीन भारत की राजनीतिक और आर्थिक सोच का महत्वपूर्ण ग्रंथ है. इसमें शासन चलाने, प्रशासनिक व्यवस्था, अर्थनीति, कूटनीति, सैन्य रणनीति और राज्य संचालन से जुड़े कई अहम सिद्धांत बताए गए हैं.

इसकी 16वीं शताब्दी की ग्रंथ लिपि में लिखी ताड़पत्र पांडुलिपि मैसूर स्थित ओरिएंटल रिसर्च इंस्टीट्यूट में सुरक्षित है. साल 1905 में आर. शमाशास्त्री ने इस ग्रंथ की पुनर्खोज की थी. इसके सामने आने के बाद दुनिया को प्राचीन भारत की राजनीतिक व्यवस्था और प्रशासनिक समझ के बारे में महत्वपूर्ण जानकारी मिली.

क्या है यूनेस्को का मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कार्यक्रम?

यूनेस्को ने साल 1992 में मेमोरी ऑफ द वर्ल्ड कार्यक्रम की शुरुआत की थी. इसका मुख्य उद्देश्य दुनिया के महत्वपूर्ण ऐतिहासिक दस्तावेजों, पांडुलिपियों और बौद्धिक विरासत को सुरक्षित रखना है, ताकि आने वाली पीढ़ियां भी इनसे जुड़ी जानकारी हासिल कर सकें.

इस कार्यक्रम के तहत ऐसी धरोहरों को पहचान दी जाती है, जिनका ऐतिहासिक, सांस्कृतिक और ज्ञान संबंधी महत्व पूरी दुनिया के लिए खास है. भारत के इन तीन ग्रंथों का क्षेत्रीय रजिस्टर में शामिल होना इसी दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम है.

महाभारत, राजतरंगिणी और अर्थशास्त्र को मिली यह मान्यता बताती है कि भारत की प्राचीन ज्ञान परंपरा आज भी दुनिया के लिए कितनी महत्वपूर्ण है. इन ग्रंथों में मौजूद विचार केवल अपने समय तक सीमित नहीं रहे, बल्कि आज भी इतिहासकारों, शोधकर्ताओं, नीति निर्माताओं और दुनिया भर के विद्वानों के लिए अध्ययन का विषय बने हुए हैं. यह उपलब्धि भारत की सांस्कृतिक पहचान को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर और मजबूत करेगी.

साथ ही, इन दुर्लभ पांडुलिपियों के संरक्षण और उनके महत्व को नई पीढ़ी तक पहुंचाने की दिशा में भी ध्यान आकर्षित करेगी. भारत की सदियों पुरानी ज्ञान-संपदा को यूनेस्को के मंच पर मिली यह पहचान निश्चित रूप से देश के लिए गर्व का विषय है.



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