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दिवाली सिर्फ आतिशबाजी नहीं, लोकजीवन का उत्सव है: देहरी पर लक्ष्मी के पग से लेकर ‘सूप संग दरिद्र बाहर’ तक की अनोखी रस्में

Diwali Traditions: भारत के विभिन्न प्रांतों में दिवाली केवल दीप जलाने तक सीमित नहीं है. बिहार-झारखंड के मिट्टी के घरौंदे, बंगाल का चौद्दो शाक, ओडिशा का कौंरिया काठी और छत्तीसगढ़ की दियारी जैसी समृद्ध लोक परंपराएं इस महापर्व को खास बनाती हैं.

Diwali Traditions

Diwali Traditions

Diwali Traditions: दिवाली की बेला आते ही भारतीय लोकजीवन में एक नई उमंग और हलचल जाग उठती है. घर-आंगन की लिपाई-पुताई, देहरी पर गेरू और चूने की लाली, चावल के घोल (ऐपन या अल्पना) से उभरती शुभ आकृतियां और मिट्टी के दीयों की टिमटिमाती लौ मिलकर उत्सव का स्वागत करती हैं. किंतु इस महापर्व का सौंदर्य केवल दीपों तक सीमित नहीं है. भारत के विभिन्न अंचलों में दिवाली से जुड़ी अनेक ऐसी अलौकिक लोक रीतियां प्रचलित हैं, जिनमें आम जनमानस की सहज आस्था, सुख-समृद्धि की कामना और पुरखों से मिली सांस्कृतिक स्मृतियां एक साथ सांस लेती हैं.

मिट्टी से सने हाथों से बनते घरौंदे (बिहार और झारखंड)

बिहार और झारखंड के ग्रामीण व कस्बाई इलाकों में दिवाली की आहट मिलते ही बच्चों के मन में ‘घरौंदा’ बनाने का उल्लास छा जाता है. नन्हीं ईंटों, मिट्टी और गोबर को सानकर छोटे-छोटे कमरे, दालान और दरवाजे बनाए जाते हैं.

अन्न और मिष्ठान का अर्पण: दिवाली की शाम घरौंदे के भीतर दो मिट्टी के छोटे घड़ों (चुक्की) में पांच प्रकार के अन्न और मिठाई का मिश्रण भरकर रखा जाता है. अगली सुबह बहनें उसी मिश्रण को अपने भाइयों को खिलाती हैं.

प्रतीक: छोटी सी जगह में पूरा घर बसाने की यह रस्म बच्चों को सुखी गृहस्थी, स्वावलंबन और भविष्य की समृद्धि का पाठ अनजाने में ही सिखा जाती है. भले ही आज बाजार में रंगीन गत्ते और लकड़ी के रेडीमेड घरौंदे मिलने लगे हों, लेकिन मिट्टी को गूंथकर अपना आशियाना बनाने का भाव आज भी वैसा ही है.

देहरी पर उकेरे जाते लक्ष्मी के पग और अल्पना (बंगाल व उत्तर भारत)

लोक परंपरा में देहरी घर के भीतर और बाहर की लक्ष्मण रेखा है, जहां से मंगल का प्रवेश होता है.

पश्चिम बंगाल में दिवाली की अमावस्या पर मुख्य रूप से मां काली की पूजा होती है, लेकिन घरों में देवी लक्ष्मी के स्वागत के लिए चावल के घोल से विशेष ‘अल्पना’ बनाई जाती है. मुख्य द्वार से लेकर पूजा स्थल तक देवी लक्ष्मी के छोटे-छोटे चरण-चिह्न (पग) उकेरे जाते हैं, मानो मां साक्षात चलकर भीतर आ रही हों. उत्तर भारत में भी गेरू, खड़िया और रंगों से कमल, स्वस्तिक और लक्ष्मी पग बनाकर यह प्रार्थना की जाती है कि घर में अन्न-धन और शांति का वास बना रहे.

14 दीपक और चौदह प्रकार की सब्जियां: भूत चतुर्दशी (पश्चिम बंगाल, ओडिशा)

पश्चिम बंगाल में दिवाली से ठीक एक दिन पहले यानी कार्तिक कृष्ण चतुर्दशी को ‘भूत चतुर्दशी’ के रूप में मनाया जाता है. चौद्दो प्रदीप और चौद्दो शाक: इस दिन घर के अलग-अलग चौदह कोनों में 14 मिट्टी के दीये (चौद्दो प्रदीप) जलाए जाते हैं. ऐसी मान्यता है कि ये दीपक अंधकार के बीच हमारे चौदह पूर्वजों (पितरों) के आगमन और उनकी राह को आलोकित करने के लिए जलाए जाते हैं. इसी दिन दोपहर के भोजन में 14 प्रकार की पत्तेदार स्थानीय सब्जियां (चौद्दो शाक) पकाने और खाने का रिवाज है, जो मौसमी बदलाव में शरीर की प्रतिरोधक क्षमता को बढ़ाता है.

ओडिशा का कौंरिया काठी: ओडिशा में दिवाली की रात ‘बड़ा बडुआ डाका’ अनुष्ठान होता है. इसमें जूट (पटसन) के सूखे डंठलों (कौंरिया काठी) को एक साथ बांधकर जलाया जाता है और ऊपर की ओर उठाकर पूर्वजों को पुकारते हुए उनका आशीर्वाद मांगा जाता है.

‘सूप संग लक्ष्मी भीतर, दरिद्र बाहर’ (दलिद्दर खेदना)

उत्तर प्रदेश के पूर्वांचल, बिहार और झारखंड के ग्रामीण आंचल में दिवाली की रात या अगली सुबह ‘दलिद्दर खेदना’ (दरिद्रता को खदेड़ना) की बेहद अनूठी परंपरा निभाई जाती है. घर की बुजुर्ग महिलाएं और बहुएं हाथ में सूप (अनाज फटकने वाला पारंपरिक साधन) और डंडा लेकर घर के प्रत्येक कोने, दालान और कोठरी में जाती हैं. सूप पर डंडे की थाप मारते हुए वे लोकबोल गाती हैं—“लक्ष्मी भीतर, दरिद्र बाहर” अथवा “ईसर आवै, दलिदर जावै”.

सूप का उपयोग दैनिक जीवन में अनाज से भूसी और अशुद्धियों को अलग करने के लिए होता है. लोकचेतना ने इसी साधारण क्रिया को घर से नकारात्मकता, आलस्य और विपन्नता को बाहर निकालकर सकारात्मक ऊर्जा और अन्न के स्वागत का माध्यम बना दिया.

गोवा का नरकासुर दहन और बस्तर की ‘दियारी’

गोवा में नरकासुर दहन: गोवा में दिवाली की सुबह से पहले कागज, घास और रंगीन पन्नियों से बने विशालकाय नरकासुर के पुतलों को सड़कों पर घुमाया जाता है और फिर उनका दहन कर बुराई पर अच्छाई की विजय का पर्व मनाया जाता है.

छत्तीसगढ़ (बस्तर) की ‘दियारी’: बस्तर के आदिवासी अंचलों में मुख्य दिवाली के करीब डेढ़ महीने बाद नई धान की फसल घर आने पर तीन-चार दिनों तक ‘दियारी’ पर्व मनाया जाता है. इसमें नई फसल की बालियों से नारायण राजा का विवाह रचाया जाता है, गाय-बैलों को पलाश की जड़ों और मोरपंख की सोहई माला पहनाई जाती है, और चरवाहों (धोरई) को नए अन्न से बनी खिचड़ी खिलाकर व अन्न देकर सम्मानित किया जाता है.

मौन चरावण, दिवारी नृत्य और पहाड़ों की ‘बूढ़ी दिवाली’

बुंदेलखंड का मौन चरावण: मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश के बुंदेलखंड क्षेत्र में दिवाली के अगले दिन पुरुष मौन व्रत धारण कर भगवान कृष्ण के ग्वाल रूप में गायों को चराते हैं. इसके बाद मोरपंख से सजी लाठियों के साथ ऊर्जावान ‘दिवारी नृत्य’ की प्रस्तुतियां होती हैं.

हिमाचल की ‘बूढ़ी दिवाली’: हिमाचल प्रदेश के दुर्गम पहाड़ी क्षेत्रों (जैसे कुल्लू, सिरमौर) में मुख्य दिवाली के ठीक एक महीने बाद ‘बूढ़ी दिवाली’ मनाई जाती है. लोकमान्यता है कि भगवान राम के अयोध्या लौटने का समाचार इन दूरस्थ पहाड़ों तक एक माह देर से पहुंचा था, इसलिए यहां मशालें जलाकर और पारंपरिक रासा नृत्य कर एक महीने बाद दीपोत्सव मनाया जाता है.

भारत के अलग-अलग अंचलों में प्रचलित ये परंपराएं दर्शाती हैं कि दीपोत्सव का असली मर्म महंगे आयोजनों में नहीं, बल्कि मिट्टी, सूप, गो-सेवा और परिवार व समाज के सामूहिक उल्लास में बसा है.

भारत एक्सप्रेस



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