दिल्ली के 43.5% बच्चों के फेफड़े कमजोर!
Delhi Children Lung Health: दिल्ली की खराब हवा अब सिर्फ मौसम या असुविधा का मुद्दा नहीं रह गई है बल्कि यह बच्चों की सेहत पर भी गंभीर असर डाल रही है. हाल ही में 6 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट ने वायु प्रदूषण और पटाखों के इस्तेमाल को लेकर सख्त टिप्पणी करते हुए कहा कि केवल अदालत के आदेश, पुलिस की निगरानी या प्रशासनिक कार्रवाई से समस्या का हल नहीं निकलेगा. लोगों को खुद आगे आना होगा और प्रदूषण के खिलाफ जनभागीदारी को अभियान का रूप देना होगा.
सुप्रीम कोर्ट ने लोगों की भागीदारी पर दिया जोर
चीफ जस्टिस सूर्यकांत की अध्यक्षता वाली तीन सदस्यीय पीठ ने सुनवाई के दौरान कहा कि पटाखों से होने वाले प्रदूषण को नियंत्रित करने के लिए केवल आदेश जारी करना पर्याप्त नहीं है. अदालत का मानना है कि जब तक आम नागरिक इस मुहिम का हिस्सा नहीं बनेंगे, तब तक वास्तविक बदलाव संभव नहीं होगा. कोर्ट ने केंद्र, राज्य सरकारों और स्थानीय निकायों से कहा कि पार्षदों और जनप्रतिनिधियों की मदद लेकर लोगों को जागरूक किया जाए. अदालत ने यह भी टिप्पणी की कि बार-बार प्रतिबंध लगाने से कई बार लोग नियमों की अनदेखी करने लगते हैं. ऐसे में पटाखा-मुक्त दिवाली को सामाजिक आंदोलन बनाने की जरूरत है.
बच्चों के फेफड़ों पर पड़ा प्रदूषण का बड़ा असर
दिल्ली में प्रदूषण का बच्चों पर क्या असर पड़ रहा है, इसकी झलक केंद्रीय प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड (CPCB) की एक अहम स्टडी में देखने को मिली थी. वर्ष 2012 में किए गए इस अध्ययन में यह सामने आया कि राजधानी के 43.5 प्रतिशत स्कूली बच्चों के फेफड़े सामान्य क्षमता से कम काम कर रहे थे. दूसरी ओर, दिल्ली के बाहर रहने वाले बच्चों में यह प्रतिशत 25.7 था.
हालांकि यह रिपोर्ट कई साल पुरानी है, लेकिन इससे यह साफ संकेत मिलता है कि लगातार खराब होती वायु गुणवत्ता का असर बच्चों के स्वास्थ्य पर गहराई तक पहुंच रहा है. यही वजह है कि वर्षों से पटाखों पर रोक और वायु प्रदूषण को लेकर बहस जारी है, लेकिन जमीन पर अपेक्षित परिणाम नहीं दिख रहे हैं.
5,671 बच्चों पर हुई जांच में चौंकाने वाले नतीजे
‘स्टडी ऑन एम्बिएंट एयर क्वालिटी, रेस्पिरेटरी सिंप्टम्स एंड लंग फंक्शन ऑफ चिल्ड्रेन इन दिल्ली’ नामक इस शोध में 9 से 17 वर्ष की आयु के बच्चों के स्वास्थ्य की जांच की गई थी. अध्ययन में दिल्ली के 5,671 बच्चों और अन्य क्षेत्रों के 2,245 बच्चों को शामिल किया गया था.
रिपोर्ट के अनुसार, दिल्ली के 20.3 प्रतिशत बच्चों में सांस अंदर लेने और छोड़ने की क्षमता से संबंधित समस्याएं पाई गईं. वहीं 13.6 प्रतिशत बच्चों में श्वसन नलियों से जुड़ी दिक्कतें सामने आईं. इसके अलावा 9.6 प्रतिशत बच्चों में दोनों प्रकार की समस्याएं एक साथ दर्ज की गईं. यह आंकड़े दर्शाते हैं कि राजधानी की हवा बच्चों के श्वसन तंत्र पर लगातार दबाव बना रही है.
लड़कियों में स्थिति और ज्यादा चिंताजनक
अध्ययन में यह भी पाया गया कि प्रदूषण का असर लड़कियों पर अपेक्षाकृत अधिक दिखाई दिया. दिल्ली में 51 प्रतिशत लड़कियों के फेफड़ों की क्षमता सामान्य से कम दर्ज की गई, जबकि लड़कों में यह आंकड़ा 39.8 प्रतिशत था. यही नहीं, गंभीर श्रेणी की फेफड़ों संबंधी समस्याओं से जूझ रहे बच्चों की संख्या भी दिल्ली में ज्यादा मिली. राजधानी में ऐसे बच्चों का प्रतिशत 7.3 था, जबकि दूसरे इलाकों में यह केवल 2.2 प्रतिशत दर्ज किया गया. मौसम के हिसाब से देखें तो मानसून के दौरान 39.9 प्रतिशत बच्चों में फेफड़ों की क्षमता कम पाई गई, जबकि सर्दी और गर्मी के मौसम में यह आंकड़ा बढ़कर 52.7 प्रतिशत तक पहुंच गया.
प्रतिबंधों के बावजूद क्यों नहीं थम रहा प्रदूषण?
दिल्ली-एनसीआर में पटाखों की बिक्री और इस्तेमाल पर समय-समय पर कई तरह की पाबंदियां लगाई गई हैं. वर्ष 2018 में सुप्रीम कोर्ट ने पारंपरिक पटाखों की बिक्री रोकते हुए केवल ग्रीन पटाखों को मंजूरी दी थी. इसके बावजूद हर साल दिवाली के दौरान पटाखों से जुड़ा प्रदूषण गंभीर चिंता का विषय बनता है.
2 नवंबर 2026 को हुई सुनवाई में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि 2024 में पूर्ण प्रतिबंध के बावजूद दिल्ली-एनसीआर के वायु गुणवत्ता सूचकांक (AQI) में कोई उल्लेखनीय सुधार देखने को नहीं मिला. अदालत ने यह भी कहा कि संबंधित सरकारें और एजेंसियां ऐसा पर्याप्त आंकड़ा पेश नहीं कर सकीं, जिससे यह स्पष्ट हो सके कि पूर्ण प्रतिबंध का वास्तविक प्रभाव कितना पड़ा. कोर्ट ने माना कि पटाखे प्रदूषण बढ़ाते हैं, लेकिन केवल प्रतिबंध लगाने से समस्या का समाधान नहीं निकलता.
ग्रीन पटाखे भी पूरी तरह सुरक्षित नहीं
प्रदूषण को कम करने के उद्देश्य से CSIR-NEERI द्वारा ग्रीन पटाखों का विकास किया गया था. इनमें ऐसे रासायनिक संयोजन इस्तेमाल किए जाते हैं जिनसे सामान्य पटाखों की तुलना में कम प्रदूषण फैलता है. संस्था के अनुसार, ग्रीन पटाखों से निकलने वाले पार्टिकुलेट मैटर में कम से कम 30 प्रतिशत तक कमी लाई जा सकती है. कुछ विशेष फॉर्मूलेशन के मामले में PM2.5 और PM10 उत्सर्जन में इससे भी अधिक कमी दर्ज की गई है. लेकिन विशेषज्ञ स्पष्ट करते हैं कि ग्रीन पटाखे पूरी तरह प्रदूषण रहित नहीं हैं. उनसे भी हवा में प्रदूषक तत्व निकलते हैं. इसी कारण इनके उपयोग के लिए तय समय और नियमों का पालन जरूरी माना जाता है.
दुकानदारों की चाल से बढ़ रही मुश्किलें
पटाखों पर प्रतिबंध लागू कराने में प्रशासन को बाजार स्तर पर भी कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान अमिकस क्यूरी अपराजिता सिंह ने अदालत को बताया कि कुछ दुकानदार सामने ग्रीन पटाखों के पैकेट प्रदर्शित करते हैं, लेकिन ग्राहकों को अंदर से सामान्य पटाखे बेचते हैं.
इस तरह की गतिविधियों से निगरानी तंत्र कमजोर पड़ जाता है क्योंकि अधिकारियों के लिए यह पहचान करना मुश्किल हो जाता है कि वास्तव में कौन से पटाखे बेचे जा रहे हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि सिर्फ छापेमारी या दुकान जांच से काम नहीं चलेगा. निर्माण से लेकर बिक्री और उपयोग तक पूरी श्रृंखला की निगरानी आवश्यक है. सुप्रीम कोर्ट ने भी प्रशासन, पुलिस और अन्य एजेंसियों के बीच बेहतर समन्वय की जरूरत पर जोर दिया है.
प्रदूषण का पूरा दोष पटाखों पर डालना सही नहीं
दिल्ली की हवा केवल दिवाली के आसपास खराब नहीं होती. राजधानी में सालभर कई स्रोत प्रदूषण बढ़ाने का काम करते हैं. वाहनों से निकलने वाला धुआं, औद्योगिक इकाइयों का उत्सर्जन, निर्माण गतिविधियों से उड़ने वाली धूल, कूड़ा जलाने की घटनाएं और पड़ोसी राज्यों में पराली जलाना इस संकट को और गंभीर बनाते हैं.
फरवरी 2026 में वायु गुणवत्ता प्रबंधन आयोग (CAQM) ने सुप्रीम कोर्ट के निर्देश पर तैयार विशेषज्ञ समिति की रिपोर्ट पर विचार किया था. इस रिपोर्ट में 2015 से 2025 के बीच किए गए प्रदूषण संबंधी अध्ययनों का विश्लेषण शामिल था. रिपोर्ट के अनुसार, सर्दियों के दौरान दिल्ली में PM2.5 प्रदूषण में विभिन्न स्रोतों की महत्वपूर्ण भूमिका रहती है.
गर्मियों में धूल बन जाती है सबसे बड़ा कारण
विशेषज्ञ रिपोर्ट में यह भी बताया गया कि मौसम बदलने के साथ प्रदूषण के स्रोतों का योगदान भी बदल जाता है. गर्मी के मौसम में धूल सबसे प्रमुख प्रदूषण कारक बनकर उभरती है. उस समय कुल प्रदूषण में धूल का योगदान 27 प्रतिशत तक पहुंच जाता है. इसके बाद वाहनों का हिस्सा 19 प्रतिशत और सेकेंडरी पार्टिकल्स का योगदान 17 प्रतिशत रहता है. सेकेंडरी पार्टिकल्स वे सूक्ष्म कण होते हैं, जो वाहनों, उद्योगों और अन्य स्रोतों से निकलने वाली गैसों के वातावरण में रासायनिक प्रतिक्रिया करने के बाद बनते हैं. यही कारण है कि विशेषज्ञ लगातार बहुस्तरीय रणनीति अपनाने की सलाह देते हैं.
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सरकारों के सामने असली चुनौती क्या है?
केंद्र सरकार ने दिसंबर 2024 में संसद में स्वीकार किया था कि दिल्ली-एनसीआर का प्रदूषण किसी एक वजह का नतीजा नहीं है. वाहनों का धुआं, औद्योगिक गतिविधियां, निर्माण कार्य, कचरे का जलना और पराली से उठने वाला धुआं इसके प्रमुख कारण हैं. इसके अलावा सर्दियों में तापमान गिरना, हवा की गति कम होना और वातावरण में नमी बढ़ना भी प्रदूषकों को जमीन के करीब रोक देता है.
सरकार ने संसद को यह भी बताया था कि 11 नवंबर 2024 को सुप्रीम कोर्ट के निर्देशों के बाद दिल्ली पुलिस को पटाखा प्रतिबंध लागू कराने के लिए विशेष सेल गठित करने को कहा गया था. इसके बावजूद यदि बाजार में सामान्य पटाखे खुलेआम पहुंच रहे हैं, तो यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि संबंधित एजेंसियों की निगरानी कितनी प्रभावी है.
सुप्रीम कोर्ट का भी यही मानना है कि प्रदूषण से लड़ाई केवल त्योहारों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए. दिवाली बीत जाने के बाद भी लगातार निगरानी, सख्त अमल और जनजागरूकता अभियान जारी रखना उतना ही जरूरी है. तभी दिल्ली की हवा और आने वाली पीढ़ियों की सेहत को बेहतर बनाया जा सकेगा.
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