Ram Manohar Lohia Goa Satyagraha 1946
Ram Manohar Lohia Goa Satyagraha 1946: 18 जून 1946 — गोवा के इतिहास में एक यादगार दिन. समाजवादी नेता राम मनोहर लोहिया ने पुर्तगाली उपनिवेशवाद के खिलाफ खुली चुनौती देते हुए गोवा में सत्याग्रह की नींव रखी, जो अंततः 19 दिसंबर 1961 को गोवा की मुक्ति में निर्णायक भूमिका निभाई.
असोला में वह ऐतिहासिक शाम
18 जून 1946 को दक्षिण गोवा के असोला गांव में शांति भरी शाम थी. पुर्तगाली प्रशासन अपनी सामान्य कार्यवाही में व्यस्त था. लेकिन उस शाम राम मनोहर लोहिया ने मार्गाओ के म्यूनिसिपल भवन के सामने घोड़े की गाड़ी पर सवार होकर पहुंचकर इतिहास रच दिया.लोहिया, जो हाल ही में लाहौर जेल से रिहा हुए थे, सीधे गोवा पहुंचे थे. उन्होंने वहां एक सार्वजनिक सभा को संबोधित किया. पुर्तगाली पुलिस की चेतावनियों के बावजूद उन्होंने भाषण देना शुरू किया. उन्होंने कहा:
“भले ही हम एक बार में अपनी स्वतंत्रता प्राप्त न कर सकें, फिर भी हमें स्वतंत्रता के बारे में सोचना चाहिए, बोलना चाहिए और एक संगठन का निर्माण करना चाहिए. हमारी आशा लोगों की शक्ति में है, जो लगातार बढ़ रही है और जो कोई भी कठिनाइयां आने पर भी राज्य का निर्माण करेगी.” जब स्थानीय प्रशासनिक अधिकारी जूलियो मिरांडा ने उन्हें रोका, तो लोहिया ने बिना रुके भाषण जारी रखा. भीड़ में उत्तेजना बढ़ गई. पुलिस ने हस्तक्षेप किया और लोहिया को गिरफ्तार कर लिया.
आंदोलन की चिंगारी
लोहिया की गिरफ्तारी ने पूरे गोवा में आग की लपटें भड़का दीं. मार्गाओ में 6,000 से अधिक लोग सड़कों पर उतर आए। 20 जून को लोहिया को रिहा कर दिया गया और उन्हें निर्वासित कर दिया गया. लेकिन तब तक नुकसान हो चुका था — पुर्तगाली शासन की नींव हिल चुकी थी. इस घटना ने गोवा में सविनय अवज्ञा आंदोलन को नई दिशा दी. महिलाओं ने भी सक्रिय भागीदारी की. वत्सला पांडुरंग किर्तानी जैसी महिलाओं की गिरफ्तारी के बाद 40 से अधिक महिलाएं पुलिस स्टेशन तक मार्च निकालने लगीं.
लोहिया का संकल्प
लोहिया ने गोवा में रहकर ही आंदोलन को मजबूत किया. उन्होंने अगस्त 1946 में पुर्तगाली सीमा पर फिर प्रयास किया, लेकिन गिरफ्तार हो गए. पांच साल तक उन्हें भारत में प्रवेश करने से रोका गया. लेकिन इस दौरान गोवा में स्वतंत्रता की लहर तेज होती गई. 1947 तक गोवा का आंदोलन पूरे भारत के स्वतंत्रता आंदोलन से जुड़ चुका था. 1961 में भारतीय सेना की कार्रवाई “ऑपरेशन विजय” ने 451 साल पुराने पुर्तगाली शासन का अंत कर दिया.
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80 वर्ष बाद आज भी लोहिया का वह भाषण प्रेरणा का स्रोत है. यह हमें याद दिलाता है कि साहस और संकल्प कितनी बड़ी ताकत हो सकते हैं. एक व्यक्ति की आवाज पूरे राष्ट्र को जगा सकती है.गोवा की मुक्ति की कहानी सिर्फ एक क्षेत्र की आजादी की कहानी नहीं, बल्कि उपनिवेशवाद के खिलाफ पूरे भारत के संघर्ष का हिस्सा है. राम मनोहर लोहिया को इस योगदान के लिए हमेशा याद किया जाएगा.
भारत एक्सप्रेस
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