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सज्जाद जहीर की कहानी: रावलपिंडी षड्यंत्र, जेल से रिहाई और भारत वापसी

सज्जाद जहीर उर्दू साहित्य के प्रमुख लेखक, प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापक और कम्युनिस्ट विचारक थे. रावलपिंडी षड्यंत्र कांड में जेल जाने के बाद वे भारत लौटे, जहां नेहरू की मदद से उन्हें भारतीय नागरिकता मिली. जानिए उनके जीवन और राजनीतिक सफर की पूरी कहानी.

Sajjad Zaheer

सैयद सज्जाद जहीर (5 नवंबर 1905 – 13 सितंबर 1973) उर्दू साहित्य के प्रमुख लेखक, प्रगतिशील लेखक संघ के संस्थापकों में से एक और मार्क्सवादी विचारक थे. वे भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी के सक्रिय सदस्य रहे. विभाजन के बाद वे पाकिस्तान जाकर कम्युनिस्ट पार्टी ऑफ पाकिस्तान के निर्माण में शामिल हुए और उसके महासचिव बने.

रावलपिंडी षड्यंत्र कांड

1951 में पाकिस्तान में रावलपिंडी षड्यंत्र कांड सामने आया. इसमें सेना के अधिकारियों (मुख्य रूप से मेजर जनरल अकबर खान) के साथ फैज अहमद फैज और सज्जाद जहीर समेत कुछ नागरिकों पर लियाकत अली खान की सरकार को उखाड़ फेंकने की साजिश का आरोप लगा. सज्जाद जहीर को गिरफ्तार कर लिया गया.

विशेष ट्रिब्यूनल ने 1953 में फैसला सुनाया. सज्जाद जहीर और फैज अहमद फैज को चार साल की कठोर कैद की सजा हुई (कुछ स्रोतों में जुर्माना भी). वे लगभग चार साल जेल में रहे और 1955 के आसपास रिहा हुए. रिहाई के बाद पाकिस्तान से उन्हें निकाल दिया गया या वे भारत लौट आए.

नेहरू और नागरिकता

सज्जाद जहीर का परिवार भारत में ही था. उनकी पत्नी रजिया सज्जाद जहीर (उर्दू की प्रसिद्ध लेखिका) और बेटियां भारत में रहीं. उनके पिता सर सैयद वजीर हसन अवध चीफ कोर्ट/इलाहाबाद हाई कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश रहे थे. परिवार की नेहरू परिवार से पुरानी जान-पहचान थी (सज्जाद जहीर को “बन्ने” कहा जाता था).

जवाहरलाल नेहरू के 23 मार्च 1957 के नोट (नेहरू आर्काइव) से साफ है कि सरकार ने उन्हें पाकिस्तानी नागरिक माना था, फिर भी परिवार की स्थिति देखते हुए भारत में रहने की अनुमति दी गई. बाद में नेहरू की मदद से उन्हें भारतीय नागरिकता मिल गई. विकिपीडिया और अन्य स्रोतों में भी यह उल्लेख है कि रिहाई के बाद नेहरू ने भारतीय नागरिकता दिलाने में भूमिका निभाई.

यह व्यक्तिगत-पारिवारिक संबंधों और मानवीय आधार पर हुआ. “सभी कायदे-कानून ताक पर रखकर” जैसी अतिशयोक्ति ऐतिहासिक दस्तावेजों से मेल नहीं खाती.

संपत्ति का सवाल

परिवार अवध का जमींदार परिवार था. विभाजन के बाद जो संपत्ति भारत में थी, वह एवेक्यूई प्रॉपर्टी कस्टोडियन के अधीन आ गई होगी. नागरिकता मिलने और भारत लौटने के बाद सामान्य कानूनी प्रक्रिया के तहत पैतृक संपत्ति का निपटारा संभव था. ‘करोड़ों की संपत्ति विशेष आदेश से वापस दिलाने’ का कोई ठोस स्वतंत्र प्रमाण आसानी से उपलब्ध नहीं है. परिवार समृद्ध था, लेकिन यह दावा अतिरंजित लगता है.

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बाद का जीवन

भारत लौटकर सज्जाद जहीर प्रगतिशील लेखक संघ को फिर सक्रिय किया, अफ्रो-एशियन राइटर्स एसोसिएशन से जुड़े और लेखन-संपादन का काम जारी रखा. उनकी पत्नी रजिया सज्जाद जहीर उर्दू की सम्मानित लेखिका रहीं. बेटियों में नादिरा बब्बर (राज बब्बर से विवाह) और नूर जहीर (लेखिका) प्रमुख हैं. सज्जाद जहीर का निधन 1973 में अल्मा अता (तब सोवियत संघ) में एक साहित्यिक सम्मेलन के दौरान हुआ.

सज्जाद जहीर की कहानी विभाजन, कम्युनिस्ट राजनीति, साहित्य और भारत-पाकिस्तान संबंधों की जटिलताओं को दर्शाती है. वे भारत में जन्मे, पाकिस्तान में राजनीतिक सक्रियता के बाद जेल गए और फिर भारत लौटकर साहित्यिक-सांस्कृतिक कार्यों में लगे. नेहरू द्वारा नागरिकता में मदद पारिवारिक संबंधों और उनकी भारत में जड़ों के कारण हुई.

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-भारत एक्सप्रेस



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