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सरकारी स्कूल घट रहे हैं, निजी बढ़ रहे हैं, और बच्चे उतने नहीं घटे

सात साल में देशभर में 84 हज़ार से ज़्यादा स्कूल कम हुए, जिनमें 93% सरकारी स्कूल हैं. निजी स्कूल बढ़े और शिक्षा का खर्च नौ गुना तक बढ़ गया.

सात साल में देश में 84 हज़ार से ज़्यादा स्कूल कम हुए. सरकार का तर्क है कि बच्चे घट रहे हैं इसलिए स्कूल भी घटेंगे. लेकिन आंकड़े इस तर्क को काट देते हैं, क्योंकि जिस दौर में सरकारी स्कूल 78 हज़ार घटे, उसी दौर में निजी स्कूल 15 हज़ार बढ़ गए. बच्चे दोनों के लिए एक ही थे.

एक तुलना, जिससे बात शुरू होनी चाहिए

बिहार में पिछले सात साल में 3,606 प्राथमिक स्कूल कम हुए. कर्नाटक में 3,558. संख्या लगभग बराबर है. लेकिन बिहार की प्रजनन दर 2.9 है, जो देश में सबसे ऊंची है, और कर्नाटक की 1.5, जो प्रतिस्थापन स्तर से भी नीचे है. यानी जिस राज्य में सबसे ज़्यादा बच्चे पैदा हो रहे हैं और जिस राज्य में सबसे कम, दोनों ने बराबर स्कूल खोए.

यह संयोग नहीं है. यह इस बात का पहला संकेत है कि स्कूल इसलिए बंद नहीं हो रहे कि बच्चे कम हो गए. वे इसलिए बंद हो रहे हैं क्योंकि राज्य सरकारों ने बंद करने का फ़ैसला किया.

देश की पूरी तस्वीर

शिक्षा मंत्रालय के UDISE + आँकड़ों के अनुसार 2018-19 से 2025-26 के बीच देश में 84,318 स्कूल कम हुए. यह गिरावट सब पर बराबर नहीं पड़ी.

कुल शुद्ध कमी का 93 प्रतिशत हिस्सा अकेले सरकारी स्कूलों का है.

वह तर्क जो यहीं टूट जाता है

इस तालिका की सबसे अहम पंक्ति तीसरी है, और आमतौर पर उसी पर सबसे कम बात होती है.

जनसंख्या का घटना एक तटस्थ परिघटना है. जो बच्चे कम हुए, वे सरकारी और निजी दोनों तरह के स्कूलों के लिए बराबर कम हुए. किसी राज्य में जन्म दर गिरने से यह तय नहीं होता कि कमी किस स्कूल को झेलनी है. अगर वाकई जनसंख्या ही वजह होती, तो दोनों क्षेत्रों के स्कूल एक साथ घटते.

हुआ इसका उल्टा. सरकारी स्कूल 2018-19 के लगभग 10.88 लाख से घटकर 10.1 लाख रह गए, यानी करीब सवा सात प्रतिशत की कमी. इसी दौरान निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूल लगभग पांच प्रतिशत बढ़ गए. छह से ग्यारह साल के बच्चे इसी अवधि में छह प्रतिशत घटे.

तीनों आंकड़ों को एक साथ रखिए. बच्चे छह प्रतिशत घटे, सरकारी स्कूल सवा सात प्रतिशत घटे, और निजी स्कूल पांच प्रतिशत बढ़ गए. इसका सिर्फ़ एक ही अर्थ निकलता है कि सरकारी स्कूल जनसंख्या से तेज़ रफ़्तार में घटे, और उनकी जगह जो खाली हुई, वह निजी क्षेत्र ने भरी.

यह जनसांख्यिकी नहीं है. यह प्रतिस्थापन है.

स्कूल बंद कम हुए, आपस में जुड़ ज़्यादा गए

यहां एक बात साफ़ कर देना ज़रूरी है, क्योंकि इसके बिना दोनों पक्ष एक-दूसरे को गलत साबित करते रहते हैं.

सिर्फ प्राथमिक कक्षाएं (1 से 5) चलाने वाले स्कूल 1.1 लाख घटकर 7.2 लाख रह गए, लेकिन प्राथमिक के साथ ऊपर की कक्षाएं चलाने वाले स्कूल 78,089 बढ़कर 5 लाख हो गए. प्राथमिक शिक्षा देने वाले कुल स्कूल 12.3 लाख हैं, जिनमें कमी सिर्फ़ 26 हज़ार यानी लगभग दो प्रतिशत आई.

यानी हर बंद स्कूल गायब नहीं हुआ. ज़्यादातर मामलों में छोटे प्राथमिक स्कूल बड़े कंपोज़िट स्कूलों में मिला दिए गए.

सवाल यह नहीं है कि स्कूल गिने कितने गए. सवाल यह है कि जो बच्चा पहले अपने गांव के स्कूल में पढ़ता था, वह अब कहां पढ़ रहा है, कितनी दूर जाकर पढ़ रहा है, और उस दूरी की कीमत कौन चुका रहा है.

पैसा: नौ गुना का फ़र्क़

यहीं से यह नीति आम आदमी की जेब से जुड़ जाती है.

सांख्यिकी एवं कार्यक्रम कार्यान्वयन मंत्रालय के व्यापक मॉड्यूलर सर्वेक्षण (एनएसएस 80वाँ दौर) के अनुसार एक साल में एक विद्यार्थी पर परिवार का औसत खर्च सरकारी स्कूल में 2,863 रुपये है और गैर-सरकारी स्कूल में 25,002 रुपये. यह करीब नौ गुना का अंतर है. ग्रामीण इलाकों में भी यह फ़ासला आठ गुना के आसपास बैठता है, जहां सरकारी स्कूल का खर्च लगभग 2,800 रुपये और निजी गैर-सहायता प्राप्त स्कूल का लगभग 22,900 रुपये है.

इसी सर्वेक्षण की दो और पंक्तियां ध्यान देने लायक हैं. सरकारी स्कूल में पढ़ने वाले सिर्फ़ 26.7 प्रतिशत बच्चों ने कोर्स फीस दी, जबकि गैर-सरकारी स्कूलों में यह आंकड़ा 95.7 प्रतिशत है. और स्कूली शिक्षा पर होने वाले खर्च का पहला बड़ा स्रोत 95 प्रतिशत बच्चों के मामले में परिवार ही है, जबकि सरकारी छात्रवृत्ति सिर्फ़ 1.2 प्रतिशत बच्चों के लिए पहला स्रोत बनती है.

अब दोनों बातें जोड़िए. सरकारी स्कूल 78 हज़ार घटे, निजी 15 हज़ार बढ़े, और निजी में पढ़ना नौ गुना महंगा है. जिस भी परिवार का बच्चा इस बदलाव में सरकारी से निजी स्कूल में गया, उसके लिए शिक्षा का सालाना खर्च कई गुना बढ़ गया.

किसी सरकारी दस्तावेज़ में यह खर्च दर्ज नहीं होता, क्योंकि वह राजकोष से नहीं, घर के बजट से निकलता है.

यह नीति का वह हिस्सा है जो बजट में कहीं नहीं दिखता, पर सबसे ज़्यादा असर वहीं डालता है जहाँ आमदनी सबसे कम है.

इसी सर्वेक्षण के अनुसार बिहार में प्रति विद्यार्थी कुल खर्च देश में सबसे कम, 5,907 रुपये है. जिस राज्य के परिवार सबसे कम खर्च कर पा रहे हैं, वहां नौ गुना महंगा विकल्प व्यावहारिक विकल्प नहीं है. वह मजबूरी है, और अक्सर पढ़ाई छूटने की शुरुआत है.

दूरी: कानून की अधिकतम सीमा को लक्ष्य बना दिया गया

शिक्षा का अधिकार अधिनियम के तहत पड़ोस के स्कूल की परिभाषा तय है. कक्षा 1 से 5 तक के बच्चे के लिए घर से एक किलोमीटर की पैदल दूरी, और कक्षा 6 से 8 तक के लिए तीन किलोमीटर. यह अधिकतम सीमा है, जिसके बाहर बच्चे को भेजना कानून की मंशा के खिलाफ़ है.

अब उत्तर प्रदेश के 16 जून 2025 के आदेश को देखिए. उसमें विलय का दायरा प्राथमिक के लिए एक किलोमीटर और उच्च प्राथमिक के लिए तीन किलोमीटर रखा गया, यानी ठीक वही आंकड़े जो कानून ने अधिकतम सीमा के रूप में तय किए थे.

यह छोटा-सा तकनीकी विवरण दिखता है, पर इसका अर्थ बड़ा है. कानून ने कहा था कि स्कूल इससे दूर नहीं होना चाहिए. नीति ने उसी संख्या को योजना का लक्ष्य बना लिया. जो सीमा बच्चे की सुरक्षा के लिए बनाई गई थी, वह प्रशासनिक सुविधा का पैमाना बन गई. कागज़ पर कुछ भी अवैध नहीं हुआ, लेकिन व्यवहार में हर बच्चा उस सीमा के किनारे पर धकेल दिया गया जिसे कानून ने चरम स्थिति माना था.

और यह गणना नक्शे की सीधी रेखा पर होती है, जबकि छह साल का बच्चा नाले, रेलवे क्रॉसिंग, हाईवे और बरसात में डूबे रास्ते पर चलता है.

उत्तर प्रदेश में क्या हुआ?

सरकार का कहना था कि यह स्कूल बंद करना नहीं, संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल है. खाली भवन बाल वाटिका और आंगनवाड़ी बनेंगे, किसी शिक्षक की नौकरी नहीं जाएगी. अभिभावकों का कहना था कि छह साल के बच्चे के लिए स्कूल दूर हो जाएगा और यह शिक्षा के अधिकार तथा अनुच्छेद 21क की भावना के खिलाफ़ है.

मामला इलाहाबाद उच्च न्यायालय की लखनऊ पीठ में पहुंचा. सीतापुर की छात्रा कृष्णा कुमारी और अन्य याचिकाकर्ताओं की याचिकाएं 7 जुलाई 2025 को एकल पीठ ने खारिज कर दीं, यह कहते हुए कि नीतिगत निर्णय तभी चुनौती योग्य होता है जब वह असंवैधानिक या मनमाना हो.

लेकिन 24 जुलाई को खंडपीठ ने अंतरिम रोक लगाकर यथास्थिति बनाए रखने का आदेश दिया, और आंकड़ों की खामियों पर सवाल उठाए. विलय की सूची में ऐसे स्कूल भी शामिल पाए गए जिनमें 50 से अधिक छात्र थे.

यह एक तकनीकी चूक नहीं है. पूरी नीति की बुनियाद यही आंकड़ा था कि किस स्कूल में 50 से कम बच्चे हैं. अगर सूची में 50 से ज़्यादा छात्रों वाले स्कूल भी आ गए, तो इसका मतलब है कि कहीं गिनती गलत थी, या गिनती के बाद सूची बदली गई, या सूची पहले बनी और आंकड़े बाद में जोड़े गए. तीनों में से कोई भी स्थिति हो, नतीजा एक ही है कि जिस दस्तावेज़ के आधार पर हज़ारों स्कूलों का भविष्य तय हुआ, उस पर खुद अदालत को भरोसा नहीं हुआ.

बाद में राज्य सरकार ने अदालत में स्पष्ट किया कि 50 से कम छात्रों वाले विद्यालयों का न विलय होगा और न पेयरिंग, तथा प्राथमिक विद्यालय बच्चों से एक किलोमीटर से दूर नहीं ले जाए जाएंगे. तब तक कितने स्कूल जोड़े जा चुके थे, इस पर भी आंकड़े आपस में नहीं मिलते. अधिकारियों के अनुसार छह हज़ार से ऊपर, शिक्षक संगठनों के अनुसार इससे कहीं ज़्यादा.

एक ही सरकार, एक ही विभाग, और दो अलग-अलग संख्याएं.

वह चक्र, जो अपने आप चलता रहता है

अब इन सब कड़ियों को एक साथ जोड़कर देखिए, क्योंकि असली समस्या इसी क्रम में छिपी है.

पहले स्कूल में बच्चे कम होते हैं. फिर कम बच्चों के कारण उस स्कूल में शिक्षक की तैनाती नहीं होती या एक ही शिक्षक भेजा जाता है. एक शिक्षक पाँच कक्षाएँ नहीं संभाल सकता, इसलिए पढ़ाई का स्तर गिरता है. स्तर गिरने पर जिन परिवारों की जेब इजाज़त देती है, वे बच्चे को निजी स्कूल भेजने लगते हैं. नामांकन और गिर जाता है. अब वही स्कूल 50 से कम छात्रों वाली सूची में आ जाता है और विलय के योग्य घोषित हो जाता है.

इस पूरे क्रम में कहीं भी जन्म दर की भूमिका नहीं है. हर कड़ी एक प्रशासनिक फ़ैसले की है.

और सबसे गंभीर बात इसके बाद आती है. जिस बच्चे ने बढ़ी हुई दूरी या बढ़े हुए खर्च के कारण पढ़ाई छोड़ दी, वह अगले साल के नामांकन आंकड़े में नहीं दिखता. उसका न होना अगले स्कूल के बंद होने का आधार बन जाता है. यानी नीति जिस समस्या का हवाला देकर लागू होती है, वह समस्या उसी नीति से और बढ़ती जाती है. यह तर्क अपने आप को सही साबित करता चला जाता है, क्योंकि जिसे नुकसान हुआ वह गिनती से ही बाहर हो चुका होता है.

केरल: वह उदाहरण जो साबित करता है कि यह मजबूरी नहीं, चुनाव है

राज्य TFR 2018 TFR 2024 बंद हुए प्राथमिक स्कूल
मध्य प्रदेश 2.7 2.4 27,871
उत्तर प्रदेश 2.9 2.6 25,033
पश्चिम बंगाल 1.5 1.3 4,345
बिहार 3.2 2.9 3,606
कर्नाटक 1.7 1.5 3,558
राजस्थान 2.5 2.3 2,361
केरल 1.7 1.3 795

इस तालिका से तीन बातें निकलती हैं.

पहली, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश ने मिलकर 52,904 स्कूल कम किए, जो देशभर में सिर्फ प्राथमिक स्कूलों की 1.1 लाख गिरावट का आधे से ज़्यादा है. बाकी पाँच राज्यों का कुल जोड़ 14,665 बैठता है. दो राज्यों ने पांच राज्यों से साढ़े तीन गुना ज्यादा स्कूल कम किए, जबकि इन्हीं दोनों की प्रजनन दर आज भी प्रतिस्थापन स्तर से ऊपर है.

दूसरी, केरल में प्रजनन दर 1.7 से गिरकर 1.3 हुई, जो देश की सबसे तेज़ गिरावटों में से एक है. बच्चे वहीं सबसे तेज़ी से घटे. फिर भी वहाँ सिर्फ़ 795 स्कूल कम हुए, जो मध्य प्रदेश के पैंतीसवें हिस्से से भी कम है.

तीसरी, पश्चिम बंगाल की प्रजनन दर 1.3 और बिहार की 2.9 है, दोगुने से ज़्यादा का अंतर. फिर भी बंगाल ने बिहार से ज़्यादा स्कूल खोए.

राजस्थान की प्रजनन दर 2.3 है, फिर भी 2,361 स्कूल कम हुए. हरियाणा में दर 2.2 से गिरकर 1.9 पहुंची, पर स्कूल घटे सिर्फ 355. गुजरात उल्टी दिशा में चला और वहाँ 1,019 स्कूल जुड़ गए.

केरल इस पूरी बहस का सबसे जरूरी सबूत है. वहां बच्चे सबसे तेज़ी से घटे, फिर भी स्कूल बचाए गए. इसका मतलब है कि जनसंख्या घटने पर स्कूल बंद करना अनिवार्य नहीं है. यह एक विकल्प है, जिसे कुछ राज्यों ने चुना और कुछ ने ठुकरा दिया. और जहाँ विकल्प होता है, वहाँ जवाबदेही भी होती है.

दुनिया पहले यह रास्ता चल चुकी है

स्कूलों का विलय न तो नया है और न सिर्फ़ भारत की समस्या. चीन ने यह काम हमसे दो दशक पहले किया. 29 मई 2001 को स्टेट काउंसिल के फैसले के बाद वहाँ स्कूलों का पुनर्वितरण राष्ट्रीय नीति बन गया. ग्रामीण स्कूल 1997 के 5,12,993 से घटकर 2010 में 2,10,894 रह गए, अधूरे प्राथमिक स्कूल 1,86,962 से घटकर 65,447, और छात्र 9.56 करोड़ से घटकर 5.35 करोड़.

इस अनुभव का सबसे ज़रूरी हिस्सा यह है कि चीन में भी स्कूल बंद होने की रफ़्तार बच्चों के घटने की रफ़्तार से तेज़ रही. शोध बताते हैं कि 27 में से 22 प्रांतों में यह अनुपात एक से ऊपर था और एक प्रांत में 13 तक पहुंच गया. यानी वहां भी जनसंख्या का तर्क पूरा सच नहीं था, और भारत में भी नहीं है.

ब्राज़ील में ग्रामीण प्राथमिक स्कूल 2007 के 88,386 से घटकर 2017 में 60,694 रह गए. थाईलैंड ने 120 से कम छात्रों वाले स्कूलों को छह किलोमीटर के दायरे में मिलाने की योजना बनाई. पाकिस्तान के पंजाब में 51,602 प्राथमिक और मिडिल स्कूलों में से करीब 5,500 का विलय हुआ. भारत में भी यह प्रयोग नया नहीं है, क्योंकि शोध साहित्य के अनुसार राजस्थान ने 2014 में ही अपने 80 हज़ार से ज़्यादा सरकारी स्कूलों में से करीब 17,000 का विलय कर दिया था.

राजस्थान का यह उदाहरण सबसे ज़्यादा पूछे जाने लायक है. ग्यारह साल बीत चुके हैं. उन 17,000 स्कूलों के बच्चों का क्या हुआ, कितने नए स्कूल तक पहुंचे, कितने निजी स्कूल में गए और कितने पढ़ाई से बाहर हो गए, इसका कोई सार्वजनिक और स्वतंत्र मूल्यांकन आज तक सामने नहीं आया. जो प्रयोग एक बार बिना नतीजे जांचे हो चुका हो, उसे दोबारा और बड़े पैमाने पर दोहराना नीति नहीं, जल्दबाज़ी है.

चीन का अनुभव पूरा क्या कहता है?

चीन पर हुए अध्ययनों में दो नतीजे साथ-साथ मिलते हैं, और ईमानदारी दोनों को साथ रखने में है.

जिन गांवों का स्कूल बंद हुआ, वे सबसे नज़दीकी प्राथमिक विद्यालय से औसतन 3.8 किलोमीटर दूर हो गए. और उन्हीं बच्चों को जो नए स्कूल मिले, उनकी इमारतें और तकनीकी संसाधन पहले से बेहतर थे.

यही इस पूरी नीति का असली सौदा है. बच्चे को बेहतर स्कूल मिलता है, लेकिन वह दूर हो जाता है. और यह सौदा सबके लिए एक जैसा नहीं होता. जिस परिवार के पास साइकिल, गाड़ी का किराया या बच्चे को छोड़ने जाने का समय है, उसे बेहतर स्कूल का फ़ायदा मिलता है. जिसके पास ये तीनों नहीं हैं, उसके लिए वही फ़ैसला स्कूल के छूट जाने में बदल जाता है.

एनएसएस के आंकड़ों में यह लागत भी दर्ज है. परिवार औसतन 1,842 रुपये सालाना सिर्फ़ परिवहन पर खर्च करते हैं, और कुछ राज्यों में यह दस हज़ार रुपये से ऊपर चला जाता है. दूरी बढ़ाने का फैसला सरकार लेती है, पर उसका बिल परिवार चुकाता है.

नीति आयोग की 2023 की रिपोर्ट में दर्ज है कि उतने ही नामांकन के लिए भारत में चीन से पाँच गुना ज्यादा स्कूल हैं. यह इस नीति के पक्ष में सबसे मज़बूत दलील है और इसे नज़रअंदाज़ करना बेईमानी होगी. आयोग की 2026 की रिपोर्ट ने भी शर्त साफ़ रखी है कि कम नामांकन वाले, एकल-शिक्षक और निष्क्रिय विद्यालयों का पुनर्गठन किया जा सकता है, बशर्ते हर विद्यार्थी के लिए सुरक्षित पहुंच बनी रहे. दिक्कत यह है कि आज तक किसी सरकारी दस्तावेज़ ने यह नहीं बताया कि सुरक्षित पहुंच नापी कैसे जाएगी, और न नापने पर ज़िम्मेदार कौन होगा.

जो आंकड़े सरकार को सार्वजनिक करने चाहिए

इस पूरी बहस को अनुमान से बाहर निकालने के लिए बहुत ज़्यादा कुछ नहीं चाहिए. चार चीजें काफ़ी हैं, और चारों पहले से सरकारी रिकॉर्ड में मौजूद हैं.

पहला, विलय किए गए हर स्कूल के बच्चों की नाम-वार ट्रैकिंग, यह बताने के लिए कि उनमें से कितने नए स्कूल पहुंचे, कितने निजी स्कूल गए और कितने कहीं नहीं पहुँचे.

दूसरा, विलय से पहले और बाद की वास्तविक पैदल दूरी, नक्शे की सीधी रेखा नहीं बल्कि जो रास्ता बच्चा सचमुच चलता है.

तीसरा, विलय वाले ब्लॉकों में सरकारी और निजी स्कूलों के नामांकन में आया बदलाव, ताकि प्रतिस्थापन की मात्रा साफ़ हो सके.

चौथा, राजस्थान में 2014 के विलय का ग्यारह साल बाद का स्वतंत्र मूल्यांकन.

जब तक ये आंकड़े सामने नहीं आते, तब तक यह नीति एक ऐसा दावा है जिसे सिद्ध नहीं किया गया, और जिसकी कीमत उन परिवारों से वसूली जा रही है जिनके पास दूसरा विकल्प है ही नहीं.

निष्कर्ष

आंकड़े जो बता सकते थे, बता चुके हैं. देश में 84,318 स्कूल कम हुए, जिनमें 93 प्रतिशत सरकारी थे. सरकारी स्कूल जनसंख्या से तेज़ रफ़्तार में घटे और निजी स्कूल उसी दौर में बढ़ गए. निजी स्कूल में पढ़ना सरकारी स्कूल से करीब नौ गुना महंगा है. और स्कूली शिक्षा के खर्च का 95 प्रतिशत हिस्सा परिवार खुद उठाता है.

इन चार तथ्यों को साथ रखने पर निष्कर्ष टालना मुश्किल हो जाता है. सरकारी स्कूलों का घटना जनसंख्या का परिणाम नहीं, नीति का परिणाम है. और इस नीति का सीधा असर यह है कि शिक्षा आम आदमी से थोड़ी और दूर, और थोड़ी और महंगी होती जा रही है.

इतना तय है कि स्कूल कम हो गए. यह तय नहीं है कि वे बेहतर हुए, क्योंकि इसे नापने का कोई सार्वजनिक पैमाना अब तक सामने नहीं आया.

इसलिए अंत में कुछ सवाल, जिनका जवाब सरकार, अदालत और पाठक तीनों को ढूंढ़ना चाहिए.

अगर बच्चों की घटती संख्या ही वजह थी, तो उसी घटती संख्या में निजी स्कूल कैसे बढ़ गए?

केरल में बच्चे सबसे तेज़ी से घटे और स्कूल सबसे कम बंद हुए. क्या यह संसाधनों की बर्बादी है, या यही वह प्राथमिकता है जो बाकी राज्यों ने छोड़ दी?

जब सरकार एक स्कूल बंद करके खर्च बचाती है, और उसी बच्चे का परिवार नौ गुना ज़्यादा खर्च करने लगता है, तो वास्तव में बचत हुई किसकी और लागत बढ़ी किसकी?

जिस सूची में 50 से अधिक छात्रों वाले स्कूल भी शामिल पाए गए, उस सूची को बनाने वाले पर आज तक क्या कार्रवाई हुई?

और सबसे बुनियादी सवाल यह कि जब हम बेहतर स्कूल कहते हैं, तो बेहतर किसके लिए? उस बच्चे के लिए जो नए स्कूल तक पहुंच गया, या उसके लिए जो तीन किलोमीटर की दूरी नहीं तय कर पाया? पहला बच्चा हर रिपोर्ट में दिखता है. दूसरे को गिनने की व्यवस्था हमारे पास आज भी नहीं है.

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