Indian Politics History: भारतीय संविधान और संसदीय प्रणाली को अपनी लेखनी से सरल बनाने वाले महान विद्वान डॉ. सुभाष कश्यप का 4 जून को निधन हो गया. 2015 में पद्म भूषण से सम्मानित डॉ. कश्यप लोकसभा के महासचिव रहे और उन्होंने 100 से अधिक किताबें लिखीं. लेकिन उनकी इस महान विद्वता के पीछे राजनीति का एक ऐसा दिलचस्प और अनसुना किस्सा भी छिपा है, जिसने देश का इतिहास बदल दिया.
संविधान विशेषज्ञ डॉ. सुभाष कश्यप का 4 जून को निधन हो गया. वे लोकसभा के पूर्व महासचिव और पद्म भूषण से सम्मानित विद्वान थे. इंदिरा गांधी के निधन के बाद उन्होंने राजीव गांधी को सलाह दी थी कि पीएम बनने के लिए वरिष्ठ होना जरूरी नहीं है. इस सलाह के कारण प्रणब मुखर्जी उनसे नाराज हो गए क्योंकि उन्हें लगा कि कश्यप की वजह से वे पीएम नहीं बन पाए. इसी राजनीतिक टकराव के कारण डॉ. कश्यप का राज्यसभा सांसद बनने का सपना हमेशा के लिए अधूरा रह गया.
संसदीय सेवाएं: 37 वर्षों का अमूल्य योगदान
1953 से संसद से जुड़े डॉ. कश्यप 1984 से 1990 तक लोकसभा के महासचिव (Secretary General) रहे. उन्होंने 7वीं, 8वीं और 9वीं लोकसभा की कार्यवाही को सुचारू रूप से संचालित किया. संसद की प्रक्रियाओं, परंपराओं और संवैधानिक प्रावधानों पर उनकी गहरी पकड़ उन्हें राजनीतिक दलों, सांसदों, अधिकारियों और पत्रकारों का ‘चलता-फिरता विश्वकोश’ बना दिया.
वे इंटर-पार्लियामेंट्री यूनियन (IPU), जेनेवा के इंटरनेशनल सेंटर फॉर पार्लियामेंट्री डॉक्यूमेंटेशन के प्रमुख भी रहे. पंचायती राज संस्थाओं के लिए वे भारत सरकार के मानद संवैधानिक सलाहकार भी थे. बाद में वे सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च (CPR), नई दिल्ली में मानद शोध प्रोफेसर के रूप में कार्यरत रहे.
लेखन और विद्वता
डॉ. कश्यप ने 100 से अधिक पुस्तकें लिखीं. उनकी प्रमुख कृतियां जैसे ‘Our Constitution: An Introduction to India’s Constitution and Constitutional Law’, ‘Constitution of India: A Handbook for Students’, और संसदीय प्रक्रिया पर लिखी गई पुस्तकें आज भी राजनीति विज्ञान, कानून के छात्रों और सिविल सेवा अभ्यर्थियों के लिए अनिवार्य संदर्भ ग्रंथ हैं.
उन्होंने संविधान को सरल, स्पष्ट और व्यावहारिक भाषा में समझाया, जिससे आम नागरिक भी संवैधानिक मूल्यों से जुड़ सके.
2015 में तत्कालीन राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी द्वारा उन्हें पद्म भूषण से सम्मानित किया गया. वे रामनाथ कोविंद समिति में एक साथ चुनाव (One Nation One Election) पर कानूनी ढांचा तैयार करने वाली उच्चस्तरीय समिति के सदस्य भी रहे.
एक विद्वान का व्यक्तिगत पक्ष
संविधान विशेषज्ञ का अधूरा सपना और प्रणब मुखर्जी वाली ‘गांठ’
वरिष्ठ पत्रकार अजय तिवारी ने अपने फेसबुक पोस्ट में स्वर्गीय सुभाष कश्यप के जीवन के एक महत्वपूर्ण और भावुक पहलू को उजागर किया है. लोकसभा के महासचिव के रूप में संसद की कार्यवाही को सुचारू रूप से संचालित करने वाले संविधान के मर्मज्ञ थे. लेकिन उनके मन में एक आजीवन मलाल रहा, राज्यसभा का सांसद बनने का.
पोस्ट के अनुसार, सुभाष कश्यप को लगता था कि वे नेताओं से कहीं ज्यादा सक्षम हैं. संसद के भीतर बैठकर वे राजनीतिक दलों और सांसदों को संवैधानिक सलाह देते रहे, फिर भी उन्हें लगा कि उनका प्रभाव सांसद के रूप में और अधिक विस्तारित होना चाहिए. वे राष्ट्रपति नामित सांसद के रूप में राज्यसभा में जाना चाहते थे.
जब उन्हें लगा कि कांग्रेस उनका समर्थन नहीं करेगी, तो वे भाजपा के करीब आ गए. पोस्ट में स्पष्ट किया गया है कि भाजपा ने उनसे कोई औपचारिक वादा किया था या नहीं, यह जानकारी नहीं है, लेकिन भाजपा की नीतियों के खुलकर समर्थन में लेख लिखने लगे और उन्हें विधि-सम्मत ठहराने लगे.
प्रणब मुखर्जी और वह ऐतिहासिक दिन
पोस्ट में सबसे दिलचस्प हिस्सा 31 अक्टूबर 1984 का है. इंदिरा गांधी के निधन के बाद पश्चिम बंगाल से राजीव गांधी को लाने वाले विमान में कांग्रेस के वरिष्ठ नेता सुभाष कश्यप को भी साथ ले गए थे. सुभाष कश्यप संविधान की प्रति भी साथ लेकर गए थे.
वापसी में राजीव गांधी ने उनसे पूछा ‘क्या प्रधानमंत्री बनने के लिए वरिष्ठ होना जरूरी है? संविधान इसमें क्या कहता है?’
सुभाष कश्यप ने स्पष्ट जवाब दिया कि प्रधानमंत्री बनने के लिए न तो वरिष्ठता जरूरी है और न ही उस समय सांसद होना अनिवार्य है.
बाद में एक इंटरव्यू में बताया कि इस घटना के बाद प्रणब मुखर्जी के मन में यह धारणा बन गई कि ‘कश्यप ने उन्हें प्रधानमंत्री नहीं बनने दिया.’ प्रणब मुखर्जी का मानना था कि अगर सुभाष कश्यप की सलाह न होती तो राजीव गांधी प्रधानमंत्री न बन पाते. सुभाष कश्यप ने कई बार सफाई दी, लेकिन प्रणब मुखर्जी की यह ‘गांठ’ कभी नहीं खुली.
इसी वजह से प्रणब मुखर्जी ने उनके के लिए कांग्रेस पार्टी के अंदर सभी रास्ते बंद कर दिए. पार्टी को उन्होंने विधि सम्मत सलाह देकर काफी फायदा पहुंचाया, लेकिन राज्यसभा की सदस्यता का सपना अधूरा रह गया.
एक विद्वान का मलाल
सुभाष कश्यप भारतीय संसद की प्रक्रियाओं के चलते शब्दकोश थे. उनकी किताबें, व्याख्यान और संसदीय प्रक्रिया पर गहरी पकड़ आज भी प्रासंगिक हैं. लेकिन राजनीतिक महत्वाकांक्षा और व्यक्तिगत संबंधों की जटिलताओं ने उनके करियर को एक अनकही पीड़ा दी.
पोस्ट में यह बात बहुत मार्मिक तरीके से सामने आई है कि बड़े-बड़े विद्वान भी कभी-कभी छोटी-छोटी राजनीतिक ‘गांठों’ का शिकार हो जाते हैं.
डॉ. सुभाष कश्यप भारतीय लोकतंत्र के उस स्तंभ के हिस्से थे जिन्होंने संसद को न केवल संचालित किया बल्कि उसे समझने, संरक्षित करने और मजबूत करने का जीवनभर प्रयास किया. उनकी किताबें, व्याख्यान और अनुभव आने वाली पीढ़ियों को संवैधानिक मूल्यों की याद दिलाते रहेंगे.
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-भारत एक्सप्रेस
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