कुछ कृतियां केवल पढ़ी नहीं जातीं, वे अंतःकरण में उतर जाती हैं. देवव्रत- कालजयी योद्धा की वीरगाथा ऐसी ही एक अनुपम रचना है, जो महाभारत के विराट पट पर अंकित भीष्म पितामह के जीवन को नवचेतना के साथ प्रस्तुत करती है. यह ग्रंथ केवल इतिहास नहीं, अपितु चरित्र-निर्माण की अमर गाथा है.
गंगा पुत्र देवव्रत से भीष्म बनने की कथा
लेखक ने देवव्रत को किसी दैवी प्रतिमा की भांति नहीं, बल्कि संवेदनशील मनुष्य के रूप में उकेरा है. गंगा पुत्र देवव्रत से भीष्म बनने की यात्रा त्याग, तप और अदम्य संकल्प की कथा है. आजीवन ब्रह्मचर्य का व्रत लेते समय उनकी अंतरात्मा में उठता तूफान शब्दों के पार अनुभूत होता है. वहां मौन भी अर्थवान बन जाता है.
भाषा इस पुस्तक का सौंदर्याभूषण है. संस्कृतनिष्ठ, पर सहज प्रवाहयुक्त. प्रत्येक वाक्य में महाकाव्यात्मक गरिमा झलकती है. संवाद इतने प्रभावी हैं कि पात्र जीवंत होकर सामने आ खड़े होते हैं. शंतनु, गंगा, सत्यवती और कुरुवंश के अन्य चरित्र अपने-अपने आयामों में उभरते हैं, किंतु केंद्र में सदैव देवव्रत की तेजस्वी छाया बनी रहती है.
करुणा और वीरता का अद्भुत संगम
यह कृति केवल युद्ध-वर्णन तक सीमित नहीं, बल्कि युद्ध से पूर्व की मानसिक पीड़ा, राजधर्म और व्यक्तिगत भावनाओं के द्वंद्व को मार्मिकता से उद्घाटित करती है. शरशय्या पर लेटे भीष्म का दृश्य करुणा और वीरता का अद्भुत संगम बन जाता है.
आज के भौतिक युग में यह पुस्तक हमें मूल्यों की स्मृति कराती है. यह प्रश्न उठाती है कि क्या हम अपने वचनों पर अडिग रह सकते हैं? क्या त्याग आज भी जीवित है?
वीरता को चरित्र में खोजने का देती संदेश
देवव्रत- कालजयी योद्धा की वीरगाथा वीरता को शास्त्रों में नहीं, चरित्र में खोजने का संदेश देती है. यह ग्रंथ पाठक को नमन और चिंतन दोनों के लिए विवश करता है. एक ऐसी कृति, जो पीढ़ियों तक प्रेरणा का स्रोत बनी रहेगी.
देवव्रत- कालजयी योद्धा की वीरगाथा
लेखक- प्रभात सिन्हा
प्रकाशक- फ्लाईड्रीम्स पब्लिकेशंस
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-भारत एक्सप्रेस
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