वरिष्ठ पत्रकार संतोष सिंह की पुस्तक ‘जेपी से बीजेपी (JP to BJP)’ बिहार की राजनीति की एक व्यापक और जीवंत कैनवास है, जो समाजवाद के हरे रंग से भगवा की उभार तक की यात्रा को बखूबी उकेरती है. बिहार जैसे राज्य की राजनीति, जहां जाति, सामाजिक न्याय और सत्ता की कुर्सी हर मोड़ पर आपस में उलझी रहती है, को समझने के लिए यह पुस्तक एक अनिवार्य दस्तावेज साबित होती है. संतोष सिंह, पटना में ‘द इंडियन एक्सप्रेस’ के साथ जुड़े हुए हैं, अपनी पत्रकारिता की नजर से इस किताब में न केवल ऐतिहासिक घटनाओं को बांधते हैं, बल्कि उन अनकहे चेहरों और किस्सों को भी सामने लाते हैं जो बिहार के राजनीतिक परिदृश्य को आकार देते रहे. वाणी प्रकाशन द्वारा हाल ही में लॉन्च किया गया.
समाजवाद से भगवा तक का सफर
पुस्तक बिहार की राजनीति को 1930 के दशक से शुरू करते हुए आज के दौर तक ले जाती है. केंद्र में हैं समाजवादी आंदोलन के नायक जयप्रकाश नारायण (जेपी), राम मनोहर लोहिया, करपूरी ठाकुर, राम विलास पासवान, लालू प्रसाद यादव और नीतीश कुमार हैं. यह ‘जेपी आंदोलन’ के उत्पादों लालू, नीतीश और पासवान की कहानी है, जो कांग्रेस के वर्चस्व को तोड़ने से लेकर भाजपा के उदय तक फैली हुई है.
समाजवाद का उदय और पतन
किताब कर्पूरी ठाकुर के ‘जननायक’ युग पर खास रोशनी डालती है, जहां पिछड़ी जातियों के लिए 33% आरक्षण, महिलाओं और अत्यंत पिछड़ों के लिए पंचायतों में कोटा, लड़कियों के लिए साइकिल योजना जैसी नीतियां बिहार की राजनीति को नया मोड़ देती हैं. ठाकुर का अंग्रेजी को कक्षा 10वीं में अनिवार्य विषय हटाने का फैसला या नदी टैक्स समाप्त करने जैसे कदमों को लेखक ने जीवंत ढंग से चित्रित किया है.
लालू-नीतीश युग की उथल-पुथल
इसमें लालू की ‘मंडलीकरण’ और ‘यादवीकरण’ वाली सत्ता, चारा घोटाला, जातीय संघर्ष और ‘जंगल राज’ का दौर विस्तार से वर्णित है. वहीं, नीतीश का ‘सड़क, बिजली और ऊर्जा’ वाला शासन, महागठबंधन का टूटना और एनडीए में वापसी के ‘सोमरसॉल्ट’ को लेखक ने तथ्यों और व्यक्तिगत मुलाकातों के आधार पर बयान किया है. राम विलास पासवान की ‘कम्फर्ट जोन’ वाली राजनीति, गोधरा कांड पर इस्तीफा से लेकर तीन बार मुख्यमंत्री बनने से चूकने का भी एक रोचक अध्याय है.
भाजपा का भगवा उभार
पुस्तक का शीर्षक ही इसकी थीम को रेखांकित करता है कि कैसे भाजपा ‘अस्पृश्य पार्टी’ से बिहार की सत्ता में वरिष्ठ साझेदार बनी? जेपी आंदोलन में भाजपा के पूर्ववर्ती भारतीय जनसंघ की भूमिका, भगलपुर दंगे के बाद कांग्रेस का पतन, और आरएसएस-बीजेपी का पिछड़ों के प्रति असमंजस को लेखक ने बिना पक्षपात के उजागर किया है. अंतिम अध्याय ‘द चर्न: बिहार आफ्टर लालू एंड नीतीश’ में तेजस्वी यादव, चिराग पासवान, कन्हैया कुमार और प्रशांत किशोर जैसे नए चेहरों पर नजर डालता है. इनकी भविष्यवाणी करते हुए कहा गया है कि क्या समाजवाद का हरा रंग पूरी तरह फीका पड़ जाएगा?
किताब में जातीय गठजोड़ (‘एम-वाई एक्सिस’, ‘ट्रिवेणी संघ’), माओवादी समस्या, और कल्याणकारी योजनाओं (जैसे लड़कियों को साइकिल) का विश्लेषण भी गहरा है, जो बिहार को राष्ट्रीय राजनीति का आईना बनाता है.
रिसर्च की गहराई और अनकही कहानियां
संतोष सिंह की सबसे बड़ी ताकत उनकी जमीन से जुड़ी पत्रकारिता है. किताब में साक्षात्कार, पुरानी फाइलें और व्यक्तिगत अनुभवों का मिश्रण इतिहास को जीवंत बना देता है. यह बिहार राजनीति की ‘मिनी एनसाइक्लोपीडिया’ है, जो भूले-बिसरे नायकों जैसे रामानंद तिवारी या कपिलदेव सिंह को श्रद्धांजलि देती है. भविष्य के परिदृश्यों के लिए एक ‘कम्पास’ है.
समग्र मूल्यांकन: बिहार की राजनीति समझने के लिए अनिवार्य
‘जेपी से बीजेपी’ एक संतोषजनक और प्रेरणादायक किताब है, जो बिहार को आधुनिक भारत का आईना दिखाती है. यह न केवल इतिहासकारों या राजनीतिक विश्लेषकों के लिए, बल्कि आम नागरिकों के लिए भी उपयोगी है, जो समझना चाहते हैं कि कैसे एक राज्य राष्ट्रीय सत्ता के खेल को प्रभावित करता है. यदि आप बिहार की सियासत के शौकीन हैं, तो यह किताब आपकी शेल्फ पर होनी चाहिए.
बता दें कि इस किताब को वाणी प्रकाशन ने प्रकाशित किया है.
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-भारत एक्सप्रेस
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