This Life at Play: जीवन कितना विचित्र और अप्रत्याशित होता है. कभी-कभी वही इंसान, जिसे दुनिया में आने का अधिकार ही छीन लिया जाना चाहा था, बाद में अपनी पीढ़ी का प्रतीक, अपनी भाषा और संस्कृति का ध्वजवाहक बन जाता है. कन्नड़ साहित्य, नाट्य और सिनेमा के दिग्गज गिरीश कर्नाड की आत्मकथा ठीक यही कहानी कहती है.
कर्नाड की मां कृष्णाबाई और पिता रघुनाथ कर्नाड के घर में पहले से तीन बच्चे थे. आर्थिक और पारिवारिक जिम्मेदारियों के बोझ तले दबे माता-पिता ने चौथे बच्चे को जन्म देने का फैसला नहीं किया. गर्भावस्था के शुरुआती महीनों में वे पुणे के एक अस्पताल पहुंचे, जहां गर्भपात करवाने का इरादा था. लेकिन नियति ने कुछ और ही लिखा था. उस दिन डॉक्टर उपलब्ध नहीं थीं. माता-पिता इंतजार करते रहे और अंततः घर लौट आए. बाद में उन्होंने गर्भपात की योजना छोड़ दी.
निरर्थकता के एहसास ने बनाया रचनात्मक
अपनी आत्मकथा This Life at Play (खेल-खेल में बीता जीवन) में कर्नाड इस घटना का जिक्र बड़े खुलपन और संवेदनशीलता के साथ करते हैं. एक बार जब वे अपने माता-पिता के साथ भोजन कर रहे थे, मां ने सहजता से यह बात बता दी. कर्नाड लिखते हैं कि इस खुलासे ने उन्हें जीवन की निरर्थकता और absurdity का एहसास कराया. लेकिन उसी क्षण उन्होंने इसे अपनी रचनात्मकता का हिस्सा बना लिया.
केवल लेखक नहीं बल्कि बहुत कुछ
गिरीश कर्नाड मात्र कन्नड़ भाषा के लेखक नहीं थे. वे आधुनिक भारतीय नाट्य के नवीनीकरण के प्रतीक बने. तुगलक, हयवदन, नागमंडल, तलेदंड जैसी रचनाओं के माध्यम से उन्होंने मिथकों, इतिहास और समकालीन सामाजिक-राजनीतिक मुद्दों को इतनी गहराई से जोड़ा कि उनकी रचनाएं विश्व स्तर पर चर्चित हुईं.
वे केवल लेखक ही नहीं, बल्कि अभिनेता, फिल्म निर्देशक, प्रशासक और सांस्कृतिक चिंतक भी थे. ज्ञानपीठ पुरस्कार, पद्मभूषण और पद्मश्री जैसे सम्मानों से नवाजे गए कर्नाड ने कन्नड़ साहित्य को राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय पटल पर स्थापित किया. उनकी रचनाएं परंपरा और आधुनिकता के बीच संवाद स्थापित करती हैं.
किताब क्यों महत्वपूर्ण है?
खेल-खेल में बीता जीवन ( This Life at Play) उनकी आत्मकथा का पहला भाग है, जो उनके बचपन, सिरसी और धारवाड़ के दिनों, शिक्षा, ऑक्सफोर्ड के अनुभवों और रंगमंच की दुनिया में प्रवेश तक की यात्रा बयान करता है. यह किताब सिर्फ व्यक्तिगत संस्मरण नहीं, बल्कि 20वीं सदी के मध्य भारत की सांस्कृतिक, सामाजिक और पारिवारिक बदलती तस्वीर भी है.
कर्नाड इसमें अपनी मां कृष्णाबाई की कहानी से शुरुआत करते हैं- एक विधवा जो पुनर्विवाह के बाद भी सामाजिक चुनौतियों का सामना करती रही. पुस्तक में परिवार, पहचान, रचनात्मकता और ‘अस्तित्व’ के सवाल बड़े ईमानदारी से उठाए गए हैं.
यह किताब इसलिए सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज बन गई क्योंकि इसमें कर्नाड ने वह सब कुछ खोलकर रख दिया जो आमतौर पर आत्मकथाओं में छिपा रहता है. असफलताएं, संदेह, पारिवारिक रहस्य और वह ‘अनचाहापन’ जो अंततः उन्हें अपनी जड़ों से जोड़ता है.
गिरीश कर्नाड 2019 में चले गए, लेकिन उनकी रचनाएं और यह आत्मकथा आज भी हमें याद दिलाती हैं कि जीवन का खेल कितना अनिश्चित और अर्थपूर्ण हो सकता है. वह बच्चा, जिसे डॉक्टर के आने का इंतजार नहीं हुआ, खुद इतिहास का हिस्सा बन गया.
जो माता-पिता उसे पैदा नहीं करना चाहते थे, वही बाद में उसके सबसे बड़े गौरव का कारण बन गए.
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-भारत एक्सप्रेस
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