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GNH vs GDP India cow based economy model: वर्तमान दौर में जहाँ दुनिया ‘सकल घरेलू उत्पाद’ (GDP) के आंकड़ों में उलझी है, वहीं धरातल पर आम आदमी असुरक्षित और अस्वस्थ महसूस कर रहा है. ‘एक्स’ (ट्विटर) जैसे मंचों पर सक्रिय जागरूक समाज देख रहा है कि कैसे अंतरराष्ट्रीय राजनीति और विशेष रूप से अमेरिका केंद्रित बाजारू शक्तियां हमारी रसोई से लेकर हमारी रगों में दौड़ने वाली वैक्सीन तक पर कब्जा कर चुकी हैं.
शस्त्र उद्योग से लेकर ‘एपस्टीन फाइल्स’ जैसे खुलासे यह साबित करते हैं कि मुनाफे की अंधी दौड़ में मानवीय मूल्यों और प्रजा के हितों की बलि दी जा रही है. ऐसे में भूटान का ‘हैप्पीनेस इंडेक्स’ (सकल घरेलू उल्लास) और भारत की प्राचीन ‘गौ-संस्कृति’ ही वह मशाल है, जो अंधकारमय भविष्य को रोशनी दिखा सकती है. संकट केवल आर्थिक नहीं है, बल्कि उस ‘जहर’ का है जो नकली दूध, घी और प्रदूषित हवा के जरिए हमारे बच्चों के शरीर में घोला जा रहा है.
मथुरा मॉडल: कोरी कल्पना नहीं, हकीकत है आत्मनिर्भरता
इस विभीषिका से बचने का सबसे प्रभावी रास्ता देश के 5.5 लाख गांवों को सशक्त बनाना है. 20 साल पहले मथुरा में किया गया प्रयोग इसका जीवंत प्रमाण है. देश के कुल भौगोलिक क्षेत्र का लगभग 3-4 प्रतिशत हिस्सा यानी 10.21 मिलियन हेक्टेयर भूमि चरागाहों के लिए उपलब्ध है. यदि वोटों की राजनीति से ऊपर उठकर इन चरागाहों को गांव के भूमिहीन परिवारों की समितियों को सौंप दिया जाए, तो एक बड़ा क्रांतिकारी बदलाव आ सकता है.
मनरेगा जैसी योजनाओं को चरागाहों में चारा उगाने से जोड़कर और दानदाताओं के सहयोग से भूमिहीन परिवारों को देशी गाय उपलब्ध कराकर, न केवल दुग्ध क्रांति लाई जा सकती है, बल्कि नकली दूध और जहर के कारोबार पर भी लगाम कसी जा सकती है. यह मॉडल ग्रामीण युवाओं को गांव में ही सम्मानजनक रोजगार देगा और शहरों की ओर होने वाले नारकीय पलायन को रोकेगा.
सनातन संस्कृति और आधुनिक विज्ञान का समन्वय
सनातन धर्म में गाय को केवल पशु नहीं, बल्कि 33 करोड़ देवताओं का वास और ‘माँ’ माना गया है. आज का आधुनिक विज्ञान भी देशी गाय के दूध, गोबर और मूत्र के औषधीय गुणों को प्रमाणित कर चुका है. खाड़ी देशों के युद्ध और बढ़ते ऊर्जा संकट के बीच, गोबर के कंडों और लकड़ी जैसी पारंपरिक ऊर्जा की ओर लौटना केवल मजबूरी नहीं बल्कि एक सुरक्षित विकल्प हो सकता है.
यदि पिछले 79 वर्षों में हमारी सरकारों ने विकास के इस ‘विलेज-सेंट्रिक’ मॉडल को अपनाया होता, तो आज शहरीकरण की भयावह चुनौतियां हमारे सामने न होतीं. आज भी आईआईटी और आईआईएम जैसे प्रतिष्ठित संस्थानों से निकले युवा अपनी मोटी नौकरियां छोड़कर मध्य भारत के गांवों में इसी मॉडल पर काम कर रहे हैं और बंजर जमीनों को गोबर की खाद से लहलहाते बगीचों में बदल रहे हैं.
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एक ईमानदार और उदार सोच की आवश्यकता
समस्या यह नहीं है कि संसाधन कम हैं, बल्कि समस्या यह है कि संसाधनों पर मुट्ठी भर लोगों का कब्जा है. जब तक हम विकास को केवल आंकड़ों की नजर से देखेंगे, खुशहाली हमसे दूर रहेगी. मथुरा का प्रयोग और शिक्षित युवाओं का गांवों की ओर लौटना यह सिद्ध करता है कि असंभव कुछ भी नहीं है.
आवश्यकता है तो बस एक ऐसी ईमानदार नीति की, जो ‘गौ-रक्षा’ को केवल भावनात्मक मुद्दा न मानकर उसे अर्थव्यवस्था की धुरी बनाए. यदि गांव की लक्ष्मी गांव में रहेगी और गांव का बच्चा शुद्ध दूध पीकर स्वस्थ बनेगा, तभी भारत वास्तव में एक ‘सुखी और सुसंस्कृत’ राष्ट्र कहलाने का हकदार होगा. बाजारू शक्तियों के इस चक्रव्यूह को तोड़ने के लिए हमें अपनी जड़ों की ओर लौटना ही होगा.
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-भारत एक्सप्रेस
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