India US Trade Deal tariff cut impact: केंद्रीय बजट 2026-27 पेश होने के बाद बाजार में आई गिरावट अभी ठीक भी नहीं हुई थी कि भारत-अमेरिका के बीच हुए व्यापार समझौते ने वैश्विक व्यापार जगत को हिला दिया है. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर घोषणा की कि भारत से आयातित वस्तुओं पर अमेरिकी टैरिफ 50% से घटाकर 18% कर दिया गया है. वहीं भारत ने अमेरिकी उत्पादों पर टैरिफ को शून्य करने और रूसी तेल खरीद कम करने का वादा किया है. यह समझौता जुलाई 2025 से चले टैरिफ युद्ध का परिणाम है, जब अमेरिका ने रूस से तेल खरीद को लेकर भारत पर 25% दंडात्मक टैरिफ लगाया था। अब कुल प्रभावी टैरिफ 18% रह गया है, जो वियतनाम (20%) और चीन (34%) से बेहतर है.
समझौते की मुख्य शर्तें और प्रभाव
उल्लेखनीय है कि यह समझौता भारत के निर्यात को बढ़ावा अवश्य दे सकता है. खासकर वस्त्र, फार्मास्यूटिकल्स और इंजीनियरिंग उत्पादों में. अर्थशास्त्रियों के अनुसार, अमेरिकी बाजार में प्रवेश से भारत की जीडीपी में 0.6% वृद्धि से 7.4% तक पहुंच सकती है. सीईए वी. अनंता नागेश्वरन के अनुसार यह समझौता निवेशकों का भरोसा बढ़ाएगा और रुपये को स्थिर भी कर सकेगा. हालांकि, अमेरिकी आयात बढ़ने से व्यापार अधिशेष कम हो सकता है और ऊर्जा आयात बिल बढ़ सकता है क्योंकि रूसी तेल सस्ता था. कुल मिलाकर, लघु अवधि में सकारात्मक लेकिन दीर्घकालिक असंतुलन का खतरा हो सकता है.
फ़िलहाल सरकार ने इस समझौते को लेकर किसी भी तरह की औपचारिक प्रेस विज्ञप्ति जारी नहीं की, जिससे सवाल उठे रहे हैं. राष्ट्रपति ट्रंप ने सोशल मीडिया पर घोषणा की, जबकि पीएम मोदी ने केवल धन्यवाद दिया. विपक्ष का आरोप है कि संवेदनशील रियायतें, जैसे कि कृषि बाजार खोलना, छिपाई जा रही हैं ताकि किसान आंदोलन न भड़के. यह पारदर्शिता की कमी राष्ट्रीय हितों पर सवाल खड़े करती है, क्योंकि व्यापार संधियों में आमतौर पर पूर्ण खुलासा किया जाता है. जानकारों के अनुसार, यह रणनीतिक गोपनीयता लगती है लेकिन वहीं ये लोकतांत्रिक जवाबदेही को कमजोर करती है.
अर्थशास्त्रियों में मतभेद
वहीं इस समझौते को लेकर अर्थशास्त्री विभाजित हैं. ब्लूमबर्ग के अनुसार, निर्यात 64% बढ़ सकता है, लेकिन अगर समझौता विफल होता है तो जीडीपी पर 0.7% नुकसान संभव है. आशावादी अर्थशास्त्रियों का मानना है कि जीडीपी 7.4% तक बढ़ सकती है. लेकिन वजाहत हबीब जैसे विशेषज्ञ असमानता पर सवाल उठाते हैं: 0 बनाम 18% टैरिफ, किस दृष्टि से सही है? एक रिपोर्ट में दावा किया जा रहा है कि डेयरी को 1.03 लाख करोड़ का नुकसान हो सकता है. कुल मिलाकर देखा जाए तो विनिर्माण को फायदा लेकिन कृषि को खतरा संभव है इसलिए संतुलित सुधार जरूरी हैं.
कृषि क्षेत्र में सबसे बड़ा खतरा
गौरतलब है कि भारत जैसे देश में कृषि क्षेत्र सबसे संवेदनशील है. समझौते के मुताबिक अमेरिका बादाम, सोयाबीन तेल, कपास और डेयरी निर्यात बढ़ाएगा. डेयरी में, वर्तमान 60% टैरिफ कम होने से कीमतें 15% गिर सकती हैं, जिससे किसानों को 1.03 लाख करोड़ का वार्षिक नुकसान हो सकता है. आयात 25 मिलियन टन बढ़ सकता है, 1-2 गाय वाले छोटे किसानों को मुश्किलों का सामना करना पड़ सकता है. अमूल जैसे कोऑपरेटिव भी प्रभावित होंगे। पूर्व व्यापार विशेषज्ञों का कहना है कि इससे किसान का विरोध भड़क सकता है. वहीं सकारात्मक पक्ष इस बात का दावा भी कर रहे हैं कि प्रोसेस्ड एग्री निर्यात बढ़ सकता है, लेकिन इस क्षेत्र में संरक्षण जरूरी है. यह आम नागरिकों की आजीविका को जोखिम में डालता सकता है, जहां 80% कृषि छोटे किसानों पर निर्भर.
राजनीतिक और भू-रणनीतिक नजरिया
कांग्रेस नेता राहुल गांधी ने इसे ‘सरेंडर 2.0’ कहा और आरोप लगाया कि मोदी सरकार दबाव में झुकी और किसानों के हित बेचे. उन्होंने संसद में चर्चा रोकने का आरोप लगाया, जबकि वाणिज्य मंत्री पीयूष गोयल ने विपक्ष पर हंगामा करने का इल्जाम लगाया. विपक्ष का मुख्य मुद्दा असमानता है: अमेरिका 18% टैरिफ रखे, भारत शून्य दे: यह साफ़ तौर पर ‘ट्रंप-निरभरता’ है. राजनीतिक रूप से देखा जाए तो यह मौजूदा बजट सत्र में सरकार को घेरने का हथियार है, लेकिन मूल चिंता कृषि और ऊर्जा सुरक्षा की है.
जानकार मानते हैं कि इस समझौते के कुछ संकेत स्पष्ट है. 2025 में 50% टैरिफ से भारत के निर्यात में गिरावट आई. अगस्त में 6.86 अरब डॉलर से अक्टूबर में 6.30 अरब. ट्रंप की ‘आर्थिक ब्लैकमेल’ नीति ने रूसी तेल खरीद को निशाना बनाया. प्रधानमंत्री मोदी ने ‘भारी कीमत चुकाने को तैयार’ कहा था. सेवानिवृत अफसरों ने सलाह दी कि बुरा समझौता न करें. यह दबाव रणनीतिक था, चीन के विकल्प के रूप में भारत को मजबूत करना तो ठीक था, लेकिन भारत की रणनीतिक स्वायत्तता पर सवाल भी उठने लगे. अगर शर्तें एकतरफा हों तो समझौता न करना ही बेहतर था.
भू-रणनीतिक की दृष्टि से यह समझौता जरूरी था, क्योंकि चीन के मुकाबले भारत को मजबूत करना, एक अच्छी रणनीति अवश्य है लेकिन यह आर्थिक रूप से असंतुलित है. एक ओर टेक्सटाइल और फार्मा आदि क्षेत्रों में निर्यात अवश्य बढ़ेगा, लेकिन ‘बाय अमेरिकन’ की नीति से घरेलू उद्योग अवश्य दब सकते हैं. कृषि में अमेरिकी सब्सिडी उत्पाद सस्ते आयात से ग्रामीण संकट बढ़ा सकते हैं. ऐसे में पारदर्शिता की कमी जनता के बीच विश्वास घटाती है. आत्मनिर्भर भारत के लिए यह अवसर अवश्य हो सकता है लेकिन ध्यान रहे कि देश की आर्थिक नीति की सुरक्षा के लिए सावधानी अवश्य बरतनी होगी, कोई भी देश सर्वोच्च नहीं है.
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-भारत एक्सप्रेस
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