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कैसे सुधरे भारतीय पुलिस स्टेशनों की दयनीय स्थिति?

देश के अधिकांश पुलिस स्टेशन अभी भी पुरानी इमारतों में हैं, जहां बुनियादी सुविधाएं जैसे वाहन, फोन, शौचालय और डिजिटल सिस्टम तक की भारी कमी है. 2025 के आंकड़ों के अनुसार 58 स्टेशनों में वाहन नहीं, 680 में लैंडलाइन फोन नहीं और कई में मालखाना गंदा व असुरक्षित है, जिससे जांच में देरी और सबूत खराब हो रहे हैं…

Police Station Condition India: अक्सर हम फ़िल्मों और वेब सीरीज में यह देखते हैं कि किस तरह भारत की पुलिस को बुनियादी सुविधाओं और लाचार पुरानी व्यवस्थाओं के चलते अक्सर कोर्ट और मीडिया का शिकार बनना पड़ता है. जबकि वास्तविक स्थिति सभी को पता है कि पुलिस वाले भी आख़िर इंसान ही होते हैं. यदि पुलिस से उम्मीद की जाए कि वह क़ानून व्यवस्था बनाए रखे तो क्या पुलिस व पुलिस थानों में बुनियादी जरूरतों का ध्यान रखना सरकार की प्राथमिकता नहीं होनी चाहिए? इस बात को नजरंदाज नहीं किया जा सकता कि फ़िल्में व टीवी शो समाज का आईना होते हैं. इनमें दिखाए जाने वाली पुलिस की लाचारी वास्तविकता पर ही आधारित होती है.

यही नहीं आज भी जब सरकार ‘डिजिटल इंडिया’ और ‘मॉडर्न पोलिसिंग’ का नारा लगाती है, तब भी देश के अधिकांश पुलिस स्टेशन उसी औपनिवेशिक युग की इमारतों में कैद हैं. बुनियादी सुविधाओं की कमी, जर्जर इंफ्रास्ट्रक्चर और पुरानी व्यवस्था न केवल पुलिस कर्मियों के काम को बाधित कर रही है, बल्कि आम जनता के लिए भी ये स्टेशन आतंक का प्रतीक बने हुए हैं.

आंकड़ों में क्या है हाल?

2025 के इंडिया जस्टिस रिपोर्ट के अनुसार, 83 प्रतिशत पुलिस स्टेशनों में कम से कम एक सीसीटीवी कैमरा जरूर लगा है, लेकिन ऐसे कई मामले हैं जिनमें सुप्रीम कोर्ट के मानकों का पालन असंगत है. 78 प्रतिशत स्टेशनों में महिला हेल्पडेस्क बनी हैं, फिर भी महिला पुलिसकर्मियों का राष्ट्रीय औसत मात्र 12 प्रतिशत है. ग्रामीण क्षेत्रों में स्टेशनों की संख्या 2017-22 के बीच 7 प्रतिशत घट गई है, जबकि शहरी क्षेत्रों में 4 प्रतिशत बढ़ी.

वहीं जनवरी 2023 के केंद्रीय गृह मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक, देश में 17,849 पुलिस स्टेशन हैं, जिनमें से 58 में वाहन नहीं, 680 में लैंडलाइन फोन नहीं और 282 में मोबाइल फोन तक नहीं हैं. कई स्टेशनों में बिजली, इंटरनेट और डिजिटल साक्षरता की भारी कमी है. बीपीआरडी (ब्यूरो ऑफ पुलिस रिसर्च एंड डेवलपमेंट) ने आधुनिक पुलिस स्टेशन भवनों के लिए मानक तय किए हैं, जिनमें आगंतुकों के लिए प्रतीक्षा कक्ष, शौचालय, जांच कक्ष और रिकॉर्ड रूम शामिल हैं, लेकिन ज्यादातर राज्यों में इनका पालन नाममात्र का है. असिस्टेंस टू स्टेट्स फॉर मॉडर्नाइजेशन ऑफ पुलिस (एएसयूएमपी) योजना के तहत केंद्र ने 2025-26 में 540 करोड़ रुपये आवंटित किए, लेकिन इसमें भी उपयोगिता कम पाई गई.

पुलिस के कार्यों को किस कदर कर रहा बाधित?

सवाल उठता है कि यह जर्जर इंफ्रास्ट्रक्चर पुलिस कार्य को किस तरह बाधित कर रहा है? स्टेशन हाउस ऑफिसर (एसएचओ) को 24 घंटे ड्यूटी पर रहना पड़ता है, लेकिन ज़्यादातर थानों में न तो आराम कक्ष ठीक हैं, न बैरक स्वच्छ. मैनुअल पेपरवर्क, पुराने रिकॉर्ड और भीड़भाड़ के कारण जांच में देरी होती है. जनता शिकायत दर्ज कराने आती है तो प्रतीक्षा कक्ष न होने से खुले में खड़ी रहती है. महिला आगंतुकों के लिए अलग शौचालय की कमी आम है. परिणामस्वरूप, पुलिस पर भरोसा घटता है और अपराधी लाभ उठाते हैं.

इसी तरह, जब्त वाहनों की समस्या पर्यावरणीय आपदा बन चुकी है. देश भर के पुलिस स्टेशनों में हजारों जब्त कारें, बाइकें व अन्य छोटे बड़े वाहन सड़ रहे हैं. जो कि थानों से सटी सड़कों पर खड़े रहते हैं और यातायात बाधित करते हैं. ईंधन रिसाव, जंग, बरसाती पानी से मच्छर पनपते हैं, डेंगू-मलेरिया का खतरा बढ़ता है. आग लगने का जोखिम तो हमेशा बना ही रहता है. पंजाब सरकार ने हाल ही में आदेश दिया कि सभी जब्त वाहन शहर से बाहर स्क्रैप यार्ड में शिफ्ट किए जाएं, लेकिन अन्य राज्यों में ऐसा नहीं हुआ.

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क्या हो सकता है उपाय?

ऐसे में सुधार कैसे हो? सबसे पहले, बीपीआरडी के मॉडल पुलिस स्टेशन मानकों को सख्ती से लागू किया जाए. हर स्टेशन में डिजिटल रिकॉर्ड रूम (ई-मालखाना), सीसीटीवी नाइट विजन, पर्याप्त शौचालय, प्रतीक्षा कक्ष और महिला हेल्पडेस्क अनिवार्य हों. नियम उल्लंघन के बाद जब्त वाहनों के लिए अलग-अलग डिस्पोजल यार्ड और ऑनलाइन नीलामी की व्यवस्था हो, ताकि 30 दिनों में उन्हें हटाया जा सके. उसी तरह अपराध में शामिल वाहनों की विस्तृत फॉरेंसिक जांच के बाद, कोर्ट के आदेश पर उन्हें भी थानों से हटाया जाए. पुलिस कर्मियों के लिए बेहतर बैरक, कैंटीन और प्रशिक्षण सुविधाएं जरूरी हों. जनता के लिए थाने ‘यूजर फ्रेंडली’ बनाने के लिए शिकायत पोर्टल, हेल्पडेस्क और कम्युनिटी पोलिसिंग को बढ़ावा दें.

साथ ही आज जरूरत है मजबूत राजनीतिक इच्छाशक्ति की. केंद्र सरकार एएसयूएमपी फंड का पूरा उपयोग सुनिश्चित करे, अनुपालन न करने वाले राज्यों पर करवाई करे और सुप्रीम कोर्ट इसकी नियमित समीक्षा करे. पुलिस स्टेशन अगर आधुनिक और जन-अनुकूल नहीं बने, तो ‘विकसित भारत’ का सपना अधूरा रहेगा. समय की माँग है कि हम पुलिस को सेवा प्रदाता मानें, न कि सिर्फ अपराध नियंत्रक. बुनियादी सुविधाओं से शुरू कर सुधार की दिशा में कदम उठाएं, ताकि पुलिसकर्मी और जनता दोनों को न्याय मिले.

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-भारत एक्सप्रेस



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