Supreme Court of India Arrest Guidelines: भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने हाल ही में एक महत्वपूर्ण फैसले में पुलिस की मनमानी गिरफ्तारियों पर सख्त अंकुश लगाया है. यह फैसला उन अपराधों से संबंधित है जहां सजा की अधिकतम अवधि सात साल तक की कैद है. सतेंद्र कुमार एंटिल बनाम सीबीआई मामले में न्यायमूर्ति एम.एम. सुंदरेश और एन. कोटिस्वर सिंह की पीठ ने स्पष्ट किया कि ऐसे मामलों में गिरफ्तारी अपवाद है.
जबकि नोटिस जारी करना नियम. यह निर्णय न केवल पुलिस की कार्यप्रणाली में सुधार लाएगा, बल्कि आम नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा करेगा. फैसले के बाद इस मामले की पृष्ठभूमि, कानूनी प्रावधानों, गिरफ्तारी की आवश्यकता और आम नागरिकों पर इसके प्रभाव पर चर्चा होने लगी है. जिससे कि नागरिकों को उनके अधिकारों के प्रति जागरूक किया जा रहा है.
क्यों ऐतिहासिक है ये फैसला?
भारत में आपराधिक न्याय प्रणाली में गिरफ्तारी एक संवेदनशील मुद्दा रहा है. पुराने दंड प्रक्रिया संहिता (CRPC) के तहत पुलिस को बिना वारंट गिरफ्तारी का अधिकार था, लेकिन इसका अक्सर दुरुपयोग होता था. विशेष रूप से कम गंभीर अपराधों में, जहां सजा सात साल से कम थी, पुलिस बिना सोचे-समझे लोगों को हिरासत में ले लेती थी. इससे न केवल जेलों में भीड़ बढ़ती थी, बल्कि निर्दोष नागरिकों का जीवन बर्बाद होता था. 2014 में अर्नेश कुमार बनाम बिहार राज्य मामले में सुप्रीम कोर्ट ने पहली बार दिशानिर्देश जारी किए थे, जिसमें कहा गया था कि ऐसे अपराधों में गिरफ्तारी निश्चित नहीं होनी चाहिए. पुलिस को पहले जांच करनी चाहिए और गिरफ्तारी केवल आवश्यक होने पर ही करनी चाहिए.
गिरफ़्तारी के सवाल पर सुप्रीम कोर्ट
बताते चलें कि गिरफ़्तारी के सवाल पर कोर्ट का स्पष्ट उत्तर नहीं में है. फैसले में कहा गया कि सात साल तक की सजा वाले अपराधों में गिरफ्तारी केवल तब की जा सकती है जब आरोपी नोटिस का पालन न करे, या जांच में बाधा डाले, सबूतों से छेड़छाड़ करे, गवाहों को प्रभावित करे, या अदालत में पेश न होने का खतरा हो. पुलिस को गिरफ्तारी के कारण लिखित रूप में दर्ज करने होंगे. यदि नोटिस के बाद भी आरोपी सहयोग करता है, तो गिरफ्तारी की कोई जरूरत नहीं. यह अर्नेश कुमार फैसले की भावना को दोहराता है, जहां कोर्ट ने कहा था कि गिरफ्तारी जांच का साधन है, न कि सजा. बीएनएसएस धारा 35(6) गिरफ्तारी को धारा 35(1)(बी) के साथ जोड़ती है, लेकिन कोर्ट ने जोर दिया कि पुलिस को सतर्क रहना चाहिए और गिरफ्तारी को अंतिम विकल्प ही मानना चाहिए.
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आम नागरिकों के लिए फैसले के मायने क्या?
ऐसे में इस फैसला सबसे बड़ा प्रभाव यह है कि अब पुलिस की मनमानी कम होगी. पहले, छोटे-मोटे अपराधों जैसे धोखाधड़ी, मारपीट या संपत्ति विवाद में लोग रातोंरात जेल में डाल दिए जाते थे, जिससे उनका करियर, परिवार और सम्मान प्रभावित होता था. लेकिन अब, नोटिस मिलने पर नागरिक पुलिस के समक्ष पेश होकर अपना पक्ष रख सकते हैं, बिना हिरासत में लिए. इससे जेलों में अनावश्यक भीड़ कम होगी.
उल्लेखनीय है कि भारत में जेलों की क्षमता से 130% अधिक कैदी हैं, जिनमें से अधिकांश विचाराधीन हैं. यह निर्णय संविधान के अनुच्छेद 21 के तहत जीवन और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के अधिकार को मजबूत करता है. महिलाओं, बुजुर्गों और कमजोर वर्गों के लिए यह विशेष रूप से फायदेमंद है, क्योंकि वे गिरफ्तारी के दौरान अधिक शोषण का शिकार होते हैं.
हालांकि, इस फैसले की कुछ सीमाएं भी हैं. गंभीर अपराधों (सात साल से अधिक सजा वाले) में गिरफ्तारी अभी भी आसान है और पुलिस दुरुपयोग कर सकती है. जांच की गुणवत्ता में सुधार के बिना, अपराधी बच सकते हैं. फिर भी, यह न्यायिक सक्रियता का उदाहरण है, जो पुलिस सुधार की दिशा में एक कदम है. सरकार को पुलिस प्रशिक्षण और जागरूकता अभियान चलाने चाहिए.
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-भारत एक्सप्रेस
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