FPO India: किसानों की आमदनी बढ़ाने और खेती को सशक्त बनाने की दिशा में फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गनाइजेशंस (FPOs) बड़ी उम्मीद बनकर उभरी हैं. बीते पांच सालों में इन संगठनों में किसानों की हिस्सेदारी लगातार बढ़ी है और इसका सीधा असर उनकी आमदनी और उत्पादन लागत पर दिख रहा है.
पांच साल में 50 लाख किसान बने हिस्सेदार
कृषि मंत्रालय के मुताबिक, पिछले पांच सालों में देशभर के 50 लाख से ज्यादा किसान 10,000 से अधिक एफपीओ में शेयरधारक बन चुके हैं. इनमें सबसे आगे तेलंगाना (6.7 लाख), उत्तर प्रदेश (5.9 लाख), आंध्र प्रदेश (5.7 लाख), मध्य प्रदेश (3.2 लाख) और महाराष्ट्र (3 लाख) के किसान हैं. सिर्फ ये पांच राज्य ही कुल हिस्सेदारों का आधा हिस्सा रखते हैं. खास बात यह है कि इन सामूहिक संगठनों में महिला किसानों की हिस्सेदारी 38% है, जो ग्रामीण अर्थव्यवस्था में उनकी मजबूत भूमिका को दिखाती है.
किसानों को मिला सस्ता बीज और खाद
एफपीओ की सबसे बड़ी ताकत यह है कि छोटे और सीमांत किसान अब सामूहिक ताकत के साथ खरीद-बिक्री कर पा रहे हैं. इसका फायदा उन्हें सीधा मिल रहा है बीज, खाद, कीटनाशक और कृषि उपकरण अब पहले से सस्ते मिल रहे हैं. यही वजह है कि खेती की लागत कम होने के साथ ही मुनाफा भी बढ़ रहा है.
वित्त वर्ष 2025 में 340 एफपीओ का सालाना कारोबार 10 करोड़ रुपये से ऊपर पहुंच गया है, जबकि 1,100 से ज्यादा संगठनों ने 1 करोड़ रुपये से अधिक की बिक्री दर्ज की. अब तक इन सामूहिक संगठनों का कुल टर्नओवर 15,282 करोड़ रुपये से ज्यादा हो चुका है.
ऑनलाइन और सरकारी प्लेटफॉर्म पर भी मौजूदगी
आज कई एफपीओ सिर्फ स्थानीय मंडियों तक सीमित नहीं हैं. 200 से ज्यादा एफपीओ GeM पोर्टल पर अपने उत्पाद बेच रहे हैं और बड़ी संख्या में अमेजन और फ्लिपकार्ट जैसे ई-कॉमर्स प्लेटफॉर्म पर भी किसानों की उपज बिक रही है. यही नहीं, कई संगठनों ने सरकार की न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) योजना के तहत तेलहन, दाल और अनाज की खरीद भी शुरू कर दी है.
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सरकार का सहयोग
केंद्र सरकार ने 2020 में 10,000 एफपीओ बनाने की योजना 6,865 करोड़ रुपये के बजट के साथ शुरू की थी. इसके तहत, हर एफपीओ को तीन साल तक 18 लाख रुपये तक की आर्थिक मदद दी जाती है. इसके अलावा, सरकार किसानों को प्रोत्साहित करने के लिए प्रति सदस्य 2,000 रुपये का मिलान अनुदान (मैचिंग ग्रांट) भी देती है, जिसकी अधिकतम सीमा 15 लाख रुपये है.
आज हजारों एफपीओ के पास बीज और उर्वरक बेचने का लाइसेंस है, और सैकड़ों संगठनों के पास कीटनाशक और अन्य कृषि उत्पादों की डीलरशिप भी है. इसका सीधा फायदा किसानों को मिलता है क्योंकि डीलर डिस्काउंट भी सीधे उन्हीं तक पहुंचता है.
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-भारत एक्सप्रेस
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