बिहार के गांवों से अक्सर ऐसी खबरें आती हैं जो दिल दुखा देती हैं. कहीं कोई छोटा बच्चा स्कूल बैग छोड़कर खेतों में मजदूरी कर रहा है, तो कोई परिवार की तंगहाली की वजह से मवेशी चराने को मजबूर है. लेकिन अब बिहार के इन ‘होनहार’ बच्चों के लिए एक अच्छी खबर आ रही है. राज्य सरकार एक ऐसी पहल लेकर आई है, जो न सिर्फ इन बच्चों के हाथों में फिर से कलम थमाएगी, बल्कि उनके रहने-खाने की चिंता भी जड़ से खत्म कर देगी.
दरअसल, बिहार का शिक्षा विभाग अब ‘मॉडल आवासीय विद्यालय’ (Model Residential Schools) शुरू करने जा रहा है. यह सिर्फ एक स्कूल नहीं, बल्कि उन हजारों बच्चों के लिए उम्मीद की एक नई किरण है जो गरीबी के कारण मुख्यधारा से कट चुके थे.
अब नहीं चलेगा कोई बहाना
अक्सर गांवों में देखा जाता है कि मां-बाप बच्चों को स्कूल इसलिए नहीं भेज पाते क्योंकि उन्हें कॉपी-किताब और यूनिफॉर्म का खर्च बोझ लगने लगता है. ऊपर से अगर बच्चा काम पर जाए तो दो पैसे घर आते हैं. सरकार ने इसी समस्या का समाधान निकाला है. इन ‘मॉडल स्कूलों’ में बच्चों को सिर्फ मुफ्त शिक्षा ही नहीं मिलेगी, बल्कि उनके लिए शानदार हॉस्टल और पौष्टिक खाने का इंतजाम भी सरकार ही करेगी.
मतलब यह कि अब माता-पिता को इस बात की फिक्र नहीं करनी होगी कि बच्चा पढ़ेगा तो खाएगा क्या? सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि पैसे की तंगी अब किसी भी मेधावी बच्चे के रास्ते का रोड़ा नहीं बनेगी.
‘ड्रॉपआउट’ बच्चों के लिए मिशन
इस योजना का सबसे अहम हिस्सा है कक्षा 6 से 12 तक के वो बच्चे, जिन्होंने बीच में ही पढ़ाई छोड़ दी थी. इन्हें तकनीकी भाषा में ‘ड्रॉपआउट’ कहा जाता है. इन बच्चों को वापस स्कूल लाना एक बड़ी चुनौती है, क्योंकि लंबे समय तक पढ़ाई से दूर रहने के कारण वे बाकी छात्रों से पिछड़ जाते हैं.
इसके लिए सरकार ‘स्पेशल टीचर्स’ यानी विशेष शिक्षकों की तैनाती करेगी. ये टीचर इन बच्चों को अलग से समय देंगे, ताकि वे फिर से पढ़ाई की लय पकड़ सकें और बिना किसी झिझक के अपनी क्लास के बाकी बच्चों के साथ कंधे से कंधा मिलाकर चल सकें.
केंद्र और राज्य की जुगलबंदी
इतने बड़े प्रोजेक्ट के लिए भारी-भरकम फंड की जरूरत होती है. इसके लिए केंद्र और राज्य सरकार ने हाथ मिलाया है. खर्चे का बंटवारा 70:30 के अनुपात में होगा. यानी अगर 100 रुपये खर्च होते हैं, तो 70 रुपये केंद्र सरकार देगी और 30 रुपये पटना बिहार सरकार वहन करेगी. इससे यह साफ है कि बजट की कमी की वजह से यह योजना बीच में नहीं लटकेगी.
जमीनी स्तर पर काम शुरू
इस योजना को जमीन पर उतारने की तैयारी भी शुरू हो चुकी है. पश्चिमी चंपारण के बगहा इलाके में प्रशासन ने उन स्कूलों की लिस्ट बनानी शुरू कर दी है, जिनके पास काफी जमीन है ताकि वहां हॉस्टल बनाए जा सकें.
बता दें कि, पिपरासी और मधुबनी जैसे पिछड़े प्रखंडों में अधिकारियों ने दौरा शुरू कर दिया है. वहीं, पिपरासी के ‘परसौनी’ और ‘सुजनही घोड़हवा’ जैसे स्कूलों को इस मॉडल के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया है. स्थानीय अंचलाधिकारियों का कहना है कि अगर स्कूल परिसर में जमीन कम पड़ी, तो आसपास की सरकारी जमीन भी इस नेक काम के लिए तुरंत अलॉट कर दी जाएगी.
2026: एक नई शुरुआत
सरकार का लक्ष्य है कि आने वाले नए साल, यानी 2026 की शुरुआत से ही बच्चों को इन आवासीय स्कूलों में दाखिला मिलना शुरू हो जाए. गंडक पार के वो इलाके जहां बाढ़ और दुर्गम रास्तों की वजह से शिक्षा पहुंचना मुश्किल होता था, वहां अब शिक्षा विभाग खुद चलकर पहुंच रहा है.
अगर यह योजना सही ढंग से लागू हुई, तो यकीनन बिहार के गांवों की तस्वीर बदल जाएगी.
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-भारत एक्सप्रेस
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