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‘तिरंगा’ और ‘क्रांतिवीर’: जब नाना पाटेकर के कच्चे गुस्से और तीखे तेवरों ने सिनेमाई इतिहास रच दिया

Nana Patekar Tirangaa and Krantiveer iconic roles: नाना पाटेकर की ‘तिरंगा’ और ‘क्रांतिवीर’ ने 90 के दशक के सिनेमा को नया तेवर दिया. इंस्पेक्टर वाघले और प्रताप तिलक के वे किरदार, जो आज भी दर्शकों के दिलों में जिंदा हैं.

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नाना पाटेकर ने कारगिल युद्ध में लिया था हिस्सा (इमेज-AI GENERATED)

Vijay Ram Edited by Vijay Ram

नाना पाटेकर एक शानदार अभिनेता थे. उन्होंने अपने लंबे फिल्मी सफर में अनेक बेमिसाल किरदार निभाए, जिनमें एक अलग ही गहराई, संवेदनशीलता और तीव्रता दिखाई देती थी. लेकिन हमारी पीढ़ी की स्मृतियों में तो उनकी इन दो विशुद्ध मसाला फ़िल्मों—तिरंगा (1993) और क्रांतिवीर (1994)—में निभाए किरदार ही सबसे गहरे अंकित रहे.

दोनों फिल्में मेहुल कुमार के निर्देशन में बनी थीं और नब्बे के दशक की उस क्लासिक मसाला सिनेमा की मिसाल थीं, जिसमें देशभक्ति, गुस्सा, डायलॉगबाजी और एक्शन का घोल मिला होता था. नाना पाटेकर ने इनमें न तो कोई “हीरो” वाला चमकदार चेहरा पेश किया और न ही कोई नरम-नरम रोमांटिक अंदाज. उन्होंने बस वह कच्चा, बेचैन और गुस्सैल इंसान उतारा, जो हमारी पीढ़ी के मन में हमेशा के लिए बस गया.

तिरंगा: इंस्पेक्टर शिवाजीराव वाघले

तिरंगा में नाना पाटेकर इंस्पेक्टर शिवाजीराव वाघले बने—एक ईमानदार लेकिन बेहद गुस्सैल पुलिस अफसर, जो सस्पेंशन में ज्यादा वक्त बिताता था क्योंकि वह सिस्टम से नहीं झुकता था. उनके सामने राज कुमार का ब्रिगेडियर सूर्यदेव सिंह था—संयमी, गंभीर और अनुभव से लबरेज. दोनों की जोड़ी अद्भुत थी. एक तरफ राज कुमार की गहरी आवाज और ठहराव, दूसरी तरफ नाना की बेचैन आंखें और फूटने को तैयार ज्वालामुखी.

फिल्म की कहानी प्रलयनाथ गैंडास्वामी नाम के आतंकवादी के इर्द-गिर्द घूमती है, जो भारत पर आक्रमण के लिए परमाणु मिसाइलें तैयार कर रहा होता है. नाना का वाघले इस साज़िश को कुचलने में ब्रिगेडियर के साथ कंधे से कंधा मिलाकर खड़ा रहता है. उनकी एक्टिंग में न कोई अतिरिक्त नाटकीयता थी, न कोई बनावटी देशभक्ति. बस एक आम पुलिसवाला था, जो देश के लिए अपना सब कुछ दांव पर लगाने को तैयार था. दर्शकों को लगता था कि यह इंस्पेक्टर सचमुच मौजूद है—गली-मोहल्ले में, थाने में, और जब जरूरत पड़े तो गोलियों के बीच भी.

तिरंगा की कई सीनें आज भी याद आती हैं. खासकर वे पल जब वाघले का गुस्सा फूटता है. नाना पाटेकर ने उस गुस्से को इतनी प्रामाणिकता से जिया कि वह सिर्फ़ स्क्रीन पर नहीं, दर्शकों के सीने में उतर गया.

क्रांतिवीर: प्रताप नारायण तिलक

एक साल बाद आई क्रांतिवीर. इस बार नाना पाटेकर प्रताप नारायण तिलक बने—एक स्वतंत्रता सेनानी के पोते, जो शुरुआत में आवारा, गुस्सैल और व्यवस्था से नाराज युवक लगता है. लेकिन धीरे-धीरे वह उस व्यवस्था के ख़िलाफ खड़ा हो जाता है जो गरीबों को कुचलती है, सांप्रदायिक नफरत फैलाती है और सत्ता के नशे में चूर रहती है.

यह किरदार नाना के करियर का एक निर्णायक मोड़ साबित हुआ. उन्होंने इस भूमिका के लिए राष्ट्रीय फ़िल्म पुरस्कार (सर्वश्रेष्ठ अभिनेता) और फिल्मफेयर पुरस्कार दोनों जीते. फिल्म का क्लाइमेक्स आज भी सिनेमा के इतिहास में दर्ज है. फांसी के तख्ते पर खड़े प्रताप का वह भाषण—“आ गए मेरी मौत का तमाशा देखने…”—न सिर्फ स्क्रिप्ट का हिस्सा था, बल्कि नाना ने उसे उस वक़्त के अपने मन की आग से और भी प्रखर बना दिया था. दिल की गंभीर बीमारी से जूझते हुए भी उन्होंने वह सीन इतनी तीव्रता से किया कि आज भी सुनने वाले सिहर उठते हैं.

प्रताप तिलक में नाना ने समाज के उस आम आदमी को आवाज दी जो चुपचाप सब कुछ सहता रहता है, लेकिन एक दिन फट पड़ता है. उनके डायलॉग—“यह मुसलमान का खून है, यह हिंदू का… अब बताओ कौन-सा मुसलमान का है और कौन-सा हिंदू का?”—आज भी उतने ही प्रासंगिक हैं.

क्यों ये दो किरदार सबसे गहरे?

नाना पाटेकर ने अपनी ज़िंदगी में कई गंभीर और कलात्मक फिल्में कीं—परिंडा, प्रहार, नाट्यसम्राट जैसी. लेकिन तिरंगा और क्रांतिवीर विशुद्ध मसाला फ़िल्में थीं. इनमें न तो बहुत ज्यादा बौद्धिकता थी, न कोई जटिल मनोविज्ञान. फिर भी नाना ने इन किरदारों में इतनी सच्चाई और आग भरी कि वे हमारी पीढ़ी की सामूहिक स्मृति का हिस्सा बन गए.

शायद इसलिए कि उन दिनों सिनेमा अभी भी सामूहिक अनुभव था. थिएटर में बैठकर जब नाना का वाघले गुस्से में चिल्लाता था या प्रताप तिलक फांसी के तख्ते पर भाषण देता था, तो पूरा हॉल एक साथ सांस रोक लेता था. वे किरदार सिर्फ़ मनोरंजन नहीं थे—वे उस समय के युवा मन की नाराजगी, देशभक्ति और बेचैनी का आईना थे.

आज जब हम पीछे मुड़कर देखते हैं, तो नाना पाटेकर के अनेक चेहरे याद आते हैं. लेकिन जब भी कोई पूछता है—“नाना पाटेकर का कौन-सा किरदार सबसे ज़्यादा याद है?” तो हमारी पीढ़ी के बहुत से लोगों के मुंह से एक ही जवाब निकलता है—तिरंगा का इंस्पेक्टर वाघले और क्रांतिवीर का प्रताप तिलक.

क्योंकि ये दोनों किरदार सिर्फ स्क्रीन पर नहीं जिए गए थे. ये किरदार हमारे अंदर उतर गए थे. और शायद इसीलिए नाना पाटेकर हमारी स्मृतियों में हमेशा जीवित रहेंगे—न सिर्फ एक महान अभिनेता के रूप में, बल्कि उन दो मसाला नायकों के रूप में, जिन्होंने हमें एक बार फिर से ग़ुस्सा करना, खड़ा होना और देश से प्यार करना सिखाया.



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