आज सुपरस्टार रजनीकांत ने अपने जीवन के 75 वर्ष पूरे कर लिए. 1950 में बेंगलुरु में एक साधारण मराठी परिवार में जन्मे शिवाजी राव गायकवाड़ ने तमिल सिनेमा को नई ऊंचाइयों पर पहुंचाया और पूरे भारत को अपनी बेमिसाल शैली से दीवाना बना दिया. 2025 उनका फिल्मी सफर का 50वां साल भी है. 1975 में के. बालाचंदर की फिल्म ‘अपूरवा रागांगल’ से शुरू हुई इस यात्रा में अब तक 170 से ज्यादा फिल्में हो चुकी हैं.
गरीबी से सुपरस्टारडम तक
बचपन में पिता की मृत्यु के बाद आर्थिक तंगी ने उन्हें कुली, कारपेंटर और बेंगलुरु ट्रांसपोर्ट सर्विस में बस कंडक्टर बनाया. यहीं से एक्टिंग का कीड़ा लगा. मद्रास फिल्म इंस्टीट्यूट में दाखिला लिया और के. बालाचंदर ने उन्हें पहचाना.
1975 में ‘अपूरवा रागांगल’ से छोटी-सी नेगेटिव भूमिका के साथ डेब्यू किया. फिर ‘मूंद्रु मुदिचु’, ‘बिल्ला’, ‘मुरत्तु कालई’ और ‘थलापथी’ ने उन्हें स्टार बनाया. 1995 में आई ‘बाशा’ ने तहलका मचा दिया. इसके बाद ‘पदयप्पा’, ‘चंद्रमुखी’, ‘शिवाजी’, ‘एंथिरन’, ‘कबाली’, ‘काला’, ‘पेट्टा’, ‘अन्नात्थे’, ‘जेलर’ और हाल ही में ‘वेट्टैयन’ तक हर दशक में उन्होंने खुद को नया साबित किया. आज 75 की उम्र में भी ‘कुली’ जैसी बड़ी फिल्म की शूटिंग कर रहे हैं.
स्टाइल के सुल्तान
सिगरेट उछालकर मुंह में डालना, चश्मा पलटना, तेज कदमों से वॉक, “एनर्जी… एनर्जी…” या “लथा… लथा…” जैसे डायलॉग ये सब रजनी फिनॉमेनन बन गए. कोई दूसरा हीरो आज तक उनकी इस स्टाइल की नकल नहीं कर पाया. उनका फैन बेस सिर्फ तमिलनाडु तक सीमित नहीं है बल्कि कर्नाटक, आंध्र, केरल, महाराष्ट्र, उत्तर भारत और जापान तक फैला है. लोग उन्हें मंदिरों में पूजते हैं, दूध चढ़ाते हैं.
आध्यात्मिक राजनीति का सपना
रजनीकांत हमेशा भ्रष्टाचार, गरीबी और सामाजिक न्याय की बात करते रहे. ‘काला’ और ‘कबाली’ जैसी फिल्मों में उन्होंने दलित-शोषित वर्ग की आवाज बुलंद की. 2017-18 में उन्होंने राजनीति में आने की घोषणा की और “आध्यात्मिक राजनीति” का नारा दिया — बिना जाति-धर्म के, सिर्फ ईमानदारी और आध्यात्म पर आधारित. लेकिन 2021 में स्वास्थ्य कारणों से पीछे हट गए. वे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की तारीफ करते हैं, पर किसी पार्टी में शामिल नहीं हुए.
हिमालय का साधक
रजनीकांत महावतार बाबाजी के भक्त हैं. हर साल हिमालय जाते हैं, बद्रीनाथ-केदारनाथ और बाबाजी की गुफा में ध्यान करते हैं. वे कहते हैं, “सबसे बड़ा सुपरस्टार तो भगवान है, मैं तो बस उसका छोटा-सा किरदार हूं.” तमिलनाडु के द्रविड़-नास्तिक माहौल में भी वे खुलकर अपनी आस्था पर डटे रहे. यह उनकी सबसे बड़ी ताकत है.
बॉलीवुड का ‘थलैवर’
80-90 के दशक में रजनीकांत ने हिंदी दर्शकों को खू भी खूब लूटा. ‘अंधा कानून’, ‘चालबाज’, ‘हम’, ‘गिरफ्तार’, ‘भगवान दादा’, ‘उत्तर दक्षिण’, ‘जॉन जानी जनार्दन’ जैसी 20 से ज्यादा हिंदी फिल्में कीं. ‘अंधा कानून’ में अमिताभ बच्चन के साथ उनकी जोड़ी को आज भी याद किया जाता है. बाद में उन्होंने दक्षिण पर फोकस किया, पर उत्तर भारत में आज भी उनकी फैन फॉलोइंग जबरदस्त है.
75 साल की उम्र में भी रजनीकांत की ऊर्जा, स्टाइल और लोकप्रियता युवाओं को मात दे रही है. वे सिर्फ एक अभिनेता नहीं, एक संपूर्ण सांस्कृतिक घटना हैं.
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-भारत एक्सप्रेस
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