Vande Matram 150 Years: 7 नवंबर 2025 को ‘वंदे मातरम’ के 150 वर्ष पूरे होने के अवसर पर भारतवर्ष एक ऐतिहासिक पल का साक्षी बना. बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय द्वारा 1875 में रचित यह गीत न केवल भारतीय स्वतंत्रता संग्राम का प्रेरणा स्रोत रहा, बल्कि आज भी यह देश के हर कोने में राष्ट्रीय एकता और गौरव का प्रतीक है.
‘वंदे मातरम’ की रचना बंकिमचंद्र चट्टोपाध्याय ने 1875 में अपने उपन्यास आनंदमठ के लिए की थी. यह गीत संस्कृत और बांग्ला का मिश्रण है, जो भारतमाता की प्राकृतिक, सांस्कृतिक और आध्यात्मिक समृद्धि का गुणगान करता है. पहली पंक्ति—”सुजलां सुफलां मलयज शीतलां शश्यामलां मातरम”—भारत की नदियों, उपजाऊ भूमि, और प्राकृतिक सौंदर्य को चित्रित करती है.
बंकिम बाबू ने इसे उस समय लिखा, जब भारत ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन के तले था. फिर भी, यह गीत एक स्वतंत्र, समृद्ध और शक्तिशाली भारत का स्वप्न प्रस्तुत करता है. 1882 में आनंदमठ के प्रकाशन के साथ ‘वंदे मातरम’ जन-जन तक पहुंचा. यह गीत भारत माता को एक जीवंत शक्ति के रूप में प्रस्तुत करता है, जो सरस्वती (ज्ञान), लक्ष्मी (समृद्धि) और दुर्गा (शक्ति) का प्रतीक है. इसकी रचना ने भारतीयों में मातृभूमि के प्रति भक्ति और बलिदान की भावना को जागृत किया.
क्रांतिकारियों के लिए ऊर्जा का स्त्रोत
‘वंदे मातरम’ स्वतंत्रता संग्राम का वह मंत्र बन गया, जिसने लाखों भारतीयों को एकजुट किया. 1896 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के कलकत्ता अधिवेशन में रवींद्रनाथ टैगोर ने इसे गाकर इसे राष्ट्रीय मंच पर लाया. 1905 में बंगाल विभाजन के विरोध में यह गीत सड़कों पर गूँजा, जब हजारों लोग ‘वंदे मातरम’ का उद्घोष करते हुए ब्रिटिश नीतियों का विरोध कर रहे थे. बरिसाल सत्र में क्रांतिकारियों ने गोलियों का सामना करते हुए भी इस गीत को गाया.
क्रांतिकारी आंदोलनों में ‘वंदे मातरम’ का विशेष महत्व था. वीर सावरकर, भगत सिंह, और सुभाष चंद्र बोस जैसे क्रांतिकारियों ने इसे अपनी प्रेरणा बनाया. भीकाजी कामा ने 1907 में जर्मनी में भारत का ध्वज फहराया, जिसके केंद्र में ‘वंदे मातरम’ लिखा था.
महात्मा गांधी ने 1927 में इसे अखंड भारत की तस्वीर बताया, जबकि श्री अरविंद ने इसे आत्मिक शक्ति का मंत्र माना. फांसी के तख्ते पर चढ़ते हुए भी क्रांतिकारियों के होंठों पर यही नारा था. यह गीत केवल शब्द नहीं, बल्कि स्वतंत्रता के लिए बलिदान का प्रतीक बन गया.
धार्मिक संवेदनशीलता और राजनीतिक ध्रुवीकरण
1937 में, हालांकि, कुछ छंदों को हटाने का निर्णय लिया गया, जिसे कई लोग इसके मूल भाव को कमजोर करने वाला मानते हैं. फिर भी, 1950 में भारत के संविधान सभा ने इसे राष्ट्रीय गीत का दर्जा देकर इसके महत्व को मान्यता दी.
‘वंदे मातरम’ की लोकप्रियता के बावजूद यह विवादों से अछूता नहीं रहा. मुख्य विवाद गीत के कुछ छंदों पर केंद्रित है, जो भारत माता को हिंदू देवियों दुर्गा, लक्ष्मी और सरस्वती के रूप में चित्रित करते हैं. मुस्लिम समुदाय के एक वर्ग का मानना है कि यह उनके एकेश्वरवाद के सिद्धांत (तौहीद) के विरुद्ध है, क्योंकि यह मूर्तिपूजा जैसा प्रतीत होता है. 1900 के दशक से ही यह विवाद चला आ रहा है.
आनंदमठ उपन्यास में मुस्लिम शासकों के खिलाफ विद्रोह का चित्रण भी विवाद का आधार बना, हालांकि बंकिम का उद्देश्य ब्रिटिश शोषण के खिलाफ था. महात्मा गांधी ने मुस्लिम संवेदनाओं का सम्मान करते हुए कांग्रेस सभाओं में पूर्ण गीत गाने पर रोक लगाई. 1937 में कांग्रेस ने केवल पहले दो छंदों को अपनाया.
2006 में जब केंद्र सरकार ने सभी को गाने का निर्देश दिया, तो जमीयत उलेमा-ए-हिंद ने फतवा जारी कर मुसलमानों को गाने से रोका.
विवादों पर प्रहार और प्रेरणा का संदेश
150वें वर्ष के उद्घाटन समारोह में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 1937 के निर्णय पर सीधा प्रहार किया: “कांग्रेस सरकार ने महत्वपूर्ण छंद हटा दिए, जो गीत को खंडित करने जैसा था. यह विभाजन की बीज बोने वाला था. आज की पीढ़ी को यह इतिहास समझना होगा.” मोदी ने इसे नेहरू युग की ‘विभाजनकारी मानसिकता’ से जोड़ा, जो राष्ट्र को कमजोर करती है.
उन्होंने गीत की पहली पंक्ति का जिक्र करते हुए कहा, “बंकिम बाबू ने गुलामी के दौर में भी सुजलां-सुफलां भारत का स्वप्न देखा. यह ब्रिटिश प्रचार को चूर-चूर करता है.” वर्तमान उपलब्धियों—चंद्रयान-3, आत्मनिर्भर भारत—को जोड़ते हुए मोदी ने कहा, “जब हम चंद्रमा पर पहुंचते हैं, तो हर भारतीय का उद्घोष ‘वंदे मातरम’ होता है.” उन्होंने विवादों के बीच एकजुटता का आह्वान किया: “यह गीत मां भारती की जयकार है, जो हमें नकारात्मकता से ऊपर उठने की शक्ति देता है.” एक वर्षीय स्मरणोत्सव का शुभारंभ करते हुए उन्होंने स्मारक सिक्का और डाक टिकट जारी किया, जो गीत की विरासत को अमर बनाता है.
लोकप्रियता का जीवंत प्रतीक
‘वंदे मातरम’ आज भी भारत के हर नागरिक के हृदय में बस्ता है. यह गीत स्कूलों, सांस्कृतिक समारोहों, और राष्ट्रीय आयोजनों में गाया जाता है. चाहे वह स्वतंत्रता दिवस हो, गणतंत्र दिवस हो, या सैन्य परेड, ‘वंदे मातरम’ का उद्घोष देशभक्ति की भावना को प्रज्वलित करता है. सिनेमा, संगीत और कला में भी यह गीत बार-बार उभरता है. ए.आर. रहमान जैसे संगीतकारों ने इसे नए रूप में प्रस्तुत कर युवा पीढ़ी से जोड़ा.
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-भारत एक्सप्रेस
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