1965 के युद्ध में लाहौर तक पहुंच गई थी भारतीय सेना (इमेज- Vivekanand International Foundation)
1965 India Pakistan War: भारत को आजादी मिले कुछ ही साल बीते थे कि देश दो बड़ी चुनौतियों से रू-ब-रू हो गया. 1962 में चीन के साथ हुए युद्ध में हार ने भारतीयों का मनोबल तोड़ा था. उसके दो साल बाद 1964 में जवाहरलाल नेहरू के निधन से नेतृत्व का संकट पैदा हो गया. पाकिस्तान ने इसी कमजोरी का फायदा उठाने की ठानी.
पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन जिब्राल्टर’ की शुरुआत की. हजारों पाकिस्तानी लड़ाकों को गुरिल्ला युद्ध की ट्रेनिंग दी गई. हथियारों से लैस ये लड़ाके 5 अगस्त 1965 को कश्मीर में घुसे. उनका पहनावा और रहन-सहन बिल्कुल कश्मीरियों जैसा था, ताकि वे आसानी से घुल-मिल सकें. लेकिन कश्मीर के लोगों ने इन्हें पहचान लिया और भारतीय सेना को सूचना दे दी. भारतीय सेना ने शुरुआत में कई घुसपैठियों को गिरफ्तार किया. स्पेशल कमांडोज को इन लड़ाकों को पकड़ने और मार गिराने की जिम्मेदारी सौंपी गई.
जब पाकिस्तान को लगा कि उसका प्लान फेल होने वाला है, तो उसने तोपखाने से गोलेबारी शुरू कर दी. दोनों देशों के बीच युद्ध छिड़ गया. पाकिस्तान ने कश्मीर के उरी और पुंछ जैसे इलाकों पर कब्जा कर लिया, तो भारत ने पीओके में आठ किलोमीटर अंदर घुसकर ‘हाजी पीर पास’ अपने कब्जे में ले लिया. पूरा अगस्त महीना युद्ध की गर्मागर्मी में बीता.
‘ऑपरेशन ग्रैंडस्लैम’ का भारत ने दिया था मुंहतोड़ जवाब
1 सितंबर को पाकिस्तान ने ‘ऑपरेशन ग्रैंडस्लैम’ लॉन्च किया. इसका मकसद था भारत के लिए रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण अखनूर सेक्टर पर कब्जा करना. पाकिस्तान की इस चाल का जवाब देते हुए भारत ने 6 सितंबर 1965 को सरहद पार कर लाहौर और सियालकोट पर हमला बोल दिया. भारत की ओर से यही युद्ध की आधिकारिक शुरुआत थी.
भारतीय सेना तेजी से आगे बढ़ी. लाहौर लगभग हाथ में आ ही गया था. कश्मीर पर कब्जा करने की उम्मीद लेकर भारत में घुसा पाकिस्तान अब अपनी महत्वपूर्ण शहर लाहौर खोने के कगार पर खड़ा था. भारतीय सेना की यह अग्रिम कार्रवाई पूरे युद्ध का निर्णायक मोड़ साबित हुई.
23 सितंबर को हुई थी सीजफायर की घोषणा
संयुक्त राष्ट्र के दखल के बाद 23 सितंबर को सीजफायर की घोषणा हुई. बाद में भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री और पाकिस्तान के राष्ट्रपति अयूब खान के बीच ताशकंद समझौता हुआ.
1965 का यह युद्ध दिखाता है कि कैसे भारत ने प्रतिकूल परिस्थितियों में भी साहस और रणनीतिक समझदारी का परिचय दिया. जब भारतीय सेना लाहौर पहुंच गई, तो न सिर्फ पाकिस्तान की महत्वाकांक्षाएं ध्वस्त हुईं, बल्कि विश्व को भी भारत की सैन्य क्षमता का अहसास हो गया.
-भारत एक्सप्रेस
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